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दृढ़ इच्छाशक्ति की मिसाल हैं शरापोवा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुनहरे बालों, लंबी टाँगों और छरहरी बदन वाली 17 वर्षीय रूस की मारिया शरापोवा की विंबलडन में जीत के साथ ही ये बहस भी ख़त्म हो गई है कि क्या वे रूस की दूसरी अन्ना कुर्निकोवा हैं? खेल और ग्लैमर का संगम महिला टेनिस के साथ कोई नई बात नहीं है. लेकिन नई बात है इतनी कम उम्र में इन खिलाड़ियों का ख़िताबी जीत हासिल करना. 17 वर्षीय मारिया शरापोवा ने जब शीर्ष वरीयता प्राप्त अमरीका की सरीना विलियम्स को विंबलडन के फ़ाइनल में चारों खाने चित्त किया तो जीत हुई ऐसे दमख़म की जो आज के दिन हर खेल में उभर कर आ रहा है. कम उम्र में खेल को नई दिशा देने और जीतने का जुनून इन खिलाड़ियों पर इस क़दर हावी रहता है कि पूछिए मत. विंबलडन के फ़ाइनल में यही देखने को मिला. अन्ना कुर्निकोवा और शरापोवा में काफ़ी समानताएँ हैं. 14 साल की उम्र में दोनों ने पेशेवर टेनिस को अपना लिया था. दोनों ने टेनिस की ट्रेनिंग फ़्लोरिडा में ली. और तो और दोनों ने टेनिस के कोर्ट पर अपना भाग्य आज़माने के साथ-साथ ज़्यादा कमाई की ख़ातिर कई लुभावने मॉडलिंग के अनुबंध भी किए. लेकिन इन सब समानताओं के बावजूद शरापोवा की विंबलडन में जीत ने दोनों में एक बड़ा अंतर तो ला ही दिया है. शरापोवा पहली रूसी महिला खिलाड़ी हैं, जिन्होंने प्रतिष्ठित विंबलडन का ताज पहना है. कुर्निकोवा ने कोई भी ग्रैंड स्लैम ख़िताब नहीं जीता है और किसी ग्रैंड स्लैम के फ़ाइनल तक भी नहीं पहुँचीं हैं. अब शरापोवा स्विट्ज़रलैंड की मार्टिना हिंगिस के बाद विंबलडन जीतने वाली सबसे कम उम्र की महिला खिलाड़ी भी बन गईं हैं. हिंगिस ने 1997 में सिर्फ़ 16 साल की उम्र में विंबलडन का ख़िताब जीता था. बचपन से ही था जुनून नौ वर्ष की उम्र में ही शरापोवा फ़्लोरिडा में निक बोलेटियरी के टेनिस एकेडमी में आ गईं थीं. उन्हें यहाँ तक लेकर आए थे उनके पिता यूरी.
शरापोवा की माँ येलेना साइबेरिया में ही रुकी रहीं क्योंकि उन्हें वीजा नहीं मिला. बोलेटियरी ने बहुत पहले ही शरापोवा की प्रतिभा पहचान ली थी. उनका मानना है कि शरापोवा के परिवार का बलिदान और भरोसा ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है. बोलेटियरी ने शरापोवा के करियर में उनके पिता यूरी के योगदान को कुछ ऐसे याद किया, "यूरी ने अपनी बेटी को दुनिया की बेहतरीन खिलाड़ी बनाने के लिए सही लोगों की सहायता ली. वे हमेशा उनके साथ खड़े रहे." अपने परिवार के योगदान और बलिदान का शरापोवा पर सकारात्मक असर पड़ा और इस कारण वे मानसिक रूप से और मज़बूत होती गईं. शरापोवा पर यह सकारात्मक असर विंबलडन फ़ाइनल में भी देखने को मिला. |
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