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युवराज के साथ एक मुलाक़ात | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस हफ़्ते हमारे मेहमान हैं एक बहुत ही स्पेशल गेस्ट, एक बड़े ज़बर्दस्त और बहुत ही लोकप्रिय क्रिकेटर. जिस क्रिकेटर की हम बात कर रहे हैं वो हैं भारतीय क्रिकेट टीम के उपकप्तान और टीम में सबसे बेहतरीन फ़ील्डर्स में से एक और शायद देश के शायद सबसे ज़्यादा योग्य कुँवारों में से एक भी. हमारे साथ होने के लिए युवराज सिंह आपका शुक्रिया. आपका बहुत-बहुत स्वागत है. आपकी मेहरबानी मैंने आपके बारे में इतना गुणगान कर दिया है कि आप ये भी हैं और वो भी हैं. कुछ ज़्यादा ही कर दिया है आपने... तो चलिए अब शुरुआत करते हैं. आप अपनी कमियां बता दो कि मैं तो बर्बाद हूँ, मुझे कुछ नहीं आता-जाता. कमियाँ.. कमियाँ बहुत सारी है मेरे में लेकिन लोग मुझसे बहुत प्यार करते हैं. मैं उनको बता नहीं सकता कि मैं कितना आलसी हूँ. वैसे अभी आप आलसी लग भी रहे हैं, थक जाते हैं न खेल-खेल के. असल में जिस तरह का क्रिकेट चल रहा है आजकल उसमें मुश्किल हो जाता है अच्छी नींद लेना. पर कोशिश पूरी की जाती है. इसी बात से शुरू करते हैं कि आईपीएल टूर्नामेंट चल रहा है और इसकी लोकप्रियता भी है. लेकिन इसका जो मैच कार्यक्रम है, इतनी यात्रा, इतना ज़बर्दस्त.. एक तरह से बिल्कुल बिना रुके लगातार काम. आदमी का शरीर है, कहीं तो असर होता है? आप देखिए, पिछले छह-सात साल से क्रिकेट काफ़ी बढ़ गया है. 50 ओवरों वाले मैच बहुत ज़्यादा हो गए हैं. अब ट्वेंटी-20 आ गया है. निश्चित रूप से खिलाड़ियों का काम बढ़ गया है और उसी के हिसाब से अपनी फ़िटनेस बनाए रखनी होती है. सफ़र इतना ज़्यादा होता है कि एक खिलाड़ी के रूप में जवाबदेही काफ़ी बढ़ गई है. फ़िटनेस की बात करें तो जब युवराज सिंह आए थे क्रिकेट में... (अपने समय में आपके पिताजी का कैच लेने का रिकॉर्ड था. बहुत अच्छे फ़ील्डर की तरह लोग उन्हें भी याद करते हैं) शुरू में सब बात करते थे ये युवराज सिंह क्या गज़ब फ़ील्डर है. मैदान में कहीं भी खड़ा हो, दौड़कर गेंद रोकता है, ज़बर्दस्त कैच लेता है और थोड़े दिन पहले जो मुंबई के साथ मैच में वो जो हवा में रहे तो बहुत लोगों ने कहा कि ये तो सुपरमैन है. आपने फ़ील्डिंग पर सच में बहुत काम किया है? पहली बार मैंने जब फ़र्स्ट क्लास मैच खेला पंजाब के लिए तो उसमें मेरा ख़राब प्रदर्शन रहा था. मुझ पर काफ़ी आरोप लगे और कहा गया कि अगर मुझे आगे फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट खेलना है तो फ़ील्डिंग में सुधार करना होगा. उसके बाद मैं एक-दो साल बाहर रहा और उस दौरान मैंने फ़ील्डिंग पर बहुत ज़ोर लगाया और अब ठीक-ठाक कर लेता हूँ. आपको सबसे फ़ायरब्रांड यंग क्रिकेटर के रूप में लोग देखते हैं. क्या क्रिकेट ही शुरू से पहली पसंद थी कैरियर की- कि मुझे यही बनना है? बिल्कुल नहीं. मेरे माता-पिता कहते हैं कि जब मैं छोटा था तो बैट लेकर इधर-उधर घूमा करता था. जब से मैंने होश संभाला मुझे स्केटिंग और टेनिस का बहुत शौक़ था. क्रिकेट का भी शौक था लेकिन इतना नहीं. हर एक खेल खेलने का शौक था जैसे कि हर बच्चे को होता है. लेकिन स्केटिंग पर मेरा काफ़ी ज़ोर था और उसमें मैंने काफ़ी मेडल भी जीते. बीच में मैंने टेनिस भी खेला लेकिन मेरे पापा को ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था. जब मैं 13-14 साल का हुआ तो पापा ने कहा कि स्केटिंग और टेनिस बहुत हो गया, अब क्रिकेट खेलो. वे मुझे ज़बर्दस्ती ले जाते थे, मुझे शुरू में अच्छा नहीं लगता था. लेकिन जब मैं जाने लगा तो उसमें मेरी रुचि बढ़ने लगी. जहाँ मैं दो दिन खेलने जाता था, वहाँ पूरे हफ़्ते खेलने लगा. उसके बाद काफ़ी मज़ा आने लगा क्रिकेट में. आपने कहा कि बचपन में बैट लेकर इधर-उधर घूमता था. बचपन में बैट लेकर तो भारत का हर बच्चा और बच्ची भी घूमते हैं लेकिन उससे छह छक्के निकल जाएँ, ऐसा तो किसी-किसी की किस्मत ही होती है. सही बात है. आजकल इतना क्रेज़ है क्रिकेट का. हर बच्चा क्रिकेट की बात करता है, पढ़ाई की कम. जो मेरे हिसाब से सही नहीं है. इसे संतुलित होना चाहिए. लेकिन छह छक्के कभी सोचा नहीं था मैंने. और बहुत सी चीज़ें मैंने सोची थीं लेकिन जो आप सोचते हैं वो अक्सर होता नहीं है. बहुत संतुलन होना चाहिए पढ़ाई और खेल के बीच में, ऐसा युवराज सिंह कह रहे हैं. ख़ुद पढ़ाई में कैसे थे. बहुत ठीक नहीं था. मेरे परिवार का माहौल खेल में रुझान वाला था. मेरी माँ ने बॉस्केटबॉल में राष्ट्रीय टीम में खेला था, मेरे पिताजी ने भारत के लिए क्रिकेट खेला था. पढ़ाई ज़रूरी होती थी लेकिन ऐसा कभी माहौल नहीं था कि बस पढ़ते रहो. मैं एक अच्छा छात्र था, मेधावी था, मर-मुराकर, गाड़ी निकालकर किसी तरह पास हो जाता लेकिन सारा ध्यान मेरा क्रिकेट पर ही रहता था. मम्मी भी खेलती थीं तो उनका भी कभी बहुत ज़ोर नहीं रहा होगा कि पढ़ाई कीजिए और इसमें कोई करियर बनाइए. नहीं, मम्मी-पापा बोलते थे कि पढ़ना ज़रूरी है लेकिन ऐसा नहीं रहा कि अगर आप पढ़ोगे नहीं तो आप कुछ नहीं कर सकते. जैसे बहुत बच्चों के ऊपर दबाव दिया जाता है कि पढ़ना बहुत ज़रूरी है. एक हद तक शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन मां-बाप को ये देखना चाहिए कि बच्चे के लिए क्या बेहतर है, बच्चा क्या करना चाहता है अपनी ज़िंदगी में. मेरे ख़्याल से किसी भी बच्चे को इस बात के लिए दबाव नहीं देना चाहिए कि उसे भविष्य में क्या बनना है. युवराज सिंह बीबीसी एक मुलाक़ात का सफ़र आगे बढ़ाएँ. इस कार्यक्रम में हमारे मेहमान से, और ख़ासकर आप जैसा रौनक वाला मेहमान हो तो ज़रूर पूछते हैं कि अपनी पसंद का गाना बताएँ और फ़िर सफ़र आगे बढ़ाएँगे.
दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे मेरी पसंदीदा फ़िल्मों में एक है. इसका गाना रुक जा ओ दिल दीवाने मुझे पसंद है. आपकी जो एक इमेज है वो ये कि आप बहुत कड़े मिज़ाज वाले या पक्के इरादे वाले हैं. कुछ हद तक कड़े मिज़ाज वाला गर्म दिमाग वाला भी हो सकता है. ऐसे हैं आप. मैं काफ़ी ऐसा हूं. बचपन में जब 19-20 साल की उम्र में भारत के लिए खेलना शुरू किया था तो काफ़ी गर्म मिज़ाज था लेकिन जैसे-जैसे आप बड़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे आप परिपक्व होते जाते हैं तो आपको कई चीज़ें समझ में आने लगती हैं. कई मौक़े होते हैं जब आपको अपने गुस्से पर काबू रखना पड़ता है. कोशिश करता हूँ ऐसा करने की. और कई बार जब आसपास देखते हैं कि लोग गुस्से पर काबू नहीं कर पाते हैं तो उन्हें कुछ सीख देते हैं. सीख नहीं लेकिन जो भी मेरे लोग होते हैं, जूनियर होते हैं उनको मैं कोशिश करता हूँ समझाने की, कोई भी मिसाल दे देता हूँ कि ये चीज़ ठीक नहीं है. हर आदमी को मालूम है कि गुस्सा एक ऐसी चीज़ है जिसे बड़े मौकों में नियंत्रित करना पड़ता है. हाल के वर्षों में हमने ये भी देखा है और जैसा कि आपने भी कहा कि बहुत क्रिकेट हो रहा है, बहुत प्रतिस्पर्धा वाला क्रिकेट हो रहा है. भारतीय क्रिकेटरों में एक नई आक्रामकता भी दिखने लगी है जो पहले नहीं नज़र आती थी. उसके वजह से कई ऐसी चीज़ें हो रही हैं जो पहले नहीं होती थीं या नहीं होना चाहिए. ऐसा नहीं लगता कि रूतबा दिखाने की जो इच्छा होती है, वह कभी-कभी थोड़ा आगे निकल जाती है, बिना यह महसूस किए कि आप अच्छे रवैये से ख़राब रवैये की लक्ष्मणरेखा को पार कर गए हैं. नहीं. मेरा मानना है कि ज़िंदगी में हर चीज़ का संतुलन होना चाहिए. लेकिन जहाँ तक आक्रामकता की बात है तो वह खिलाड़ी के अंदर होती ही है. कोई खिलाड़ी आक्रामक है, यह उसमें पहले से ही होता है. यह स्वाभाविक रूप से होता है. जैसा भी उसका व्यक्तित्व होगा, उसकी वैसी ही भावनाएँ बाहर आएँगी. और आपने सही कहा कि जो रेखा है उसे लाँघना नहीं चाहिए. आक्रामकता और ठाठ एक अच्छी बात है लेकिन एक सीमा है जिसे पार नहीं करना चाहिए, उसके अंदर ख़ुद को रखना चाहिए. एक और सवाल जो सबके दिमाग में आता है क्योंकि अभी के सबसे बड़े यूथ आईकॉन हैं भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान और उपकप्तान. किसी को उपकप्तान ज़्यादा पसंद आता है तो किसी को कप्तान ज़्यादा पसंद आता है. क्या दोनों में कुछ प्रतिद्वंद्विता भी है. मेरे ख़्याल से प्रतिद्वंद्विता और मुक़ाबला जैसी बातें मीडिया की हैं. मैं और धोनी बहुत अच्छे दोस्त हैं और एक-दूसरे की मदद करते हैं किसी भी समय में क्योंकि हम समझते हैं कि खेल कैसे खेला जाता है. धोनी बहुत युवा हैं, वो मेरे तीन-चार साल खेलने के बाद आया और भारतीय टीम की कप्तानी कर रहा है तो ऐसे में एक नौजवान के रूप में उसे टीम के सहयोग की बहुत ज़रूरत है और टीम उसे बहुत पसंद करती है, बहुत सहयोग करती है. ठंडे दिमाग के आदमी हैं वो जो कि बहुत ज़रूरी है एक कप्तान के लिए. लेकिन कम उम्र में एक कप्तान बनने की कई चुनौतियाँ होती हैं और मैं जानता हूँ कि ये सवाल मुझे शायद धोनी से पूछना चाहिए लेकिन जिस टीम में इतने दूसरे सीनियर खिलाड़ी हों, आप उपकप्तान हों तो क्या कभी कोई, किसी किस्म की दुविधा या जटिलता पैदा होती है. नहीं, जटिलता नहीं. भारतीय टीम की कप्तानी करना गौरव की बात है, मैं भी चाहता हूँ कि मैं भी कप्तानी करूँ लेकिन सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण चीज़ ये देखना है कि आपकी टीम के लिए क्या अच्छा है और एक टीम के रूप में आप उसे लेकर कहाँ जा सकते हैं. मुझे लगता है कि टीम क्या करना चाहती है यह किसी की निजी चाह से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है. टीम किसी भी आदमी से पहले आती है. युवराज सिंह, आप तो बहुत ही संतुलित जवाब दे रहे हैं, बिल्कुल उम्मीद से परे जैसा लोग उनके बारे में सोचते हैं. तो बीबीसी एक मुलाक़ात का सफ़र बढ़ाएँ, प्लीज़ अपनी पसंद का एक और गाना बताएँ. रेस का गाना है आजकल, धीमा सा... हम तो ये सोचते हैं कि आपको सिर्फ़ तेज़ गाने ही पसंद आते होंगे. मुझे तेज़ गाने पसंद आते हैं लेकिन माहौल थोड़ा धीमा हो तो धीमा गाना बजाएँ. अच्छा ये बताएँ कि आपको माना जाता है कि महिलाओं के साथ ज़बर्दस्त हिट हैं. जिस तरह छक्के मारने की कोशिश में लगे रहते हैं उसी तरह इस छवि को भी जीने का दबाव दिमाग पर रहता होगा. ये ऐसी छवि है जिसको मैं जीना नहीं चाहता क्योंकि कोई इसे अच्छी नज़र से देखता है तो कोई इसे ख़राब मानता है. लेकिन मैं तो अच्छी भावना से पूछ रहा हूँ. मेरा मानना है कि एक नौजवान लड़के के रूप में मैं क्रिकेट खेलूं और उसके बाद मैं घर बैठूँ और फ़िर क्रिकेट खेलूँ और घर बैठूँ. भारत में दिक्कत ये है कि लोग आपको पूछते हैं और आपको आदर्श मानते हैं तो उनके बारे में जब भी मैदान से बाहर की बात होती है तो वो आपके ख़िलाफ़ चली जाती है. इसलिए लोगों को महसूस करना चाहिए कि आप भी एक आम इंसान की तरह हैं, आपका भी सामान्य जीवन है. ये ठीक है कि जब आपका नाम होता है तो आपकी ज़िंदगी आम ज़्यादा हो जाती है, निजी कम रह जाती है. जैसे हर सामान्य लड़का अपनी ज़िंदगी जीता है, मैं भी उसी तरह से जीता हूँ और मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई ख़राब बात है. मैं तो बिल्कुल नहीं कह रहा कि इसमें कोई ख़राब बात नहीं है. मेरा सवाल तो बस इतना है कि जैसे लोग बोलने लगते हैं कि ये बड़ा इश्कबाज़ है, बड़ा आकर्षक है, बड़ा ख़ुशमिज़ाज है, बड़ा हिट है लड़कियों के बीच में तो थोड़ा उस छवि का भी एक दबाब बन जाता है. कई बार मन नहीं भी कर रहा होता है तो भी झूमना पड़ता है. ऐसा है क्या.. मेरे साथ ऐसा कोई दबाव नहीं होता है. और आप जो ये नाम बोल रहे हैं, वो सुनकर मुझे असल में.... नहीं, शर्म आ रही है तो शरमाइए. हाँ, मैं झेंप रहा हूँ. ये ऐसा ठप्पा है जिससे मैं ख़ुश नहीं हूँ हालाँकि मुझ पर ये ठप्पा लग गया है लेकिन इस पर मुझे कोई गर्व नहीं है. मुझे इश्कबाज़ (कैसेनोवा) जैसे ठप्पों के बदले भारत के लिए खेलने और उसमें बेहतर करने पर ज़्यादा गर्व होता है. चलिए हम आपको शर्मीला बुलाएँगे, संकोची बुलाएँगे, लजीला बुलाएँगे, अंतर्मुखी बुलाएँगे. शादी की कोई प्लानिंग कर रहे हैं आप? शादी..संजीव जी, लड़की ढूंढ़ दीजिए, शादी मैं अभी कर लूँगा. नेकी और पूछपूछ. हम इसी बहाने लड़कियाँ ढूंढ़ने निकल जाएँगे कि युवराज के लिए ढूंढ़ रहे हैं. अच्छा ये बताइए जो आपकी हल्की दाढ़ी है, बिल्कुल अभिषेक बच्चन की तरह. आजकल ज़्यादातर लड़कों में देखता हूँ, पहले लोग दाढ़ी बनाकर रहते थे लेकिन आजकल हल्की दाढ़ी रखे देखता हूँ. काफ़ी लोग मुझे अभिषेक बच्चन की तरह बोलते हैं लेकिन उनकी अपनी पहचान है और मेरी अपनी पहचान है. मैं तो सबसे यही बोलता हूँ कि मैं उनसे ज़्यादा अच्छा दिखता हूँ जो कि सच बात नहीं है. उनकी बात करें तो उनकी पत्नी सबसे ख़ूबसूरत महिला हैं. ये एक शानदार जोड़ी है. तब तो युवराज सिंह की बीवी को उनसे भी ख़ूबसूरत होना पड़ेगा. नहीं ये कोई कसौटी नहीं है. मुझे लगता है कि जीवनसाथी के साथ आपका सही तालमेल होना चाहिए, वो खू़बसूरत हो न हो, दिल ख़ूबसूरत होना बहुत ज़रूरी है. आपके सपनों की लड़की कैसी होगी, जिसके साथ घर बसाना चाहेंगे. मैं भी शादी करना चाहता हूँ. मैंने देखा है कि जिसका पारिवारिक जीवन अच्छा होता है, वह जीवन में बहुत सफल रहता है. जीवनसाथी के लिहाज़ से मेरा भाग्य बहुत अच्छा नहीं रहा है. लेकिन भारतीय टीम की तरफ़ से खेलने के कारण मेरे ऊपर जिस तरह की जवाबदेही होती है, यह ज़रूरी है कि कोई उसे समझे, ये समझे कि हमें कितना सफ़र करना पड़ता है, खेलने में कितना दबाव रहता है और वापस आकर... जीवनसाथी के साथ आपसी समझदारी और तालमेल हो जो समझे कि आप किस दबाव में हैं और वो उसमें साथ दे, ख़ुशी दे. युवराज सिंह ख़राब भाग्य वाले क्यों रहे. ज़्यादातर लोग तो यही समझते हैं कि भारत की जो ख़ूबसूरत महिलाएँ हैं उनके साथ युवराज डेटिंग कर ही चुके हैं, अब आगे बढ़ चुके हैं. उसके बाद... उस पर मैं कुछ नहीं कहना चाहूँगा लेकिन.... तो अभाग्यशाली किस तरह से... अनलकी इस तरह से कि जो सही जीवनसाथी हो, मुझे नहीं मिली. लेकिन मैं दूसरे को दोषी नहीं ठहराता. कई बार बातें नहीं बन पातीं लेकिन जिससे मन मिले, ऐसा साथी ढूँढ़ने में मुझे हमेशा मुश्किल हुई है. हो सकता है कि मैं ही ताल नहीं मिला पा रहा हूं. हो सकता है मेरी जीवनशैली दूसरे को पसंद नहीं हो या उसकी जीवनशैली मुझे पसंद नहीं आ रही हो तो फिर मेरे लिए ज़िंदगी में तालमेल बैठाना काफ़ी मुश्किल होगा. भारत का सबसे जांबाज़ बल्लेबाज़ और सबसे दमदार खिलाड़ी लगता है कहीं दिल पर कोई ज़बर्दस्त चोट खाए बैठा है. चलिए क्रिकेट पर लौटते हैं. छह छक्के की बात कर रहे थे हम, आपने अपने इंटरव्यूज़ में पहले भी कहा है कि मैंने कभी नहीं सोचा था, फिर अगली गेंद पर नहीं सोचा था लेकिन जब छह छक्के मार लिए तो कैसा लगा. असल में वो जो माहौल था मैं उस समय बहुत आक्रामक था. मुझे कोई उकसाए तो मेरे लिए ध्यान केंद्रित कर पाना ज़्यादा आसान हो जाता है. जब छह छक्के मैंने मार लिए उसके बाद मैं उसे लेकर ख़ुश था लेकिन कोई रोमांच नहीं ज़ाहिर किया. लेकिन जब मैं पवैलियन लौटा तो मैंने रिप्लेज़ देखे, दर्शकों की प्रतिक्रिया देखी, मेरे फ़ोन पर दो-तीन सौ मिस्ड कॉल, दो सौ साठ एसएमएस थे, तब मुझे गर्व महसूस हो रहा था कि मेरा नाम इतिहास में दर्ज हो गया है. वापस आए, मुंबई में बस की छत पर... विश्व कप जीतने की ख़ुशी अलग ही थी. वो ख़ुशी जो हमें मुंबई में हासिल हुई. वो तीन-चार घंटे जो हम बस की छत पर थे, उस दिन लोगों को देख कर जो ख़ुशी मिली, मुझे नहीं लगता कि ऐसा दिन फिर दोबारा मेरी ज़िंदगी में आएगा. उस दिन बारिश हो रही थी और जब हम विमान से बाहर आए तो हमें लगा कि इतने सालों बाद हम विश्व कप जीतकर आए हैं लेकिन क्या हमें इस बारिश में कोई देखने आएगा. लेकिन जब हम हवाई अड्डे से बाहर आए तो पूरा मुंबई उमड़ा हुआ था. आपने छह छक्कों वाली आक्रामकता की बात कही. आप गेंद को किसकी तरह से देखकर मार रहे थे, उसमें कोई नज़र आ रहा था क्या. ऐसा कुछ नहीं है. अंतिम दो ओवर बचे थे और खोने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था. मुझे बस जाकर मारना था और मैं भाग्यशाली रहा कि हर गेंद को मैंने जैसे चाहा, मारा. मैंने कोई योजना नहीं बनाई थी लेकिन जब पाँच छक्के लग गए तो मैंने सोचा कि छठा भी मारने की भरसक कोशिश करूँगा. अभी आईपीएल में मुंबई के ख़िलाफ़ मैच में जो आपने हवा में थोड़ी देर रहकर रन आउट कराया, उस समय मन में कुछ चल रहा था क्या. ऐसे समय में लगता है कि मेरे को चोट लग सकती है, दाँत टूट सकता है, गिर जाऊँगा ऊपर-नीचे. चोटें वगैरह तो खेल का हिस्सा हैं. चोटें हम बचपन से खाते आ रहे हैं. एक गेंद पर उनको दो रन चाहिए था और मैंने ये कोशिश की थी कि एक रन रोकूँ और भाग्य से गेंद मेरे हाथ में आ गई फिर मैंने स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी कि मैं खु़द जाकर विकेट पर गेंद लगाऊँ क्योंकि मुझे पता था कि मैं बल्लेबाज़ से काफ़ी आगे हूँ. मैं एक बात ज़रूर कहूँगा जो काफ़ी लोगों को पता नहीं होगी. जब मैं छोटा था तो मैंने जोंटी रोड्स को देखा था इंज़माम को रन आउट करते हुए विश्व कप में और मेरे मन में ऐसी सीन कौंधती रहती थी और सोचता था कि मैं भी एक बार ऐसा रन आउट करूँगा. क्योंकि मुझे मालूम था कि मैं अच्छा फ़ील्डर हूँ और मुझमें ऐसा करने की क्षमता है और इतने सालों के बाद वो चीज़ सच हुई है. बीबीसी एक मुलाक़ात का सफ़र आगे बढ़ाएँ युवराज सिंह आपके साथ. अपनी पसंद का कोई नया रॉकिंग गाना बताएँ. ये बड़ा मुश्किल काम है. ओम शांति ओम से भी बता सकते हैं. ओम शांति ओम का गाना... दीवानगी अच्छा गाना है. आपको इतनी हँसी क्यों आ गई मेरे सवाल पर. जिस तरह से आपने मुझसे पूछा, आपने एक बड़ी अच्छी फ़िल्म का नाम बताया. शाहरूख़ ख़ान मेरे पसंदीदा अभिनेता हैं और मुझे उनकी फ़िल्में देखना पसंद है तो मुझे शायद इसीलिए हँसी आ गई. मुझे आपकी ऑस्ट्रेलिया की तस्वीर भी याद आ रही है लेकिन आपको छेड़ेंगे नहीं ज़्यादा. आप अच्छे लड़के हो. अपनी एकदिवसीय पारी में आप सबसे शानदार पारी किसे गिनते हैं. एक तो छह छक्के वाली थी. जहाँ तक मुझे ध्यान आ रहा है चार-पाँच साल पहले इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मोहम्मद कैफ़ के साथ एक बड़ी ज़बर्दस्त साझीदारी आपने ही की थी क्या.. जी, जी ज़बर्दस्त पारी थी वो भी. आप अपनी पसंद की पारी बताइए. तीन-चार हैं. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ पिछले दौरे के दौरान सिडनी में मैंने 139 रन बनाए. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ टेस्ट मैच में 169 रन बनाया जब 60 रन पर चार विकेट गिर चुके थे. और आपने जो इंग्लैंड के मैच की बात की, उसमें 69 रन बनाया. हां, लोग मान चुके थे कि हारे लेकिन...क्या खेल हुआ था उस दिन मैंने वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ 93 रन बनाए थे. अंतिम विकेट था और हमें जीतने के लिए 20 रन चाहिए थे. 2 रन चाहिए थे जब जीतने के लिए तब मैं आउट हो गया. मुझे ज़िंदगी भर इस मैच को हारने का दुख रहेगा. वीरेंद्र सहवाग से हम इसी कार्यक्रम के लिए जब इंटरव्यू कर रहे थे तो उन्होंने कहा था कि अच्छा खिलाड़ी और महान खिलाड़ी में अंतर ये होता है कि महान खिलाड़ी बहुत जल्दी फ़ॉर्म में लौटता है लेकिन अच्छे खिलाड़ी को थोड़ा वक़्त लग जाता है. इसी को दूसरी तरह से मैं पूछ रहा हूँ कि जब अच्छे दिन नहीं चल रहे होते हैं बल्ले के साथ और फिर भी हमेशा आप बैट लेकर निकलते हैं और जल्दी आउट होकर आ जाते हैं, उन दिनों क्या लग रहा होता है मन में, क्या सच में लगातार यही सोचते रहते हैं कि यार ठीक हो जाऊँगा, जल्दी फ़ॉर्म में वापस में आ जाऊँगा या दरअसल वह कमज़ोर पड़ जाता है. आदमी काफ़ी कमज़ोर पड़ जाता है. मन में नकारात्मक ख़्याल बहुत ज़्यादा आने लगते हैं. यह इस पर भी निर्भर करता है कि जीवन का कौन सा चरण है. अगर युवा हैं तो वापस आ पाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि कोई आपकी मदद करने वाला नहीं होता. लेकिन जब आप परिपक्व और अनुभवी होते हैं और पहले अच्छा प्रदर्शन कर चुके होते हैं तो आपको भरोसा होता है. भारत में एक बार नाकाम रहने पर लोग इस तरह बात करते हैं जैसे कि आपने दस बार ख़राब प्रदर्शन किया हो.
अभी ऑस्ट्रेलिया में दो टेस्ट मैच में मैंने ख़राब प्रदर्शन किया तो ऐसी बातें होने लगी कि मेरा फ़ॉर्म कोई एक-दो साल से ख़राब है और मुझे टीम से निकाल देना चाहिए. और जब ये बहस चलती है कि ये टेस्ट खिलाड़ी अच्छा है और ये एकदिवसीय खिलाड़ी अच्छा है. ये ठीक है कि सारे खिलाड़ी बहुत तेज़ नहीं खेल पाते लेकिन बिल्कुल उल्टा हो जाना बहुत सही नहीं लगता. भारत में बहुत ज़्यादा प्रचार है हर चीज़ की. मीडिया की नज़र, लोगों का दबाव और पूर्व क्रिकेटरों का दबाव. इसलिए मैंने ये महसूस किया है कि मीडिया या पूर्व क्रिकेटरों की बजाय अपने टीम के सहयोगियों की सुनें जो आपको रोज़ देखते हैं, रोज़ आपका आकलन करते हैं. और अपने आप में विश्वास रखिए. लेकिन उसी तरह के रिटर्न भी हैं. कड़ी चुनौती है लेकिन रिटर्न भी ज़बर्दस्त हैं. रिटर्न हैं, ज़रूर हैं लेकिन सिर्फ़ हमें ही नहीं है. विश्व में दूसरे खेलों के खिलाड़ियों को भी रिटर्न मिलता है, वे भी बहुत पैसे कमाते हैं. यूरोप में फ़ुटबॉल है. रिटर्न है लेकिन दबाव को झेल जाना इतना आसान नहीं है. हाल में जो ट्रेंड आया है. अगर टीम अच्छी नहीं खेल रही है तो टीम के मालिक को लेकर कुछ ख़बरें छपने लगती हैं. कुछ बयान भी दे देते हैं. ये भी एक नया दबाव हो जाएगा धीरे-धीरे, क्रिकेटर का सार्वजनिक अपमान हो सकता है. टीम का मालिक कुछ बोल सकता है. हो रहा है ये. फ़्रैंचाइज़ के रूप में एक मालिक के लिए ये ज़रूरी है कि वह यह समझे कि क्रिकेट क्या है. जिस आदमी ने कभी क्रिकेट नहीं खेला हो तो वह नहीं समझ सकता कि यह खेल क्या है. और जो दबाव हमारे ऊपर आते हैं वो आसान नहीं होते. सभी फ़्रैंचाइज़ को यह समझना चाहिए कि आईपीएल में आठ टीमें खेल रही हैं जिसमें चार सेमीफ़ाइनल में पहुँचेंगी, दो फ़ाइनल में और जीतेगी कोई एक टीम. हर टीम ज़ोर लगाती है, हारना किसी को पसंद नहीं है. जो फ़्रैंचाइच़ हैं वे अपने-अपने क्षेत्र के सफल लोग हैं और वे हारना पसंद नहीं करते जो अच्छी बात है लेकिन उन्हें यह भी समझना चाहिए कि खिलाड़ियों पर क्या दबाव होता है. हां सही बात है. ठीक है कि हारना अच्छा नहीं लगता लेकिन मान-सम्मान बनाकर रखें तो बेहतर है. आपको एक कप्तान के रूप में आलोचना सुननी पड़ती है और जवाबदेही लेनी पड़ती है. लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि लोग आपका सम्मान करें. आप फ़िल्में देखते हैं काफ़ी किस तरह की सब तरह की अच्छी किस तरह की लगती हैं. हिंदी फ़िल्में पसंद हैं मुझे, अंग्रेज़ी में कॉमेडी फ़िल्में बहुत पसंद है. आजकल इतना दौरा चल रहा है कि थियेटर नहीं जा पाते हैं. सफ़र के दौरान डीवीडी पर देख लेते हैं. पसंदीदा अभिनेता शाहरुख़ ख़ान. ज़्यादातर मैं शाहरुख़ की फ़िल्में देखता हूँ. अभिषेक बच्चन की फ़िल्में देखता हूँ. अभी अभिषेक की नई फ़िल्म आई है ‘सरकार 2’ तो मैं उसका इंतज़ार कर रहा हूँ. अभिषेक बच्चन से मुलाक़ात हुई है. उसने कभी कहा है कि हम दोनों एक जैसे दिखते हैं. कहा नहीं है. अभिषेक मेरा अच्छा दोस्त है लेकिन उसने ऐसा कहा नहीं है. कहा भी होगा, तो वह मज़ाक होगा. और आपकी टीम की मालिक हैं प्रीति ज़िंटा. जी. प्रीति की फ़िल्में अभी देखनी पड़ेंगी मुझे. वरना प्रीति की तरफ़ से कभी भी मुझ पर वार हो सकता है. लेकिन काफ़ी अच्छी खेल भावना दिखा रही हैं वो अभी तक. वो बहुत अच्छी लड़की हैं. बहुत हँसमुख हैं, बहुत आकर्षक हैं. उन्होंने इस टीम के लिए बहुत प्रयास किया है ताकि किसी खिलाड़ी को कोई दिक्कत न हो. खाना, पीना, सफ़र.. सब कुछ सही है. साथ में नेस वाडिया भी हैं. उन्होंने टीम को बहुत सपोर्ट किया है. हम ख़ुश हैं. फ़िल्म उद्योग में जो आपके कुछ दोस्त हैं उसमें कुछ के साथ आपके नाम भी छपे, चर्चा भी हुई. कुछ सच्चाई थी उसमें या चर्चा ही ज़्यादा हुई. या ये बात नहीं करें. आप आज़ाद हैं जवाब देने के लिए. हमारी.... लेकिन बोलें तो मन से बोलें. नहीं मैं कोई इनकार नहीं कर रहा. मैं चोर नहीं हूँ, मैं भाग नहीं रहा किसी से. कहते भी हैं कि आग के बिना धुआँ नहीं उठता. लेकिन दिक्कत ये है कि कई बार चीज़ें ज़्यादा हो जाती हैं. आप किसी से मिलते हैं तो बेवजह नाम जुड़ जाता है. जो कुछ बोला जाता है उतनी चीज़ें नहीं हुई हैं. मेरे काफ़ी दोस्त फ़िल्म उद्योग में हैं, पूरी दुनिया में हैं. मैं ऐसा आदमी नहीं हूँ जो कोई भी चीज़ छुपकर करूँ. कोई, दोस्त दोस्त न रहा जैसा मामला... देखिए मुझे किसी चीज़ से छिपाना नहीं है अपने आपको. लेकिन मैं इस तरह का आदमी हूँ जो अपनी निजी ज़िंदगी पर सार्वजनिक रूप से बातें नहीं करता. ज़िंदगी पर यूँ ही इतनी सार्वजनिक चर्चा हो चुकी होती है कि कुछ रह नहीं जाता. थोड़ा बहुत जो निजी जीवन बचा है, उसे मैं अपने पास रखना चाहूँगा. और हमें उसका सम्मान करना चाहिए. आपका पसंदीदा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर कौन है. पसंदीदा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर रिकी पोंटिंग हैं. सचिन तेंदुलकर के बाद अगर मैंने किसी को परखा या देखा है तो मैं उनकी बल्लेबाज़ी पसंद करता हूँ. और टीम में सबसे अच्छे दोस्त कौन हैं. सभी अच्छे दोस्त हैं लेकिन जिनके साथ मैं ज़्यादा उठता-बैठता हूँ उनमें सचिन हैं, हरभजन हैं, ज़हीर ख़ान, आशीष नेहरा. हरभजन को आपने समझाया कि दोबारा ऐसा मत करना नहीं तो करियर ख़राब हो जाएगा. मैं समझता हूँ कि हरभजन बहुत परिपक्व आदमी हैं और वे समझते हैं कि उनकी अपनी ग़लती है. उनको भी मालूम है कि ऐसा नहीं होना चाहिए था. जैसे आक्रामकता में काफ़ी चीज़ें हो जाती हैं. हर आदमी ग़लतियाँ करता है. मुझे भरोसा है कि वो अपनी ग़लतियों से सीखेंगे और एक अच्छा खिलाड़ी, एक जवाबदेही और एक अच्छी आक्रामकता के साथ वापस आएगा. अपने ख़ाली समय में युवराज सिंह क्या करते हैं. खाली समय में अपना ज़्यादातर समय मैं माँ और छोटे भाई के साथ बिताता हूँ. ये दोनों मेरे बहुत क़रीब हैं. खाली समय में बहुत आलसी हो जाता हूँ. बिछावन से उठता ही नहीं हूँ. सिनेमा देख लिया या कुछ खा लिया. ज़्यादा से ज़्यादा समय घर पर रहूँ, यही कोशिश करता हूँ. खाने-पीने पर लगाम रखना पड़ता होगा. घर आकर खाने-पीने में लगाम नहीं लग पाता. क्योंकि दो-तीन-चार महीने के बाद आप घर का खाना खाने के लिए इतने पागल हो जाते हैं कि हर वो चीज़ खाई जाए जो इन चार महीनों में न खाई हो. छुट्टी मनाने के लिए आपकी पसंदीदा जगह... मैं भगवान से प्रार्थन करूँगा कि मुझे जल्दी से जल्दी मिले. हम तो नहीं प्रार्थना करेंगे कि जल्दी से जल्दी क्यों मिले. बहुत उम्र पड़ी है छुट्टी मनाने के लिए. नहीं.. नहीं. एक महीने के लिए. मैं न्यूज़ीलैंड जाऊँ और क्विंसटाउन जाऊँ. क्विंसटाउन.. बहुत सुंदर शहर है. अगर आपको ये मौक़ा दिया जाए कि आप वीरान टापू में अपनी पसंद की डेट के साथ जा सकें तो किसे लेकर जाएँगे. सलमा हाएक. आपने अभी तक उनसे कहा नहीं है उनसे.
काश वो मुझे किसी दिन मिलें और मैं उन्हें बताऊँ. लेकिन उनकी शादी हो चुकी है, उनके बच्चे हो चुके हैं. तो ये सपना, सपना ही रह गया. आपका सबसे अच्छा दोस्त जिसके साथ अपने मन की ज़्यादातर बातें साझा करते हों. मेरे दोस्त हैं संदीप शर्मा. हमने काफ़ी क्रिकेट खेले इंडिया ए टीम के लिए. पंजाब के लिए खेले. वे बहुत प्रतिभावान थे पर दुर्भाग्य से वे भारत के लिए नहीं खेल पाए. उनसे मैं काफ़ी करीब हूँ. काफ़ी लोग मुझसे कहते हैं कि मैं दिखता भी उनके जैसा हूँ. मेरे एक और दोस्त हैं सोहन सिंह जो बचपन में मेरे साथ खेलते थे. वे चंडीगढ़ में ही है. मिलना-जुलना ज़्यादा नहीं होता लेकिन मैं उसके संपर्क में रहने की कोशिश करता हूँ. और मेरे एक दोस्त थे अमन नट लेकिन 16 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. उनके अभिभावकों के मैं काफ़ी करीब हूँ और वो भी चंडीगढ़ में रहते हैं. अमन की मम्मी से जितना हो सकता है मिलने और संपर्क में रहने की कोशिश करता हूँ. मैंने अपना पहला शतक अमन को समर्पित किया था. अगर मैं युवराज सिंह से कहूँ कि वो अपने बारे में दो-तीन पंक्तियों में बताएँ. ईमानदारी से, मन से. मैं खुली हुई किताब हूँ. मैं जैसा दिखता हूँ, वैसा हूँ. अंदर से मैं कुछ अलग जैसा नहीं हूँ. जो मुझे बोलना होता है, मैं मुँह पर बोल देता हूँ लेकिन मैं सतर्कता बरतता हूँ. मुझे मौज़-मस्ती पसंद है. मैं अपना जीवन पूरी तरह जीता हूँ. मेरे पापा ने कहा था कि एक राजा की तरह जिओ और एक चैंम्पियन की तरह खेलो. ये मेरी ज़िंदगी का ध्येय है. क्या बात है...बिल्कुल शाही ध्येय है. और मैं जिससे प्यार करता हूँ, उससे बेहद प्यार करता हूँ, चाहे उससे मुझे प्यार मिले, न मिले. चाहे वो मेरी माँ हों, चाहे मेरी गर्लफ़्रेंड हों या मेरे दोस्त हों. अगर मैं किसी को अपना दोस्त बना लेता हूँ तो दोस्ती में किसी भी हद को पार कर सकता हूँ. और प्यार में नहीं... प्यार में... प्यार में मुझे अभी उस हद तक जाना है. अभी तो तैयारी नहीं है. जैसे ही लड़की मिलेगी, मैं उस तैयारी में जुट जाऊँगा. कभी फ़िल्मों में जाने के बारे में सोचते हैं युवराज सिंह. फ़िल्मों से मुझे कई ऑफ़र मिले हैं लेकिन मैंने बचपन से क्रिकेट खेला है और मैं उस खेल के बहुत क़रीब हूँ, उसको लेकर मैं बहुत दीवाना हूँ तो जब तक मुझे लगता है कि जब तक मैं इस खेल को खेलूँगा, तब तक खेलूँगा, उसके बाद पता नहीं. लेकिन मैंने ये तय किया था कि अपने क्रिकेट करियर के बाद कम से कम एक फ़िल्म में काम ज़रूर करूँगा. करियर के बीच में ही कर लेना. तीन-चार महीने का ब्रेक लेकर. करियर के बाद का किसने देखा है. जैसे छुट्टी का प्लान है न, अगर मन की है न, उसे पूरा करना चाहिए. एक ही ज़िंदगी मिली है. एक फ़िल्म बनाने की मेरी भी बड़ी इच्छा थी. मुझे मालूम था कि मैं कभी अभिनय तो नहीं कर पाऊँगा लेकिन वो अभी तक नहीं कर पाया हूँ. इसलिए अगर मन में है तो ज़रूर करिए. इतने लोग, सैकड़ों, करोड़ों इस सपने के साथ बड़े हो रहे हैं कि हम भी युवराज बनेंगे. मुझे मालूम है कि ये बड़ा रस्मी सा सवाल है लेकिन अगर युवराज सिंह उन्हें कोई सलाह दें तो क्या कहेंगे. समय के साथ मैंने यह सीखा है कि हर चीज़ समय पर ही मिलती है. मेरी सलाह यही है कि कड़ी मेहनत करें. अगर आप कड़ी मेहनत नहीं कर रहे हैं तो पहले से ज़्यादा मेहनत करें. अगर आप समर्पण और निष्ठा के साथ काम करते हैं तो ज़रूर सफल होंगे. अपने आपमें भरोसा रखें. युवराज सिंह, इतनी अच्छी सलाह दी आपने. हालाँकि बच्चे बहुत चिढ़ते हैं इस कड़ी मेहनत वाली सलाह से. उन्हें लगता है कि सारे लोग एक ही ज्ञान की बात बोल देते हैं, कड़ी मेहनत करो. कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मेहनत भी गंभीरता के साथ करनी पड़ती हैं. ज़िंदगी में कोई शॉर्टकर्ट नहीं होता है. युवराज सिंह, आपने प्यार से हमसे बातें की, इतना वक़्त दिया, आप दरअसल एक खुली किताब की तरह बोले, क्रिकेट के अनुभव और उसकी पीड़ा को साझा किया, कुछ दिल के ज़ख़्म भी दिखाए या हमने देखे, उसको ज़्यादा कुरेदा नहीं. मैं अपनी तरफ़ से, अपने साथियों की तरफ़ से और अपने सभी सुनने, पढ़ने वालों की तरफ़ से आपको बहुत शुभकामनाएँ देता हूँ. और ईश्वर आपको वह सब कुछ दे जिससे राजा की तरह जीने और चैंम्पियन की तरह खेलने का आपका ध्येय पूरा हो. बहुत-बहुत शुक्रिया. बहुत मज़ा आया आपसे बात करके. |
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