महिला विश्व हॉकी कप में भारत को चीन ने रोका, बढ़ी मुश्किल

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेत्र पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत ने महिला विश्व कप हॉकी चैंपियनशिप के पूल बी मुक़ाबले में लगातार दूसरा मैच ड्रॉ खेलकर सीधे क्वॉर्टर फ़ाइनल में स्थान बनाने की संभावनाओं को कमज़ोर कर लिया है. उन्होंने चीन के साथ मुक़ाबला एक-एक से ड्रॉ खेला.
भारतीय टीम भाग्यशाली रही जो चीन को आख़िरी मिनट में दिए गए पेनल्टी कॉर्नर को नकार दिया गया.
भारतीय खिलाड़ियों को जिस तरह के खेल के लिए जाना जाता है, वैसा खेल वह मैच में अधिकांश समय प्रदर्शित करने में असफल रहीं. अटैक में जिस आपसी तालमेल की ज़रूरत होती है, वह देखने में नहीं मिला. कई बार तो आख़िरी समय में ग़लत पास देकर उन्होंने सर्किल में प्रवेश करने का मौक़ा ही गँवा दिया.
भारतीय टीम आमतौर पर त्रिकोण बनाकर अटैक करती है. राइट फ्लैंक में वंदना कटारिया, सलीमा टेटे और नवजोत के बीच यह त्रिकोण बन ही नहीं पाया क्योंकि चीन के डिफेंडर फुर्ती दिखाकर भारतीय खिलाड़ियों तक गेंद पहुँचने से पहले ही पहुँचकर अटैक की जान निकालते रहे. भारतीय टीम जब कभी अच्छा खेलने में सफल दिखी तो चीनी गोलकीपर आंग लू दीवार बन गईं.
भारतीय टीम ने एफआईएच प्रो लीग में भले ही शानदार प्रदर्शन करके अपने से ऊंची रैंकिंग की टीमों के ख़िलाफ़ सफलता प्राप्त की थी. लेकिन उसके भी मैचों में कई बार पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में बदल नहीं पाने की कमज़ोरी देखने को मिली थी.
यह कमज़ोरी इस मैच में भी देखने को मिली. असल में भारतीय खिलाड़ी सीधे शॉट से गोल भेदने का प्रयास करती रहीं और चीन की गोलकीपर ने उन्हें पार पाने का मौक़ा ही नहीं दिया. बेहतर होता कि भारतीय टीम पेनल्टी कॉर्नर लेन में वेरिएशन का इस्तेमाल करती.

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कटारिया ने दिलाई बराबरी
भारतीय टीम ने दूसरे क्वॉर्टर में चेंग जियाली के जमाए गोल से पिछड़ने के बाद एक समय तो मैच खोती नजर आ रही थी. लेकिन आख़िरी क्वॉर्टर में गुरजीत कौर की फ्लिक को वंदना कटारिया के डिफलेक्शन की वजह से ही भारतीय टीम बराबरी का गोल जमा सकी.
भारतीय टीम की उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाने की एक वजह यह भी रही कि चीनी टीम तेज़ गति की हॉकी खेलने के लिए जानी जाती है. भारत ने खेल की गति कम करने का प्रयास ही नहीं किया और वह चीन के जाल में फंस गई. यह देखकर तो और भी आश्चर्य हआ कि आख़िरी मिनटों में भारतीय टीम ने जीत के लिए हमलों पर पूरा ज़ोर लगाने की बजाय बचाव में अपने को व्यस्त रखा.
चेंग ने दिलाई चीन को बढ़त
पहले हाफ में दोनों ही टीमों ने गेंद पर कब्ज़ा लगभग बराबर ही रखा. पर चीनी खिलाड़ी भारत के मुक़ाबले मौक़े को भुनाने में सफल रही और उसने खेल के 25वें मिनट में चेंग जियाली के गोल से बढ़त बना ली. भारतीय टीम की इस दौरान प्रमुख दिक्क़त पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में नहीं बदल पाना रही. भारत की पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ गुरजीत कौर ने सीधे शॉट लिए और चीन की गोलकीपर आंग लू ने बेहतरीन बचाव से गोल भेदने से बचाए रखा.
पहले हाफ के दौरान भारतीय डिफेंस को चीनी खिलाड़ियों को रोकने में दिक्क़त हो रही थी. चेंग के गोल के समय कोई भी डिफेंडर उन्हें रोकने के लिए मौजूद नहीं था और उन्होंने आसानी से गोल भेद दिया.
चीन ने शुरुआत से ही गेंद आने का इंतज़ार करने के बजाय ख़ुद गेंद तक पहुँचने की रणनीति अपनाई , इसमें उनकी गति भी काम आई.

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चीन पर नहीं दिखा दवाब
भारतीय टीम पर पहले मैच में इंग्लैंड से खेलते समय जिस तरह का दवाब था, वह इस मैच में देखने को मिला. वहीं चीन की टीम इस साल तीन मुक़ाबलों में हार चुकी थी पर उसने अपने ऊपर इन हारों का दवाब हावी नहीं होने दिया.
भारत ने पहले एशिया कप के कांस्य पदक के मुक़ाबले में 2-0 से हराया. इसके बाद एफआईएच प्रो लीग के दोनों मुक़ाबलों में 7-1 और 2-1 से हराया था. लेकिन चीन के साथ टीम एकदम से बदली हुई नज़र आई.
भारतीय कोच जानके शोपमैन का भारतीय खिलाड़ियों की सोच में बदलाव लाना भी काम नहीं आ सका. पहले अक्सर होता क्या था कि कोई भी डिफेंडर या मिडफील्डर गेंद को लेकर चलती थी, तो आगे जो भी खिलाड़ी गेंद के लिए आवाज़ लगाता, उसे पास दे दिया जाता था. लेकिन अब खिलाड़ियों को सिखाया गया है कि वह ख़ुद तय करें कि कौन सी खिलाड़ी ज्यादा अच्छी स्थिति में है, जिसे पास दिया जाए. पर चीनी खिलाड़ियों ने भारतीय खिलाड़ियों में घबराहट पैदा कर दी.
फुटबाल में आमतौर पर खिलाड़ियों की आपसी समझ को बढ़ाने के लिए जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है, उसका शोपमैन ने भारतीय खिलाड़ियों की ट्रेनिंग में इस्तेमाल किया. इससे खिलाड़ी के तेज़ी से फैसले लेने की क्षमता विकसित की जाती है.

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भारतीय महिला हॉकी में सुनियोजित विकास की शुरुआत 2017 में शोर्ड मारिन के कोच बनने के बाद ही हुई है. शोर्ड मारिन ने भारतीय खिलाड़ियों में सबसे पहले यह भावना भरी कि वह किसी भी टीम से कम नहीं हैं और उनमें किसी को भी फतह करने का क्षमता है.
टीम की सोच में आए इस बदलाव का परिणाम एक साल पहले टोक्यो ओलंपिक में चौथा स्थान हासिल करने के साथ प्राप्त हुआ. सही मायनों में ओलंपिक के इस शानदार प्रदर्शन ने ही भारतीय महिला हॉकी की कहानी बदल दी, लेकिन यहां शोर्ड मारिन की कमी भारतीय खिलाड़ियों पर साफ दिखी.
टोक्यो ओलंपिक के बाद शोर्ड मारिन के कोच पद से हट जाने और उनके समय विश्लेषणात्मक कोच शोपमैन का मुख्य कोच बनने पर भी टीम की प्रगति बदस्तूर जारी रही पर इस महत्वपूर्ण मौक़े पर टीम में विश्वास की कमी दिखी. भारतीय टीम ने एफआईएच प्रो लीग में तीसरे स्थान पर रहकर विश्व कप में पोडियम पर चढ़ने की उम्मीद जरूर बंधाई थी.
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