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रविवार, 09 दिसंबर, 2007 को 02:19 GMT तक के समाचार
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एक मुलाक़ात नरेश गोयल के साथ

नरेश गोयल
नरेश गोयल ने 1967 में तीन सौ रुपये की तनख़्वाह पर नौकरी करना शुरू किया
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इस हफ़्ते हमारे मेहमान हैं एक बहुत ही ख़ास शख़्सियत, जिन्होंने जमीन से सीधे आसमान की दौड़ लगाई है, जो भारत में अपने बूते पर व्यावसायी बनने वाली पहली पीढी की अग्रिम पंक्ति में नज़र आते हैं. जी हां, हम बात कर रहें हैं जेट एयरवेज़ के कर्ताधर्ता और मालिक जिन्होंने भारत में निजी एयरलाइंस की अवधारणा का सूत्रपात किया.

मैंने अभी आपके लंबे सफ़र का बहुत संक्षेप में वर्णन किया. आपने यह सफ़र कैसे तय किया ?

यह तो सफ़र की शुरुआत है. अभी बहुत आगे जाना है. मैं समझता हूं कि भारत में लाखों लोग हैं जो नरेश गोयल से अच्छे हैं, लेकिन उन्हें कोई अवसर नहीं मिला. ऐसे बहुत लोग हैं और ऐसे कई लोग अभी आएंगे. इन्हें अब मौका मिल रहा है. आदमी जब ऊपर चढे तो उसे नीचे भी देखते रहना चाहिए ताकि जब वह नीचे गिरे तो चोट कम लगे.

इस सवाल पर हम वापस लौटेंगे. यात्रा और यात्रियों से जुड़े व्यवसाय में आपकी दिलचस्पी कैसे पैदा हुई.

मैं पटियाला के एक छोटे से परिवार से हूं. वर्ष 1949 में वहीं मेरा जन्म हुआ. छोटे से स्कूल से पढाई की शुरुआत हुई और कॉलेज में पहुंचा. 18 साल की उम्र में बी.कॉम किया. उन दिनों पटियाला से बहुत से लोग लंदन जाते थे. मैं भी लंदन जाने के बारे में सोचता था. लेकिन मैं कारपेंटर या क्लीनर नहीं बनना चाहता था. मैंने सोचा कि लंदन जाकर नौकरी मिल जाए और चार्टेड अकांउटेसी कर लूं. लोग कहते थे कि चार्टेड अकांउटेसी करने से अच्छे पैसे मिलेंगे.

क्या आपने चार्टेड अकांउटेसी की ?

चार्टेड अकांउटेंसी के लिए प्रवेश तो मिल गया लेकिन मैं खर्चा वहन नहीं कर सका. तब मेरी माँ ने कहा कि बेटा तू लंदन क्यों जा रहा है. यहीं नौकरी ढूंढ लो. यहीं रहोगे तो परिवार की मदद भी होती रहेगी.

मेरी माँ के एक चाचा थे. उनका नाम सेठ चरणदास था. उनके पटियाला और चंडीगढ में दो सिनेमाघर थे. वे बोले कि बेटा विलायत क्यों जा रहे हो ? विलायत जाकर क्या करोगे ? मेरे पास लेबनीज़ इंटरनेशनल बेरूत एयरलाइन की एजेंसी है. तुमने बी.कॉम किया है. एजेंसी में कैशियर का काम देखो. घर का आदमी रहेगा तो चोरी नहीं होगी. मैंने दिल्ली में यही नौकरी की. मुझे तीन सौ रूपए महीने की पगार मिलती थी. ये वर्ष 1967 की बात है.

मैं हमेशा चाहता था कि सबसे संबंध बनाना चाहिए. वरना दुनिया में कोई पूछने वाला नहीं है. संबंध ज़रूर बनाना चाहिए.

('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.)

आप खुद दुनियाभर में घूमते हैं और लोगों को भी सैर कराते हैं. क्या आपको वाकई घूमने-फिरने का शौक है ?

पहले मुझे घूमने का शौक नहीं था. मैं खुद को मायूस-सा महसूस करता था. जहाज़ के ऊपर-नीचे होने पर घबराहट होती थी. लेकिन अब ठीक हो गया हूं. पायलट ने समझाया कि हवाई जहाज़ की यात्रा सबसे अधिक सुरक्षित होती हैं.

 मुझे घूमने का शौक नहीं था. मैं खुद को मायूस-सा महसूस करता था. जहाज के ऊपर-नीचे होने पर घबराहट होती थी. लेकिन अब ठीक हो गया हूं. पायलट ने समझाया कि हवाई जहाज की यात्रा सबसे अधिक सुरक्षित होती हैं.
नरेश गोयल, जेट एयर प्रमुख

इसके बाद तो आपको घूमने-फिरने में मज़ा आया होगा ?

ऐसा है कि यह तो व्यापार है. जैसे डॉक्टर अपने मरीज को देखने के लिए अस्पताल जाता है, वैसे ही मुझे अलग-अलग मुल्क़ों में जाना पड़ता है.

कहाँ जाने में आपको सबसे ज़्यादा आनंद मिलता है ?

मेरी पसंदीदा जगह शुरू से ही लंदन रही है. लंदन के बाद सबसे अधिक दिलक़श शहर पेरिस लगता है.

क्या आप खुद भी स्वभाव से इश्क़ मिजाज़ हैं ?

हाँ हूँ, लेकिन मैं ज़्यादा प्यार करने लगता हूँ तो लड़कियाँ भाग जाती हैं. वो शादी की बात करने लगती हैं. मेरी एक शादी हो चुकी है. मेरी एक अच्छी बीवी है. मैं शादी से खुश हूँ, इसलिए ज़्यादा इश्क़ नहीं लड़ाता.

मतलब यह कि शादी की बात न हो तो इश्क़ लड़ाना ठीक है ?

वो तो हर आदमी चाहता है. कुछ को मौका मिलता है, कुछ को नहीं मिलता. इश्क करना चाहिए. उसी से तो आदमी जवान रहता है.

छोटी सी ट्रेवल एजेंसी में कैशियर का काम करते हुए क्या कभी सोचा था कि मेरी अपनी भारत की सबसे बड़ी एयरलाइंस होगी ?

मैंने वर्ष 1967 में अपना काम शुरू किया. चाचा की एजेंसी में काम करते हुए मुझे रॉयल जॉर्डन एयरलाइंस में मौका मिला. उस समय ‘प्लेन किंग’ हुसैन जॉर्डन के थे. अली बंधु और उनके अध्यक्ष आज भी मेरे साथ मेरे बोर्ड में हैं. मूलत: वो लेबनान से थे. उन्होंने मुझे बहुत सिखाया. इसके बाद में फिलीपींस एयरलाइंस के संपर्क में आया. उनके साथ काम किया. उन्होंने मुझे यूरोप का दायित्व सौंपा. मैंने उनके रूट्स सीखे फिर मैंने सोचा कि अपना स्वयं का काम शुरू करूँ. मैंने इस बारें में चाचा को बताया. 14 मई वर्ष 1974 को मैंने अपनी कंपनी शुरू की और उसका नाम जेट एयरवेज़ रखा.

लेकिन मेरे पास पूँजी नहीं थी. मैंने अपनी माँ से बात की. माँ ने कहा कि अपना काम ज़रूर शुरू करो. मेरे पास एक ज़ेवर है. तुम उसे बेच दो.

क्या आपने माँ का ज़ेवर बेचा ?

हाँ, माँ का ज़ेवर बेचने से मुझे कोई चौदह-पंद्रह हज़ार रूपए मिले. दस हज़ार की पूँजी से मैंने जेट एयर शुरू की थी.

इस सफलता के बाद माँ ने क्या कहा ?

माँ बेहद खुश हुई. उन्होंने कहा कि हमेशा झुक कर रहना. कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना जिससे मेरी आत्मा को तकलीफ़ पहुँचे.

आप माँ की बात का अनुसरण करते हैं ?

कोशिश हमेशा करता हूँ. कई बार गुस्से में कुछ बोल देता हूँ. फिर बाद में अफ़सोस होता है.

अपने शुरूआती दिनों में आपने विभिन्न एयरलाइंस में काम किया.
उस दौरान जो अनुभव आपने अर्जित किए, क्या आज उन अनुभवों का इस्तेमाल अपनी एयरलाइंस को बेहतर बनाने में कर रहें हैं ?

जब मैं लेबनीज़ इंटरनेशनल एयरलाइंस में काम करता था, कार्लोस एरीडा उसके मालिक थे. आज वो मैक्सिको में रहते हैं. मैं आज भी उनके संपर्क में हूँ. वो आधे मैक्सिकन और आधे लेबनीज़ थे. उन्होंने अपनी एयरलाइंस के लिए मानक तय किए थे क्योंकि बेरूत और उनमें फैशन हुआ करता था. लेबनीज़ से ज़्यादा स्टाईल क्लास किसी की नहीं थी. मैंने रॉयल जॉर्डन को देखा, एयर फ्रांस को देखा, केएलएम को देखा, पैन एम को देखा, टीडब्ल्यूए को देखा.

 जब मैं लेबनीज़ इंटरनेशनल एयरलाइंस में काम करता था, कार्लोस एरीडा उसके मालिक थे. आज वो मैक्सिको में रहते हैं. मैं आज भी उनके संपर्क में हूँ. वो आधे मैक्सिकन और आधे लेबनीज़ थे. उन्होंने अपनी एयरलाइंस के लिए मानक तय किए थे क्योंकि बेरूत और उनमें फैशन हुआ करता था. लेबनीज़ से ज़्यादा स्टाईल क्लास किसी की नहीं थी. मैंने रॉयल जॉर्डन को देखा, एयर फ्रांस को देखा, केएलएम को देखा, पैन एम को देखा, टीडब्ल्यूए को देखा.
नरेश गोयल, जेट एयर प्रमुख

वर्ष 1976 में मैंने सिंगापुर एयरलाइंस के जीएसएएल. पिल्लै को मैं एक संस्थान मानता हूँ और वो आज भी मेरे सलाहकार हैं. उन्होंने सिंगापुर एयरलाइंस को खड़ा किया और उसे मानकता और गुणवत्ता प्रदान की. मैंने रूट सीखे, उड़ान के कार्यक्रम तय करना सीखा. मानकता को निर्धारित करना सीखा. इन सबको मैं बड़े तरीके से देखता था. हमेशा सोचता रहता था और सवाल करता रहता था कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता, वैसा क्यों नहीं हो सकता.

जब अपनी कंपनी के लिए पहला हवाई जहाज़ ख़रीदा तो आपने शायद जेआरडी टाटा को बुलाया था. इस कहानी के बारें में बताएँ.

वर्ष 1971 में रॉयल जॉर्डन के अध्यक्ष गंदूर अली गंदूर आए. सरकार के साथ उनकी बातचीत होना थी. जेआरडी टाटा ने उन्हें बंबई बुलाया. गंदूर साहब ने उनसे मेरा परिचय कराया. उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी. इसके बाद मैं टाटा साहब के संपर्क में रहता था.

वर्ष 1993 में 18 अप्रैल को हमारा पहला जहाज मुबंई आना था. मैंने टाटा साहब से कहा कि मैं उनसे मिलना चाहता हूँ ताकि आप मेरे पहले जहाज की अगवानी करें. उन्होंने कहा कि तुम्हें मुझसे मिलने के लिए आने की ज़रूरत नहीं है. अपने सहायक से कहो कि मेरे सहायक से बात करें. मैं निर्धारित तिथि को वहाँ आ जाउँगा जहां मुझे बुलाओगे. तुम क्या करने जा रहे हो, मुझे सब पता है. लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार को बुलाना मत भूलना.

फिर मैंने जे आर डी टाटा का नाम लेकर शरद पवार को आमंत्रित किया. वो भी आने के लिए राज़ी हो गए. इस प्रकार इन दोनों ने 18 अप्रैल वर्ष 1993 में जेट एयरलाइंस के पहले जहाज़ की मुबंई के सांताक्रूज हवाई अड्डे पर अगवानी की.

तारीख़ों को याद रखने में तो जैसे आपको महारत हासिल है. आप इतनी सटीक तिथियाँ कैसे याद रखते हैं ?

ये रुचि और शौक की बात है. ज़िदंगी के कुछ लम्हें ऐसे होते हैं जिन्हें आप भूल नहीं सकते. कोई भी नहीं भूल सकता. हर आदमी को ये लम्हे याद रहते हैं.

आपको उड्डयन जगत के विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है. आपकी इस विशेषज्ञता के पीछे क्या मूलमंत्र है ?

हम रोज़ जेट एयरवेज़ में बहुत सीखते हैं. मैं बहुत ख़ुशनसीब हूँ कि हमारे बोर्ड में बड़ी अनुभवी लोग हैं जिन्होंने बड़ी अच्छी-अच्छी एयरलाइंस चलाई हैं. ग़लतियाँ सबसे होती हैं लेकिन हमारी कोशिश होती है कि हम कम से कम ग़लतियाँ करें.

यदि कोई नई उड्डयन कंपनी शुरू करना चाहे तो आप उसे क्या सलाह देंगे ?

मेरा एक ही मश्वरा है कि अपने मूल व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित करें. इससे अपने लोगों को ज़्यादा वक़्त दे सकेंगे. क्योंकि आपके कर्मचारी सिर्फ कर्मचारी नहीं हैं. वह आपका परिवार है. जो वादा अपने उपभोक्ता से करते हैं वह वादा ब्रांड होता है. वादा टूटा मतलब ब्रांड टूट गया.

लेकिन आप ने अपनी सफ़लता का एक बहुत बड़ा राज़ नहीं बताया जो हमें पता हैं. विनम्रता, जो आपमें कूट-कूटकर भरी है और लगातार सीखने की चाहत... आसानी से हो जाता है ये, यो रोज़ कोशिश करनी पड़ती है ?

बड़े-बड़े लोग हुए है दुनिया में. रॉकफेलर ने कभी घमंड नहीं किया. घमंड का मतलब है कि आप नीचे गिरेंगे ही गिरेंगे. मरेंगे ही मरेंगे. नम्रता को कभी भी गाली नहीं दी जाती. नम्रता से कोई नुकसान नहीं होता. हमारी हिंदुस्तानी सभ्यता में यही सिखाया गया है. मैं जिनसे आज भी सीख रहा हूँ, उनका शुक्रगुज़ार हूँ कि उनके पास मेरे लिए वक़्त है.

जेआरडी टाटा, धीरूभाई अंबानी, जीडी बिरला ताउम्र विनम्र रहे. विनम्रता का कभी कोई नु्कसान नहीं हुआ. आप विनम्र रहते हैं और कभी नीचे गिरते हैं तो चोट कम लगेगी.

आपकी फ़िल्मों में बहुत ज़बर्दस्त दिलचस्पी है. क्या यह सच है कि आप कोई फ़िल्म देखने से नहीं चू्कते ?

मुझे बेहद शौक है फ़िल्मों का.मेरी पूरी कोशिश होती है कि हरेक भारतीय फ़िल्म देखूँ. कई बार रात में ग्यारह बजे काम ख़त्म करके तीन घंटे फ़िल्म देखता हूँ. इससे मुझे आराम मिलता है. हालांकि अगले दिन मालूम नहीं रहता कि फ़िल्म में क्या हुआ था.

 मुझे बेहद शौक है फ़िल्मों का.मेरी पूरी कोशिश होती है कि हरेक भारतीय फ़िल्म देखूँ. कई बार रात में ग्यारह बजे काम ख़त्म करके तीन घंटे फ़िल्म देखता हूँ. इससे मुझे आराम मिलता है. हालांकि अगले दिन मालूम नहीं रहता कि फ़िल्म में क्या हुआ था.
नरेश गोयल, जेट एयर प्रमुख

फ़िल्मी दुनिया के लोगों से आपके बड़े गहरे संबंध रहें हैं. कुछ लोग आपकी कंपनी के बोर्ड पर भी हैं.

आप ठीक कहते हैं. मेरे बड़े अच्छे संबंध हैं. यश जौहर थे. उनका निधन हो गया. उनके बेटे करन से मैं कहता हूँ कि मुझे अंकल मत बुलाओ. नई पीढी में जावेद अख़्तर का बेटा अच्छा काम कर रहा है. यश जी का बेटा आदित्य चोपड़ा भी अच्छा काम कर रहा है. यश से मेरे बहुत पुराने संबंध हैं. वर्ष 1975 से हमारी मुलाक़ात है.

हमारा रिश्ता 32 साल से चल रहा है. एक चीज मैंने उनसे सीखी है कि आदमी को अच्छे वक़्त में भी अपना संतुलन नहीं खोना चाहिए. मेरे ख़्याल में वे फ़िल्म उद्योग में एक संस्थान की तरह हैं और उन्होंने अच्छी से अच्छी फिल्में बनाई हैं. जो स्टूडियों उन्होंने बनाया है, वह हॉलीवुड से भी अच्छा बनाया है. स्वर्गीय सुनील दत्त से मेरे अच्छे संबंध थे. आमिर और सलमान से भी अच्छे संबंध हैं.

आपने अभिनेत्रियों से अपने संबंधों का ख़ुलासा नहीं किया ?

स्मिता पाटिल कमाल की थीं. शबाना जी तो हैं ही. वो मुझे भाई मानती हैं. विद्या बालन, रानी मुखर्जी, ऐश्वर्या बहुत अच्छा काम कर रहीं हैं. काफ़ी नई प्रतिभाएँ सामने आ रही हैं.

एक ऐसी फ़िल्म जिसने आप को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया. किस फ़िल्म का नाम लेना चाहेंगे ?

एक नहीं, कई फ़िल्में हैं मसलन मदर इंडिया, शोले, दीवार, लम्हे. दीवार में एक माँ का रोल था. माँ हमेशा अच्छी होती है. लेकिन उसी के साथ रहती है जो अच्छा काम करता है. मदर इंडिया में भी वही माँ थी.

फ़िल्मों के अलावा क्या गीतों का भी शौक है ? गीत भी गाते है आप ?

गाना तो बिल्कुल नहीं आता लेकिन गीत सुनने का बहुत शौक़ है.

और क्या शौक हैं आपके ?

मुझे लोगों से मिलना बहुत अच्छा लगता है. खाने पर जाता हूँ, घूमता हूँ. अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से मिलता हूँ. फिर चाहे वो संगीत, नाटक या कला जगत से हों. इनसे आदमी नई-नई चीजे सीखता है, रचनात्मकता सीखता है.

क्या यह सच है कि संबंधों पर आप बहुत निवेश करते है ? एकबार किसी से संबंध जुड़ जाने के बाद अपनी तरफ से कभी रिश्ता नहीं तोड़ते ?

इसमें निवेश वाली कोई बात नहीं है. समर्पण, ईमानदारी, गंभीरता दोनों ओर से होती है. दोस्ती को आप आज़मा नहीं सकता. मेरे दोस्त हमेशा मुझसे बेहतर ही होते हैं.

देव साहब से भी आपकी दोस्ती है ?

उनका तो मैं बचपन से सम्मान करता आया हूँ. अभी कुछ दिन पहले ही न्यूयॉर्क में उनसे मुलाक़ात हुई थी. मैं उनका बहुत बड़ा चाहने वाला हूँ और दिल से उनकी इज्ज़त करता हूँ.

आप बेहद ऊर्जावान हैं. इतना सब कुछ कैसे कर लेते हैं ? क्या ये गुर आपने देव साहब से सीखा है ?

सारे कार्य सहकार से होते हैं. एक उम्दा समूह होना बेहद जरूरी है. रीगन अमरीका के सफल राष्ट्रपति थे. मूलरूप से वे एक अभिनेता थे. लेकिन उन्होंने अपना बड़ा अच्छा समूह बनाया था. दूसरी बात यह कि समय का प्रबंधन करना बेहद ज़रूरी है. इसके अलावा संकट के समय आदमी जितना शांत रहे, उतना अच्छा है. वरना आप अपने लिए और भी अधिक मुसीबत खड़ी कर लेते हैं.

...और एक अच्छा समूह कैसे विकसित किया जाए ?

सही काम के लिए सही आदमी का चुनाव करें. उस पर भरोसा करें. उसे अधिकार दीजिए. उसे अवसर दीजिए. इस तरह आपका समूह अपने आप बन जाता है.

कहते हैं कि जेट एयर की सफलता में जितना आपका हाथ है उतना ही योगदान आपकी बेग़म साहिबा का भी है. सही बात है ये ?

एकदम सही बात है ये. शादी से पहले उनका नाम नीता गुप्ता था. वे महाराष्ट्र के एक सुशिक्षित परिवार से हैं. उनके दादाजी एटॉर्नी जनरल थे. उनकी माता कृष्णा मेनन के साथ काम करती थीं. तब वे उनकी सचिव थीं. जब कृष्णा मेनन ब्रिटेन के उच्चायुक्त थे, शादी के बाद वे नीता गोयल हो गईं. वर्ष 1979 में जेट एयर में उनसे मुलाक़ात हुई. वे ओबेरॉय होटल में काम करती थी. वहाँ वे विपणन विश्लेषक थी. फिर विपणन प्रबंधक बनीं. जनरल मैनेज़र और उप-अध्यक्ष बनीं और जेट एयरवेज़ में आईं. पहले दिन से लेकर आजतक हमारी सभी उड़ानों का निर्धारण और देखरेख वे ही कर रहीं हैं. सभी कर्मचारियों के साथ उनके अच्छे संबंध हैं.

अगले दस वर्षों में आप स्वयं को और जेट एयर को कहाँ और किस मु्काम पर देखते हैं ?

मैं यह समझता हूँ कि अगले दस वर्षों में भारत दुनिया को सबसे ज़्यादा व्यवसायी देगा और किसी देश में ऐसा नहीं हुआ. मेरे विचार से हर भारतीय व्यापारी की तरह सोचता है और काम करता है.

भारत की अर्थव्यवस्था बढेगी. क्रय क्षमता बढेगी. मध्यवर्ग का प्रतिशत बढेगा. युवा पीढी का मौजूदा प्रतिशत बढेगा. आवागमन बढेगा. एयरलाइन बढेंगी. व्यापार बढेगा.

 मैं यह समझता हूँ कि अगले दस वर्षों में भारत दुनिया को सबसे ज़्यादा व्यवसायी देगा और किसी देश में ऐसा नहीं हुआ. मेरे विचार से हर भारतीय व्यापारी की तरह सोचता है और काम करता है.
नरेश गोयल, जेट एयर प्रमुख

जब हमने वर्ष 1993 में एयरलाइन शुरू की तो हमारा लक्ष्य इसे भारत में सफ़र करने वालों की पहली पसंद बनाना था. फिर चाहे वो भारतीय हों या बाहर से आने वाले हों.

अगले दस वर्षों में हमारी सेवाएँ कैथे पैसेफिक और सिंगापुर एयरलाइन से बेहतर होगीं. हमें एशिया की सबसे बेहतरीन एयरलाइन बनना है. कहते हैं कि सिंगापुर एयरलाइन की बाज़ार पूँजी आठ बिलियन डॉलर है. हमारी बाज़ार पूँजी इससे ज़्यादा होनी चाहिए ताकि हमारे शेयरधारक जेट में ही पूँजी निवेश करें. हम चाहेंगे कि धीरूभाई अंबानी के पद-चिन्हों पर चलें.

लोगों को लगना चाहिए कि एयरलाइन में निवेश करना चाहिए और उसमें भी जेट एयरवेज़ में निवेश करना सबसे बेहतर है.

आपकी ज़िंदगी का सबसे हसीन, सुखद और अविस्मरणीय दिन कौन-सा है ?

जब मेरी पहली बिटिया पैदा हुई तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था. मेरे दो बच्चे है एक बेटी और एक बेटा.

...और एक ऐसा दिन जब आपको बेहद बुरा लगा हो जिसे आप अपनी ज़िंदगी से निकाल फेंकना चाहते हो ?

मैं बुरे दिनों को याद ही नहीं रखता. हमेशा आगे की बात सोचता हूँ.

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