कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय पुरुष हॉकी टीम से गोल्ड मेडल एक जीत दूर

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, खेल पत्रकार
भारतीय कप्तान मनप्रीत सिंह ने बर्मिंघम रवाना होने से पहले कहा था कि इस बार उनकी निगाह सोने के तमगे पर है. अपने इस सपने को साकार करने से भारतीय टीम अब एक जीत दूर है.
भारत ने दक्षिण अफ्रीका को 3-2 से हराकर कॉमनवेल्थ गेम्स पुरुष हॉकी के फ़ाइनल में स्थान बना लिया है.
भारत का अब फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेले जाने वाले दूसरे सेमीफ़ाइनल में जीत पाने वाली टीम से होगा. भारत ने इन गेम्स में दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ कभी नहीं हारने के रिकॉर्ड को बनाए रखा.
दोनों टीमों के बीच इससे पहले 1998, 2006 और 2014 में इन गेम्स में मुक़ाबला हुआ था और सभी मुक़ाबलों में भारत को जीत मिली थी.

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दक्षिण अफ्ऱीका को इस फ़ैसले से लगा झटका
दक्षिण अफ्रीका के कोच गेरथ इविंग ने खेल समाप्ति से चार मिनट पहले अपने गोलकीपर गोवन जोंस को बाहर बुलाने का फ़ैसला किया. इस फ़ैसले का मक़सद गोल निकालने के लिए हमलों में तेज़ी लाना था.
इस फ़ैसले से उन्हें एक अतिरिक्त खिलाड़ी मिलना था. पर यह फ़ैसला उस समय बैकफायर होता दिखा, जब भारत को सातवां पेनल्टी कॉर्नर मिला और गोल पर गोलकीपर नहीं होने का फ़ायदा उठाकर जुगराज सिंह ने ड्रेग फ्लिक से गोल जमाकर भारत को 3-1 की बढ़त दिला दी.
दक्षिण अफ्ऱीका ने इस स्थिति में अपने हमलों में पूरी ताक़त लगा दी और खेल समाप्ति से एक मिनट पहले मुस्तफ़ा क़ासिम ने बाएं छोर से सर्किल में घुसकर बेहतरीन शॉट से गोल भेदकर स्कोर 3-2 कर दिया.
यह मौक़ा था, जब यह महसूस किया गया कि दक्षिण अफ्ऱीका ने अगर अपना गोलकीपर नहीं बुलाया होता तो शायद वह तीसरा गोल खाने से बच सकती थी. इस स्थिति में उनका दूसरा गोल जमाना खेल में वापस ला सकता था.

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गोवन जोंस को भेदना रहा बेहद मुश्किल
पेनल्टी कॉर्नरों पर गोल जमाना भारतीय टीम की ताक़त मानी जाती है. भारत की यह छवि बनाने में हरमनप्रीत सिंह की पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में बदलने की क्षमता ने अहम भूमिका निभाई है.
लेकिन दक्षिण अफ्ऱीका के गोलकीपर गोवन जोंस के सुंदर बचाव ने भारत की इस ख़ूबी की हवा निकालकर रख दी. हरमनप्रीत सिंह ने ड्रेग फ्लिक लगाई हो या फिर वरुण को पीछे गेंद सरकाकर शॉट लिया गया हो या फिर हरमनप्रीत सिंह से शॉट लगावाई गई, नतीजा सबका एक ही रहा कि गोल पर चट्टान की तरह डटे गोलकीपर गोवन जोंस ने उन्हें गोल में जाने से रोक दिया.
इन खेलों में यह पहला मौक़ा था, जब भारत पहले सात पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में नहीं बदल सका. यह स्थिति तब थी, जब भारत के बारे में कहा जाता है कि उसके पास हरमनप्रीत सिंह, वरुण कुमार, अमित रोहिदास और जुगराज सिंह के रूप में ड्रेग फ्लिकर विशेषज्ञों की भरमार है. पर वह गोवन को गच्चा देने का कोई तरीक़ा नहीं खोज सका.
पहला क्वॉर्टर सही मायनों में दक्षिण अफ्ऱीका के गोलकीपर गोवान जोंस के नाम रहा. उन्होंने कम से कम चार निश्चित गोल के मौक़े अपने शानदार बचाव से ख़त्म किए. आकाशदीप सिंह तो उनके सामने से उन्हें गच्चा देने में सफल नहीं हो पाए. भारत के लिए सर्वाधिक नौ गोल जमाने वाले विशेषज्ञ ड्रेग फ्लिकर हरमनप्रीत सिंह भी इस दौरान भारत को मिले चार पेनल्टी कॉर्नरों पर उनसे पार पाने में सफल नहीं हो पाए.
उन्होंने इन सभी मौकों पर एंगल को अच्छे से कवर करके ख़ुद को गच्चा खाने से बचाए रखा.

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दूसरे क्वॉर्टर में भारत को मिली राहत
भारतीय फॉरवर्ड ललित उपाध्याय, मनदीप सिंह, आकाशदीप सिंह, गुरजंत भले ही पहले क्वॉर्टर में दक्षिण अफ्ऱीका के डिफेंस में दरार बनाने के बाद गोल भेदने में सफल नहीं हो पाए पर दूसरे क्वॉर्टर में भारतीय फारवर्ड गोलकीपर को गच्चा देने का रास्ता बनाने में कामयाब हो गए.
इस दौरान भारत ने दो गोल जमाकर हाफ टाइम तक 2-0 की बढ़त बना ली. पहले मौक़े पर दाएं फ्लैंक से आए क्रॉस पर अभिषेक ने सर्किल के टॉप से मुस्तफ़ा क़ासिम को साइड करके शॉट लेने के लिए जगह बनाई और रिवर्स शॉट से गोल भेद दिया.
पहला गोल पाने के बाद भारतीय हमलों में पैनापन आने लगा. भारत ने एक काउंटर अटैक पर मध्य मैदान में गुरजंत को गेंद मिली और उन्होंने मनदीप के लिए फॉरवर्ड पास निकाला और उन्होंने फर्राटा लगाकर एक डिफेंडर को काटा और आगे आ रहे गोलकीपर गोवन जोंस के बराबर से गेंद को गोल में डाल दिया. इस गोल ने भारत की बढ़त को बढ़ाकर दो गुना कर दिया.
दक्षिण अफ़्रीका की टीम ओपन गेम खेलने के लिए जानी जाती है. वह विरोधी खिलाड़ियों को मार्क करके खेलने में विश्वास नहीं करते हैं. उनके खेल की जान है काउंटर अटैक. उन्होंने तमाम मौक़ों पर अपनी गति से भारतीय डिफेंस को एकदम से छका दिया.

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मुस्तफ़ा कासिम और उनके भाई दयान क़ासिम ने कई बार दिखाया कि उनको थामना आसान नहीं है. इसके कारण कई बार उसके ऊपर ज्यादा हमले भी बन जाते हैं पर उसे अपने डिफेंडरों और गोलकीपर पर भरोसा रहता है.
क़ासिम के बनाए अटैक पर दक्षिण अफ्रीका 34वें मिनट में लगातार दो पेनल्टी कॉर्नर पाने में सफल रही. चौथे पेनल्टी कॉर्नर पर गाउस ब्राउन ने ड्रेग फ्लिक से एक गोल उतार दिया. यही समय था, जब भारतीय टीम थोड़ी दवाब में दिखी.
इसकी वजह दक्षिण अफ्ऱीका के एक गोल उतारने के बाद पूरी तरह से हमलों पर उतर आना था. पर भारतीय सर्किल में अमित रोहिदास, जुगराज सिंह और हरमनप्रीत का बेहतरीन बचाव से ही दक्षिण अफ्ऱीका थमी रही.

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दक्षिण अफ्ऱीका रैंकिंग के मामले में 13वें स्थान पर है. पर उन्होंने जिस तरह के खेल का प्रदर्शन किया, उसकी जितनी तारीफ़ की जाए, वह कम है. इसकी वजह दक्षिण अफ्ऱीका के कई खिलाड़ियों का यूरोपीय लीग में दुनिया के दिग्गज खिलाड़ियों के साथ खेलना है. इसके अलावा उसके युवा खिलाड़ियों में ग़ज़ब की गति होना है.
भारत को अब फाइनल में पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में बदलने की कला में सुधार को लेकर कोई योजना बनानी होगी. आजकल दिग्गज टीमें इस बात का पूरा विश्लेषण करके आती हैं कि आपका ड्रेग फ्लिकर किस तरह से उसे लेता है, इसलिए वह आपकी काट की तैयारी करके आती हैं.
इसलिए एक योजना नाकाम होने पर उसका विकल्प तैयार रहना ही चाहिए. इसके अलावा विपक्षी टीम के जवाबी हमलों से बचने की तैयारी और पुख्ता करने की ज़रूरत है.
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