टोक्यो ओलंपिक: हॉकी के सेमीफ़ाइनल में बेल्जियम को हराकर क्या भारत रच पाएगा इतिहास?

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
ओलंपिक खेलों में पदकों के 41 साल का सूनापन क्या भारतीय हॉकी टीम दूर कर पाएगी? यह काफ़ी हद तक सेमीफ़ाइनल में बेल्ज़ियम से मुक़ाबले पर निर्भर है. भारत अगर ये मुक़ाबला जीत लेता है तो उसका रजत और स्वर्ण में से कोई एक पदक पक्का हो जाएगा.
अगर भारतीय टीम वर्ल्ड चैंपियन बेल्ज़ियम की चुनौती से पार नहीं पा पाएगी तो उसे कांस्य पदक के लिए मुक़ाबला करना होगा.
यही वजह है कि भारतीय टीम बेल्ज़ियम के ख़िलाफ़ ही मेडल पक्का करना चाहेगी. टीम के सामने पांच साल पुराना हिसाब बराबर करने का भी मौका होगा. पांच साल पहले रियो ओलंपिक के क्वार्टर फ़ाइनल में बेल्जियम के हाथों 1-3 से हारकर ही भारत बाहर हुआ था.
उस हार का बदला चुकाने के लिए इस बार भारतीय टीम थोड़ी बेहतर स्थिति में नजर आ रही है क्योंकि बेल्जियम के साथ हुए पिछले पांच मुकाबलों में से चार मैच भारत ने जीते हैं.
साल 2020 में एफआईएच प्रो लीग के मुकाबले में भारत ने एक मैच में बेल्ज़ियम को हराया था और दूसरे में वह हार गया था. वहीं, इससे पहले 2019 में बेल्जियम का दौरा करके भारत ने दौर के तीनों मैचों को जीत लिया था. यह सही है कि ओलंपिक में खेलते समय हर टीम पूरी तैयारी के साथ उतरती है. पर फिर भी भारत को पिछले दिनों में मिली जीतों की वजह से थोड़ा-बहुत लाभ तो ज़रूर मिलेगा.

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टोक्यो में भारतीय हॉकी टीम ने न्यूजीलैंड के खिलाफ 3-2 से विजय पाकर अपने अभियान की शुरुआत की. लेकिन अगले ही मैच में ऑस्ट्रेलिया ने 7-1 से धोकर भारत की क्षमता पर सवालिया निशान लगा दिया. ऐसा लग रहा था कि भारतीय अभियान पटरी से उतरने जा रहा है पर मनप्रीत सिंह की अगुआई वाली टीम ने इस हार से सबक लेकर अपने खेल को और मजबूती देकर यह जता दिया कि उनकी क्या क्षमता है.
भारत ने इसके बाद स्पेन को 3-0 से, पिछले ओलंपिक चैंपियन अर्जेंटीना को 3-1 से, जापान को 5-3 से हराकर क्वार्टर फ़ाइनल में प्रवेश किया. पिछले चार दशकों में मुझे याद नहीं है कि भारत ने ग्रुप मैचों में इतना अच्छा प्रदर्शन किया हो. इसके बाद भारत ने क्वार्टर फाइनल में ब्रिटेन को 3-1 से हराकर सेमीफ़ाइनल में जगह बनायी.

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भारतीय डिफेंस की होगी असली परीक्षा
भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया से जब पूल के दूसरे ही मैच में 1-7 के अंतर से हार गई थी, तब ऐसा लगा कि हमारा डिफेंस क्षमतावान नहीं है. लेकिन इसके बाद भारतीय डिफेंस ने जिस मजबूती के साथ बचाव किया, उससे उनकी सही ताकत का अहसास हुआ.
लेकिन इस डिफ़ेंस की असली परीक्षा बेल्ज़ियम के सामने ही होनी है क्योंकि बेल्जियम ने क्वार्टर फाइनल तक के मुकाबलों में सबसे ज़्यादा 29 गोल किए हैं. इसका मतलब है कि भारत को बचाव में बहुत ही सजग रहना होगा. आजकल टीमें सर्किल में पहुंचकर गोल जमाने से ज़्यादा कैरिड कराकर पेनल्टी कॉर्नर पाने का ज़्यादा प्रयास करती हैं, इसलिए बचाव के समय यह ध्यान रखना होगा कि कम से कम पेनल्टी कॉर्नर दिए जाएं.

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भारतीय दीवार हैं श्रीजेश
भारतीय हॉकी में 1980 के बाद अगर कोई ओलंपिक मेडल नहीं जीत सकी है तो उसकी सबसे बड़ी वजह टीम के पास अच्छे गोलकीपर का नहीं होना भी रहा है. लेकिन अब हमारे पास श्रीजेश के रूप में विश्व स्तरीय गोलकीपर है. क्वार्टर फइनल के तीसरे क्वार्टर में जब ग्रेट ब्रिटेन के खिलाड़ी ताबड़तोड़ हमले बनाकर भारत पर बराबरी के लिए दवाब बना रहे थे, तब श्रीजेश ही डटकर खड़े थे और प्रतिद्वंद्वी टीम के एक के बाद एक हमले को विफल करके भारत की सेमीफ़ाइनल की राह बनाने में सफ़ल रहे.
भारतीय ताकत ड्रेग फ्लिकर की तिकड़ी
मौजूदा हॉकी में पेनल्टी कार्नर पर गोल करके अक्सर परिणाम तय होते हैं. भारत का सौभाग्य है कि उसके पास इस समय रूपिंदर पाल, हरमनप्रीत सिंह और अमित रोहिदास के रूप में अच्छे ड्रेग फ्लिकर हैं. एक अच्छी बात यह है कि यह तीनों ही डिफेंस में मुस्तैदी के साथ खेलने वाले खिलाड़ी हैं.
भारतीय फारवर्ड सिमरनजीत, गुरजंत आदि जितने टीम को पेनल्टी कार्नर दिला सकेंगे, उतनी ही भारत के जीतने की संभावनाएं बनेंगी. पर यहां यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि बेल्जियम का डिफ़ेंस बेहद ही मजबूत है और उससे पार पाना आसान नहीं है.
इस वजह से ही उन्होंने अब तक सबसे कम 10 गोल खाए हैं. वहीं भारत 14 गोल खा चुका है. पर भारत के गोलों में से ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ खाए सात गोलों को निकाल दें तो भारत की स्थिति भी काफ़ी मज़बूत नजर आती है.

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क्या यह मास्को से भी बेहतर प्रदर्शन
भारतीय टीम ने टोक्यो ओलंपिक हॉकी में अब तक जो प्रदर्शन किया है, उसे 1980 में मास्को ओलंपिक में स्वर्ण जीतने के दौरान किए प्रदर्शन से भी बेहतर मान सकते हैं. असल में मास्को ओलंपिक खेलों का पश्चिमी देशों ने बायकाट किया था, इस कारण कई दिग्गज टीमें नहीं खेलीं थीं. लेकिन इस ओलंपिक में भारत ने दिग्गज टीमों को हराकर अपने को इस मुकाम तक पहुंचाया है. भारत यदि इस बार पोडियम पर चढ़ जाता है तो क्या इसे स्वर्णिम युग की वापसी माना जा सकता है.
स्वर्णिम युग की हम बात करें तो 1928 से 1964 तक के समय को स्वर्णिम युग माना जाता है, इस दौरान भारत ने सात स्वर्ण पदकों पर कब्जा जमाया था, जिसमें से छह तो लगातार ही जीते थे. सही मायनों में मास्को ओलंपिक के बाद भारतीय हॉकी में गिरावट आने लगी, इसकी सबसे बड़ी वजह खेल का घास के मैदानों के बजाय कृत्रिम टर्फ का इस्तेमाल होना था.
भारतीय हॉकी टीम 2008 के बीजिंग ओलंपिक के लिए टीम क्वालिफाई ही नहीं कर पाए और 2012 के लंदन ओलंपिक में आख़िरी स्थान पर रहे. रियो ओलंपिक में स्थिति थोड़ी सुधरी लेकिन टीम आठवें पायदान पर रही.

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यहां तक पहुंचने में तमाम विदेशी कोचों का इस्तेमाल
भारत ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाने पर विदेशी कोचों को आना शुरू कर दिया. जोस ब्रासा, माइकल नोब्स, टैरी वाल्श, पॉल वान ऐस, रोलैंट ओल्टमेंस के रूप में कई कोच आए पर किसी की भी देश के हॉकी संचालकों से नहीं बनने के कारण कई बिना कार्यकाल पूरा किए बगैर ही चले गए.
इन विदेशी कोचों ने टीम की फिटनेस पर सभी ने ज़ोर दिया. पर आख़िर में ग्राहम रीड ही टीम को मुकाम तक पहुंचाने में सफल रहे. उनकी इस सफलता के पीछे भारतीय खिलाड़ी जिस स्टाइल से खेलते थे, उसी को विकसित करना और सबसे बड़ी बात टीम को एकजुट रखना है.
अब देखना है कि क्या उनकी रणनीति वो कमाल कर दिखाएगी, जिसका इंतज़ार भारतीय हॉकी प्रेमियों को बीते चार दशकों से है.
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