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वीरेंद्र सहवाग के साथ एक मुलाक़ात | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली के पास स्कूल में पढ़ने वाला एक बच्चा. चार बजे माँ उसे उठाती और पाँच बजे तक वह अपने खाने का डिब्बा, क्रिकेट का बल्ला, पैड्स आदि पूरी किट के साथ प्रैक्टिस पर पहुँचने के लिए बस स्टैंड पर होता था. सुबह तो बस में फिर भी जगह मिल जाती थी, पर लौटते वक़्त खचाखच भरी बस में क्रिकेट किट के लिए जगह बनाने की कोशिश में कई बार ड्राइवर, कंडक्टर और दूसरी सवारियों की झल्लाहट और डाँट भी झेलनी पड़ती थी पर कोई चारा नहीं था. 1500-2000 रुपये का बल्ला अगर बस में टूट जाता तो जल्दी दूसरा मिलता नहीं. बच्चा किसी तरह जगह बनाकर अपनी क्रिकेट तपस्या जारी रखे हुए था. धीरे-धीरे और रोज़ उसे देखते-देखते बस के ड्राइवर-कंडक्टर उसके लिए जगह रखने लगे. फिर जैसे-जैसे उसका नाम और पहचान बढ़ी, बस में जगह भी सुरक्षित रहने लगी. याद हैं पुराने दोस्त बस में जाने वाले छात्र का जब भारतीय टीम में चयन हो गया तो बड़ी पार्टी हुई और जश्न में कई बस ड्राइवर और कंडक्टर भी शामिल हुए. बकौल सहवाग, “आज भी मेरी पार्टियों में कभी-कभी उन दिनों के साथी होते हैं जब मैं कुछ नहीं था. उन दिनों के साथी मुझे भोली के नाम से जानते हैं.” अपने संघर्ष के समय के शुभचिंतकों और साथियों को याद रखने वाले यह खिलाड़ी हैं भारतीय टीम के सबसे धमाकेदार, आक्रामक और धुआंधार बल्लेबाज़ों में से एक वीरेंद्र सहवाग. डॉन ब्रैडमैन और ब्रायन लारा के अतिरिक्त सहवाग एकमात्र ऐसे बल्लेबाज़ हैं जिन्होंने दो या अधिक तिहरे शतक बनाए हैं. टेस्ट इतिहास का सबसे तेज़ तिहरा शतक (278 गेंद) ठोंकने वाले वीरेंद्र सहवाग से जब हम इस कार्यक्रम के लिए मिलने गए तो मन में कहीं यह ख़्याल था कि एक बड़े तेज़-तर्रार और कुछ धांसू स्टाइल के बंदे से मुलाक़ात होगी. शायद दिमाग में उनकी क्रिकेट वाली आक्रामक छवि ही अपना खेल कर रही थी. विनम्र स्वभाव पर सहवाग हमारी सोच के बिल्कुल विपरीत निकले. शांत, सौम्य, सभ्य. बातचीत का तरीका बहुत नर्म. हंसते-मुस्कराते, बड़ी शालीनता से और हर सवाल का जवाब बहुत ही नम्रता और धैर्य के साथ देने वाले सहवाग से बात करते हुए लग ही नहीं रहा था कि हम ताबड़तोड़ शैली की बल्लेबाज़ी के लिए प्रसिद्ध उस सहवाग से बात कर रहे हैं जिनके साथ ड्रैसिंग रूम में हरभजन सिंह जैसे खिलाड़ी भी मौजूद रहते हैं.
सहवाग कहते हैं, “मेरे क्रिकेट गुरू ने मुझे सिर्फ़ खेल ही नहीं सिखाया. बड़ों और छोटों सभी का सम्मान करना सिखाया. चाहे वह ग्राउंड्समैन हो या स्टेडियम में सफ़ाई करने वाला व्यक्ति, मैं सबका सम्मान करता हूँ और जहाँ तक हो सके उनसे अच्छी तरह बात करता हूँ.” सहवाग आगे कहते हैं, “शायद इसीलिए मुझे संजय दत्त की गांधीगिरी और जादू की झप्पी, दोनो ही बहुत पसंद आईं थीं.” फ़िल्मों की बात चली तो उन्हें हाल ही में प्रदर्शित ‘रेस’ अच्छी लगी थी. माधुरी दीक्षित उनकी पसंदीदा अभिनेत्री है और शोले उनकी ऑलटाइम फेवरिट फ़िल्म. सहवाग संयुक्त परिवार में बड़े हुए. उनके पिता व्यापारी थे और वे छह भाई थे. कोई 50-52 लोगों का भरा-पूरा परिवार था और बचपन की यादें सुखद हैं. बकौल सहवाग, “मेरी पिटाई कभी क्रिकेट खेलने के लिए नहीं हुई. डांट-फटकार अगर पड़ती भी थी तो पढ़ाई पर ध्यान नहीं देने के लिए.” कद-काठी और बल्लेबाज़ी करने के तरीके के कारण शुरुआती दिनों में उनकी तुलना बहुत लोग सचिन तेंदुलकर से करते थे. सहवाग कहते हैं, “मुझे बहुत अच्छा लगता था. मैं सचिन को खेलता देख ही खेलना सीखा था. वह मेरे आदर्श थे. मैं तो उनके सामने एकलव्य जैसा हूँ. ज़ाहिर है जब मेरी उनसे तुलना होती थी तो बहुत अच्छा लगता था. पर दरअसल मुझसे क्या शायद सचिन की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती. उनके जैसा खिलाड़ी दुनिया में कोई और नहीं है.” सहवाग के पसंदीदा खिलाड़ियों की सूची में ब्रायन लारा, सचिन तेंदुलकर, रिकी पोंटिंग और डॉन ब्रैडमैन हैं. शोएब नापसंद शोएब अख़्तर, ब्रेट ली और शेन बॉंन्ड उन्हें वो गेंदबाज़ लगते हैं जिन्हें अगर अवसर मिले तो वह खेलना पसंद नहीं करें. सहवाग कहते हैं, “लेकिन ऐसा होता कहाँ है. इन गेंदबाज़ों के ख़िलाफ़ रन बनाकर विशेष सुख की अनुभूति होती है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है.” सौरभ गांगुली उनकी नज़र में भारत के सर्वश्रेष्ठ कप्तान रहे हैं. सहवाग कहते हैं, “उनका रिकॉर्ड ही बोलता है. मुझे भी मध्यक्रम से ओपनिंग में लाने का फ़ैसला गांगुली का ही था.” महान और अच्छे खिलाड़ी का फ़र्क सहवाग की नज़र में क्या है, वो कहते हैं, “महान खिलाड़ी की खराब फ़ॉर्म के दिन कम होते हैं. सचिन जैसे खिलाड़ियों की फ़ॉर्म जल्दी लौट आती है, जबकि अच्छे खिलाड़ियों की खराब फ़ॉर्म लंबे समय तक चल सकती है.” विनम्र सहवाग ख़ुद को एक अच्छा खिलाड़ी मानते हैं. वो अपनी कमियों को समझते हैं और सुधारने की कोशिश में हमेशा लगे रहते हैं. कैज़ुअल नहीं सहवाग कहते हैं, “टीवी स्क्रीन पर जब आप देखते हैं कि मैं आउट होकर बहुत कैज़ुअल अंदाज़ में वापस पैवेलियन लौट रहा हूँ, लेकिन वास्तव में मैं उतना कैज़ुअल नहीं हूँ.”
वो कहते हैं, “मुझे भी आउट होने पर बहुत दुख होता है. पर मैं अंपायर के फ़ैसले का विरोध कभी नहीं करता. कितनी बार हमें ग़लत फ़ैसले का लाभ भी तो मिलता है.” क्या वह अपने स्टाइल में बदलाव लाने के बारे में सोचते हैं, सहवाग कहते हैं, “जी नहीं. इस तरीके से अगर मैने एकदिवसीय और टेस्ट मैचों में पाँच-पाँच हज़ार से अधिक रन बनाए हैं तो यह तरीका या तकनीक बहुत गलत तो नहीं होनी चाहिए.” हरभजन का मज़ाकिया अंदाज उन्हें बहुत पसंद है और ड्रैसिंग रूम में उनकी दोस्ती आशीष नेहरा, युवराज सिंह, हरभजन और ज़हीर ख़ान से कुछ ज़्यादा है क्योंकि वो अंडर-19 के दिनों से साथ खेल रहे हैं. अपने छह महीने के बेटे आर्यवीर के जन्म के बाद से वह स्वयं में भी कुछ बदलाव महसूस कर रहे हैं. सहवाग कहते हैं, “पहले मुझे जल्दी गुस्सा आ जाता था, अब नहीं आता. धीरज भी कुछ बढ़ा है. वह रोता है तो मैं आधा-आधा घंटे धैर्य से उसे चुप कराने की कोशिश करता हूँ. उसके साथ खेलता भी हूँ.” क्या आप चाहते हैं कि आर्यवीर भी चौके-छक्के लगाने वाला क्रिकेटर बने? सहवाग कहते हैं, “कोई ज़रूरी नहीं कि वह क्रिकेट ही खेले. 20 साल बाद क्रिकेट खिलाड़ियों पर कितना दबाव होगा आज आप इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं. मैं सिर्फ़ यह चाहूँगा कि वह कुछ खेले ज़रूर क्योंकि खेल से वह बहुत कुछ सीखेगा.” |
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