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अलविदा नवरातिलोवा..... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अस्सी के दशक में जब पहली बार टेनिस देखने का चस्का लगा, तो उस समय एक ऐसी महिला खिलाड़ी टेनिस जगत में छाई थी. जिनका ख़िताब जीतना मानों उनकी दिनचर्या थी. बाएँ हाथ की इस टेनिस खिलाड़ी का बिंदास अंदाज़ पहली बार ही भा गया. लंबे बाल सिर पर हेड बैंड, चश्मा लगाए और बड़ी संख्या में मौजूद प्रशंसकों के बीच उनका खेल देखते ही बनता था. आज इतने वर्षों बाद उन्होंने टेनिस अलविदा कहा और ये भी दिखा दिया कि अगर मन में उत्साह हो, आत्मविश्वास हो- तो उम्र आड़े नहीं आती. अगले महीने नवरातिलोवा 50 साल की हो जाएँगी. इस उम्र में भी उन्होंने मिक्स्ड डबल्स का ख़िताब जीतकर टेनिस को अलविदा कहा. ग्रैंड स्लैम का 18 सिंगल्स और 41 डबल्स टाइटल जीतने वाली नवरातिलोवा को टेनिस कोर्ट पर उनकी तेज़ी के कारण जाना जाता था. उन्होंने महिला टेनिस को नई ऊँचाई दी. लेकिन उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था- उम्र के इस दौर में उनका प्रदर्शन. मार्टिना ने अपने टेनिस जीवन में कुल 170 सिंगल्स टाइटल जीते. उनके खाते में 133 डबल्स टाइटल भी आए. बचपन से टेनिस 18 अक्तूबर 1956 को चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में जन्मी नवरातिलोवा के ख़ून में ही टेनिस था. मार्टिना की दादी टेनिस खेलती थी और टेनिस खेलने के लिए उन्हें अपने परिवारजनों का भी खूब समर्थन था.
मार्टिना नवरातिलोवा ने आठ साल की उम्र में अपना पहला टेनिस टूर्नामेंट खेला और सेमी फ़ाइनल तक पहुँचीं. महान रॉड लेवर को प्राग में खेलते देख कर मार्टिन पेशेवर टेनिस की ओर आकर्षित हुईं. वर्ष 1973 में मार्टिना पेशेवर खिलाड़ी बन गईं. इसी साल उन्होंने अमरीका का दौरा किया और कई मैच खेले. इसी दौरान उन्हें बाद में उनकी चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी बनीं क्रिस एवर्ट के ख़िलाफ़ भी खेलने का मौक़ा मिला. मार्टिना ने पहली बार पेशेवर टेनिस में कोई ख़िताब 1974 में जीता. अगले साल नवरातिलोवा अमरीका आ गईं. पहले उन्होंने ग्रीन कार्ड लिया और फिर 1981 में यहीं की नागरिक बन गईं. मार्टिना नवरातिलोवा को पहली बड़ी सफलता 1978 में हासिल हुई जब उन्होंने प्रतिष्ठित विंबलडन का ख़िताब जीता और वो भी क्रिस एवर्ट को हरा कर. इसी साल 10 जुलाई को दुनिया को नई नंबर वन महिला खिलाड़ी मिली और वो थीं मार्टिना नवरातिलोवा. इस जीत के बाद जैसे मार्टिना कोर्ट पर जीत हासिल करने की अभ्यस्त हो गईं. वे टेनिस की महानतम महिला खिलाड़ी बनने की राह पर थीं. वर्ष 1979 में उन्होंने फिर विंबलडन का ख़िताब जीता. लेकिन अगले साल उन्हें कोई ग्रैंड स्लैम ख़िताब नहीं मिल पाया. इस दौरान अपने व्यक्तिगत संबंधों के कारण मार्टिना सुर्ख़ियों में रहीं. मीडिया ने अमरीका की लेखिका रीटा मे ब्राउन के साथ उनके संबंधों को खूब उछाला. लेकिन मार्टिना ने इन मामलों पर खुल पर बोला और अपने को सार्वजनिक रूप से 'समलैंगिक' भी कह डाला. अगले साल मार्टिना ने ऑस्ट्रेलियन ओपन जीतकर शुरुआत को अच्छी की लेकिन फिर कोई ख़िताब नहीं जीत पाईं. लेकिन ये उनके टेनिस जीवन के नए दौर की शुरुआत थी. ऐसा दौर जिनमें उनका कोई सानी नहीं था. महान बास्केटबॉल खिलाड़ी नैंसी लिबरमैन के साथ उनकी ट्रेनिंग काम आई. 1982 में लोगों ने एक नई मार्टिना देखी. एक ऐसी मार्टिना जो शारीरिक और मानसिक रूप से काफ़ी मज़बूत बन गई थी. बेहतरीन दौर इस साल उन्होंने 15 सिंगल्स और 14 डबल्स टूर्नामेंट जीता यानी एक साल में कुल 29 ख़िताब. इनमें फ़्रेंच ओपन और विंबलडन भी शामिल था.
1983 में उन्होंने तीन ग्रैंड स्लैम ख़िताब समेत कुल 28 ख़िताब जीते. 1984 में भी मार्टिना ने तीन ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीता. हर ओर मार्टिना की गूँज थी. उनकी चिर प्रतिद्वंद्वी क्रिस एवर्ट ने अपने को मार्टिना के अनुरूप ढालने के लिए जी-तोड़ मेहनत शुरू की. उसका फल भी उन्हें मिला. 1985, 1986 और 1987 में भी मार्टिना ने दो-दो ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीते. 1988 में मार्टिना ने शिकागो टूर्नामेंट में क्रिस एवर्ट को हराया. ये दोनों खिलाड़ियों के बीच आख़िरी मैच था. इसी साल क्रिस एवर्ट ने संन्यास ले लिया. लेकिन तब तक मार्टिना का महिला टेनिस में वर्चस्व का दायरा सिमट रहा था. अगस्त 1987 में जर्मनी की स्टेफ़ी ग्राफ़ दुनिया की नंबर वन खिलाड़ी बनीं. मार्टिना की मुश्किलें बढ़ीं और अगले दो साल तक उन्हें कोई ग्रैंड स्लैम ख़िताब नहीं मिला. लेकिन 1990 में मार्टिना ने नौवीं बार विंबलडन का ख़िताब जीता. लेकिन यह उनके टेनिस करियर का आख़िरी ग्रैंड स्लैम सिंगल्स ख़िताब था. समय के साथ मार्टिना ने अपनी सीमा ख़ुद तय की. वे सिंगल्स तो खेलती रहीं लेकिन उनका ज़्यादा समय डबल्स मैचों में गुज़रा. उन्हें अच्छे नतीजे भी मिले. 2004 तक वे ग्रैंड स्लैम सिंगल्स खेलीं. अब उन्होंने 2006 में यूएस ओपन का मिक्स्ड डबल्स ख़िताब जीतकर अपने टेनिस करियर का अंत किया. 'वंडर वूमैन' पूर्व टेनिस खिलाड़ी और भारतीय डेविस कप टीम के कप्तान रहे नरेश कुमार उन्हें टेनिस की 'वंडर वूमैन' मानते हैं. उनका कहना है कि अभी तक टेनिस कोर्ट पर मार्टिना की तेज़ी देखते बनती थी.
नरेश कुमार मानते हैं कि महिला टेनिस में काफ़ी बदलाव आया है लेकिन उनका कहना है कि इन सबके बावजूद मार्टिना की जगह तो थी ही और उन्होंने डबल्स मुक़ाबलों में इसे साबित भी किया. उन्होंने कहा, "महिला टेनिस खिलाड़ी अब और मज़बूत हुई हैं. उनकी ट्रेनिंग अच्छी हुई है. लेकिन इन सबके बीच मार्टिना ने मिक्स्ड और डबल्स मुक़ाबलों में अपना लोहा तो मनवा ही दिया." मार्टिना नवरातिलोवा ने भारत के टेनिस स्टार लिएंडर पेस के साथ मिक्स्ड डबल्स प्रतियोगिता में हिस्सा लिया है और ख़िताब भी जीते हैं. नरेश कुमार बताते हैं कि लिएंडर तो मार्टिना के पुजारी बन गए थे. लिएंडर उनसे इतना प्रभावित थे कि कोर्ट पर उनकी तेज़ी देखकर और अपने से तुलना करके शर्मिंदा भी होते थे. लिएंडर का मानना था वे छोटी उम्र में उनमें उतनी तेज़ी नहीं थी जितनी तेज़ी उस दौर में मार्टिना की थी. ऐसा था कोर्ट पर मार्टिना का जलवा. मार्टिना ने टेनिस को तो अलविदा कह दिया है लेकिन टेनिस जगत में उनकी ख़ास जगह शायद इतनी जल्दी नहीं भरी जा सकेगी. |
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