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एक मुलाक़ात, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी एक मुलाक़ात में इस हफ़्ते हमारे मेहमान हैं एक बहुत ही अलग किस्म की राजनीतिक शख़्सियत जो भारत की राजनीति के सबसे विवादित चेहरों में हैं. इन्हें लोग या तो दीवानगी की हद तक पसंद करते हैं और या फिर दीवानगी की हद तक नापसंद. जी हाँ, इस बार हमारे साथ हैं गुजरात के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेंद्र भाई मोदी. मोदी जी, आपका स्वागत है.. बीबीसी के सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार. मुझे भी सबसे मिलने का मौका मिला इसके लिए धन्यवाद. पहला सवाल ये कि राजनीति में कैसे आए. क्या बचपन से ही ये मन में था कि राजनीति में आना है? सच कहूँ कि मैं राजनीति का व्यक्ति नहीं हूँ. राजनीति में रहना कुछ इस तरह लगता है कि जैसे मैं रेनकोट पहनकर बाथरूम में नहा रहा हूँ. वास्तव में मन में भावना ये थी कि देश के लिए कुछ करना है इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गया. संघ ने मुझे बहुत कुछ दिया और संघ के लिए मैंने अपना जीवन भी लगाया. इसके साथ ही जनसंघ के मुख्य कर्णधारों में से एक, नाथा भाई झकड़ा का मेरे राजनीतिक जीवन में बड़ा योगदान रहा. उनसे मेरा बड़ा निकट का नाता था. उन्होंने ही मुझे आज से 12-15 साल पहले संघ से सक्रिय राजनीति में प्रवेश कराया. हालांकि उसमें भी मेरे मन में यही था कि संगठन के काम को ही आगे बढ़ाना है. सच पूछिए तो चुनाव तो मैं कभी स्कूल कालेज में भी नहीं लड़ा. लेकिन जब मौक़ा आया तो पूरी जी-जान से मेहनत की. आपके चाहने वाले या आपके विरोधी भी ये कहते हैं कि आप बड़ा ज़बरदस्त भाषण देते हैं. कैसे करते हैं ये कमाल? क्या शीशे के सामने खड़े होकर अभ्यास करते हैं? देखिए मैं गाँव का सीधा-सादा आदमी हूँ. मुझे कोई भाषण कला का विज्ञान नहीं पता, लेकिन स्कूली जीवन में वाद-विवाद में हिस्सा लेता था और अक्सर जीत जाता था. सच ये है कि तैयार किया भाषण मैं नहीं बोल पाता. बस खड़े होकर जो भीतर से आवाज़ आती है, वो बोल देता हूँ और शायद ये ईमानदारी लोगों को पसंद आती है. बीबीसी एक मुलाक़ात का सफ़र आगे बढ़ाते हैं. अपनी पसंद का एक गाना बताइए? एक काफी पुराना गाना है जो शायद मेरे जन्म के समय का है. शायद ये गाना मेरे व्यक्तिव से मेल खाता है, गाने के बोल हैं... ओ पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े, तुझपे सवार है कोई..... ये गीत मुझे बहुत अच्छा लगता है. और एक और गाना जो बेहद ओजस्वी सा लगता है......ज्योति कलश छलके...मुझे बहुत पसंद है. हालांकि बाद में संगीत से नाता कम हो गया. कभी फुरसत मिलती है तो संतूरवादक पंडित शिव कुमार शर्मा का, ‘कॉल ऑफ़ दि वैली’ इंस्ट्रूमेंटल मुझे बहुत पसंद है. इसमें मुझे हिमालय पर्वत की अनुभूति होती है. वंदेमातरम् का माँ तुझे सलाम...गीत मुझे काफी पसंद है जो लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था. मैं उन दिनों विदेश दौरे पर गया था. तो एक गाना जिसके बोल थे. ..चिट्ठी आई है..वतन से चिट्ठी आई है... बहुत ज्यादा मशहूर था. मैंनें किसी गीत का इतना असर कभी महसूस नहीं किया था. ये गीत मुझे पसंद है. अच्छा आपके सार्वजनिक जीवन से तो लोग बरसों से परिचित हैं लेकिन आपका खुद क्या मानना है एक व्यक्ति के तौर पर नरेंद्र मोदी के बारे में.
देखिए हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि खुद को जानना चाहिए. शास्त्र ये भी कहते हैं कि जो खुद को जान लेता है उसे कुछ और जानने की ज़रूरत नहीं रहती. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं अभी तक खुद को जान पाया हूँ. शायद जान भी पाऊंगा कि नहीं पता नहीं? तभी मुझे औरों के नज़रिए की जरूरत पड़ती है. और उनके ही नज़रिए के आधार पर मान लेता हूँ कि शायद मैं ऐसा ही हूँ. तर्क और वाद विवाद में कोई आपसे जीत नहीं सकता. लेकिन हम जानना चाहते हैं कि आप नरेंद्र मोदी के बारे में क्या सोचते हैं? मैं आपसे ये कह सकता हूँ कि मेरे चाहने वाले या विरोधी कम से कम कुछ बातों से सहमत ज़रूर होंगें कि नरेंद्र भाई मेहनती हैं, सुव्यवस्थित और अनुशासन से रहते हैं और मेरी कार्यशैली बेहद फ़ोकस होती है. मान लीजिए कभी आप चुनाव हार जाएं या राजनीतिक संकट में हों तो फिर कैसे आप उस परिस्थिति में बर्ताव करेंगें? मेरा मानना है कि अच्छे बुरे दिन सबके सामने आते हैं और मेरा मानना है कि बुरे दिन आने पर ही आदमी की पहचान होती है. लेकिन मेरी कोशिश होती है कि विपरीत परिस्थितियों में मैं कुछ ग़लत नहीं करूँ. मुझे लगता है कि ईश्वर ने मुझे किसी अच्छे काम के लिए चुना है. मुझे अपने लिए जीने का अधिकार नहीं है. कहने का मतलब ईश्वर ने हर किसी को किसी निर्धारित काम के लिए चुना है. मसलन मान लीजिए अगर मैं एक ड्राइवर हूँ तो मेरा फर्ज़ है कि अपने यात्रियों को मैं सुरक्षित सफ़र कराऊं. अच्छा ये बताइये कि आपने अपने लिए अकेले ही जीवन का सफर चुना, क्या कभी शादी करने की नहीं सोची. ज़िन्दग़ी के किसी दौर में या मोड़ पर जीवनसाथी की ज़रूरत महसूस नहीं हुई, जब ऐसा लगा हो कि राजनीति के साथ-साथ पारिवारिक जीवन भी जी सकते हैं? मेरा ये मानना बिल्कुल नहीं है कि कोई यदि शादी-विवाह करता है तो वो गलत है. लेकिन जहाँ तक मेरा सवाल है तो आरएसएस में एक प्रचारक परम्परा होती है जिसमें प्रावधान होता है कि जीवन को देश के लिए लगाना है. फिर मैंने 17 साल की उम्र में घर छोड़ दिया और फिर कई बरसों तक घर से कोई वास्ता नहीं रहा, बस सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर गया. सच बताऊँ जब तक मैं संगठन का काम करता था तब तक मुझे अकेलापन महसूस नहीं हुआ. संगठन में सभी लोग साथ-साथ घूमते थे. लोगों के घरों में खाना खाने जाता था. समझिए 35 साल तक मैंने संघ में रहकर भिक्षा मांगकर लोगों के घरों में खाना खाया है. लेकिन उनके घर में पारिवारिक माहौल मिलता था.पर मुख्यमंत्री बनने के बाद तमाम प्रोटोकॉल और सुरक्षा के बंधन महसूस होने लगे थे. लेकिन क्या ये हो सकता है कि आपका विचार अब भी बदल सकता है? (हंसते हुए), क्या कह रहे हैं साहब.. इसका अगर जवाब दिया और किसी श्रोता ने सुन लिए तो मैं तो फंस जाऊँगा. नहीं, ये तो बड़ी स्वाभाविक-सी बात है. अगर आप चाहेंगें तो समझिए आपके लिए रिश्तों की भरमार लग जाएगी. जैसे मेरी एक पुरानी गुजराती दोस्त हैं जिनकी हाल में ऑस्ट्रेलिया पोस्टिंग हुई. उन्होंने कहा कि वे नरेंद्र मोदी को पसंद करती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि मोदी जी के साथ एक सिक्योरिटी फील होती है और एक खूबी और कि वे बेहद करीने से रहने वाले इंसान हैं. जैसा कि आपने पहले कहा था कि आप अनुशासन से रहते हैं. सही है क्या? हाँ, करीने से रहने वाली बात तो सही है. मेरी माँ भी जब भी किसी को मेरे बारे में बताती हैं तो ये ज़रूर कहती हैं कि मैं बचपन से ही अपनी चीजों को बहुत संभालकर रखता था. हालांकि मैं स्वभाव से साधारण हूँ लेकिन मेरा मानना है कि आप जो भी काम करें उसमें बेहतर नज़र आना चाहिए. तो क्या कभी कोई बड़ी मीटिंग होती है तो फिर शीशे के सामने काफी वक्त बिताते होंगे? नहीं. दरअसल मेरे जीवन में ये सहज है. मुझे कभी इसके लिए एक्सट्रा समय नहीं लगाना पड़ता. मैं हमेशा इसी प्रकार रहता हूँ. साधारण हाफ़ स्लीव कुर्ता पहनता हूँ और हमेशा उसी में नज़र आता हूँ. लेकिन ये भी एक किस्म का फै़शन स्टेटमेंट हैं जैसे पहले राजेश खन्ना के शार्ट कुर्ते खासे प्रचलित थे? फैशन के बारे में क्या कहें लेकिन हाँ ये तो सही है कि आपको अमरीका, लंदन में भी ‘मोदी कुर्ता’ मिल जाएगा. इसका मतलब आपको उनसे रॉयल्टी लेनी चाहिए. ये बताएं कि आप खाली वक्त में क्या करना पसंद करते हैं, आपकी रूचि का क्षेत्र. जैसे आपने बताया कि हिमालय का संगीत सुनना...? मैं आपको बता दूँ कि मैं हिमालय में भी बहुत रहा हूँ. मैंनें काफ़ी वक्त हिमालय में बिताया. पर्वतारोहण भी किया. जब कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू हुई तो मैं पैदल ऊपर तक गया था, कोई 60 दिन लग जाया करते थे तब. इसके अलावा मैं पढ़ने में रूचि रखता हूँ. खासकर किसी महापुरूष की जीवनी और जीवन का दर्शनशास्त्र पढ़ने में रूचि लेता हूँ. हालांकि अब पढ़ने का अवसर ज्यादा नहीं मिल पाता. किताबें भी लिखीं हैं. मैं हमेशा अपने साथियों से कहता हूँ कि जीवनवृत्त ज़रूर पढ़ने चाहिए. इससे क्या होता है कि सच्चाई के क़रीब रहा जा सकता है और सीख भी मिलती है. बचपन में मैं छत्रपति शिवाजी से बहुत प्रभावित था. बेंजामिल फ़्रेकलिन से लेकर विवेकानंद को पढ़ा. सबने अलग-अलग प्रभावित किया. गांधी जी के ग्राम स्वराज ने काफी प्रभावित किया. सरदार पटेल के दृढ़ व्यक्तित्व का मैं कायल हूँ. अच्छा मेरे मन में आपके उस हिमालय प्रवास और गुफा-कंदराओं में रहने के सिलसिले में कई सवाल घुमड़ रहे हैं. बड़ी जिज्ञासा-सी लग रही है वो सब जानने में. हालांकि मैंनें तो पहले मज़ाक में पूछा था ये सब? मैंनें 17 साल की उम्र में वहां जाने के बाद साढ़े तीन या चार साल बिताए थे. लेकिन फिलहाल मैंने उसे कभी सार्वजनिक नहीं किया, पर बाद में ज़रूर उस पूरे अनुभव के बारे में किताब लिखूंगा और दुनिया के सामने उसे पेश करूंगा. चलिए, बीबीसी एक मुलाक़ात का सफ़र आगे बढ़ाते हैं. अपनी पसंद का एक गाना बताएं? मनहर उदास की गुजराती गज़लों को मैं बहुत पसंद करता हूँ. इसके अलावा लगान फ़िल्म का .....राधा कैसे ना जले.....गीत मुझे अच्छा लगा. इसकी कोरियोग्राफ़ी अच्छी थी और शायद इसलिए भी कि इसकी शूटिंग हमारे कच्छ में ही हुई थी. हालांकि उस जलन की फ़िलॉसफ़ी से मैं सहमत नहीं हूँ. अच्छा एक सवाल उठ रहा है, शायद इसका आपसे कोई वास्ता नहीं हो, पर क्या कभी किसी से जलन होती है. कहा जाए कि किसी व्यक्ति से आप खुद को बदल सकते हैं तो वो कौन होगा? जलन नहीं होती है, ऐसा कहना तो लगता है ठीक नहीं होगा. मैं भी आखिर साधारण इंसान ही हूँ. लेकिन मैं कोई इतना बड़ा संत पुरूष तो नहीं हूँ कि जलन होती ही नहीं होगी. कोशिश ये होती है कि अच्छाइयों को साथ लेकर चला जाए. लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी डिबेट में बोलने की बारी बाद में हो और आपसे पहले बोलने वाला आदमी वही बात या विचार रख दे जो आप बोलने जा रहे थे तो तब लगता है कि ये गड़बड़ हो गई. कुछ जलन होती है तब. आप कविता भी लिखते हैं, कुछ सुनाइए? मेरी समस्या है कि मुझे याद नहीं रहता. इसके लिए मुझे हर बार लोगों से आलोचना सुननी पड़ती है. हालांकि मेरे गीतों के रिकार्ड और सीडी भी निकली हैं. मेरे ज्यादातर गीत प्रकृति पर हैं. कहीं पर अकेलेपन की मस्ती भी दिखती है. नरेंद्रभाई क्या कभी खेलों में कोई रूचि रही थी? देखिए मुझे खेलों का उतना ज्ञान नहीं है और कभी मौका भी नहीं मिला. लेकिन स्कूल के दिनों में सुनील गावस्कर उभरते क्रिकेटर थे. उनके अलावा हमारे गुजराती मित्र फ़ारूख इंजीनियर भी थे. तब टेलीविज़न तो था नहीं, रेडियो पर ही सुनने को मिलता था. वास्तव में मुख्यमंत्री बनने के बाद चीफ़गेस्ट के रूप में ही स्टेडियम जाकर मैच देखने का मौक़ा मिला था. लेकिन रूचि खेलों में थी. 1996 में मैं अटलांटा गया था जहाँ मुझे व्यक्तिगत स्पर्धा यानि एथलेटिक्स के मुक़ाबले बहुत पसंद आए थे. लेकिन वहाँ एक चीज़ पर मैंने ज़्यादा ध्यान दिया कि इतना बड़ा आयोजन है पर सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है. इसके प्रबंधन का अध्ययन किया था. शायद वो आज काम आ रहा है.
इसके अलावा मेरा मानना है कि खेलों को किसी न किसी कॉरपोरेट सेक्टर या सरकारी संस्थान को अपनाकर उसका संचालन करना चाहिए ताकि और खेलों को भी बढ़ावा मिल सके. अच्छा ये बताइए कि आपका पसंदीदा राजनेता कौन है? मेरा मानना है कि गाँधी जी ने राजनीति को जनआंदोलन बनाया. सरदार पटेल का राजनीति और आदर्शों के बीच का तालमेल. राजमाता विजयराजे सिंधिया को राजनीति में पवित्रता और आडवाणी जी बौद्धिक राजनीति के प्रतीक के तौर पर देखे जा सकते हैं, इसके अलावा अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान नेता जिसने तीन दशक तक राजनीति के शिखर पर रहने में कामयाबी पाई है, ये अपने आप में अतुलनीय और आश्चर्यजनक है. मोदी जी, आप खाने में पूरी तरह शाकाहारी हैं? हाँ, मैंने तो आज तक कभी अंडे को हाथ तक नहीं लगाया, और फिर गुजराती समाज जो बौद्ध और जैन धर्म के प्रभाव में रहा था, लगभग पूरी तरह शाकाहारी ही है. क्या फ़िल्में देखना पसंद है आपको. कोई पसंदीदा फ़िल्म? फ़िल्में तो देखना नहीं हो पाता, इसलिए इस सवाल का जवाब काफी मुश्किल है. लेकिन एक गाइड फ़िल्म पसंद आई थी. इसके अलावा एलओसी कारगिल फ़िल्म भी अच्छी लगी थी. मुझे दर्दभरी फ़िल्म पसंद थीं इसके पुराने कलाकारों में मीना कुमारी और संजीव कुमार पसंद थे. पसंदीदा हीरो या हीरोइन? मुझे संजीव कुमार और परेश रावल उम्दा कलाकार लगते हैं. आज कल के कलाकार या हीरोइन मुझे कुछ खास पसंद नहीं. एक सच्चाई ये भी है कि मैं फ़िल्में नहीं देख पाता हूँ. एक चीज मुझे और खटकती है कि आजकल की फ़िल्मों में महिलाओं को प्रमुखता नहीं दी जाती, ऐसा मेरा मोटा-मोटा आंकलन है. लेकिन समारोहों में या किसी अवसर पर हीरो, हीरोइनों से मुलाकात होती होगी, बातें होती होंगी. किसी से प्रभावित नहीं हुए? हाँ मुलाकात होती होगी पर मुझे याद नहीं, फिर दूसरी चीज़ ये कि मेरी छवि ऐसी बनी है कि लोग पाँच फ़ुट दूर रहते हैं तो फिर हीरोइनों का तो सवाल ही नहीं. नरेंद्र मोदी के बारे में एक धारणा है कि वो एक ईमानदार आदमी हैं. तो आज के समय में कैसे आपने ये छवि बचाकर रखी है? सच कहूँ तो मैंनें कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कोई भाषण नहीं दिया. मुझे अगर कोई उपहार मिलता है तो वो राज्य सरकार की संपत्ति होता है. मैं उससे छात्राओं की शिक्षा में योगदान करता हूँ. अपने राज्य में भी ये नियम बनाकर रखा है कि कोई भी अधिकारी या मंत्री 500 रूपए से ज्यादा उपहार मिलने पर खजाने में जमा कराएगा. मुझे कोई गुमान नहीं कि मैं ईमानदारी का प्रतीक हूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि मैं साधारण इंसान हूँ और मुझमें वो सारी कमियाँ हैं जो आम आदमी में होती हैं. अच्छा अगर आप राजनीति में नहीं होते तो क्या होते? या तो मैं लिखता, या फिर अपनी हिमालय की रूचि की ओर ही चला जाता. अच्छा आज से दस साल बाद आप खुद को कहाँ देखते हैं. कभी सोचते हैं इस बारे में? मैंने कभी कोई रोडमैप बनाकर काम नहीं किया. आप सच में इतने सच्चे हैं क्या? मानता हूँ, इतनी आसानी से ये बात गले नहीं उतरती. आज जब लोग मुख्यमंत्री जैसी गद्दी के लिए जोड़तोड़ करते हैं उस वक्त मुझे ये ज़िम्मेदारी अचानक मिल गई. मैं आपको इसका वाक्या बताऊँ तो विश्वास नहीं होगा. मुझे अटल जी का फ़ोन आया, उस वक्त मैं भारत के एक प्रमुख टेलीविज़न चैनल के कैमरामैन गोपाल के अंतिम संस्कार में श्मशान में था. दरअसल वो कैमरामैन कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया के साथ विमान हादसे में मारा गया था, और अक्सर प्रेस ब्रीफ़िंग में आता था. शाम को जब अटल जी के पास पहुँचा तो उन्होंने बताया कि मुझे गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है. सच मानिए उस वक्त मैं इस ज़िम्मेदारी के लिए तैयार नहीं था, क्योंकि पिछले दो सालों से मैं दिल्ली में रह रहा था और पार्टी के प्रवक्ता की ज़िम्मेदारी संभाल रहा था. इससे पहले मैंने कभी मुख्यमंत्री का चैंबर तक नहीं देखा था, न ही प्रशासन की कोई जानकारी थी. आडवाणी जी की हालिया किताब के अनुसार अटल जी आपको हटाना चाहते थे. इस बात पर आपका क्या कहना है? देखिए मैं संगठन का आदमी हूँ, और मैं मानता हूँ कि संगठन सबसे ऊपर है. और उपयुक्त निर्णय लिया जाना चाहिए भले ही वो मेरे खिलाफ़ ही क्यों नहीं हो. फिर मुझे कभी पर्दे के पीछे की बातों की जानकारी नहीं रही. जैसे मैं मुख्यमंत्री बना वैसे हट जाऊंगा मुझे कोई मलाल नहीं. मैंनें कभी कोई सिफारिशी डेलीगेशन नहीं भेजा. फिर अटल जी के प्रति हमारा नज़रिया तो ये है कि अटल जी जैसा व्यक्ति जिसने अपने दम पर पार्टी को खड़ा किया और जीवन के 40 साल लगा दिए, ऐसे व्यक्ति के प्रति मेरे मन में थोड़ा भी नकारात्मक भाव जगे तो फिर वो मेरी कमी है. फिर जहाँ तक मेरी बात है तो फिर मैं थोड़ा हट के हूँ. जो लोग राजनीति में आना चाहते हैं, खासकर युवा उन्हें कैसे राजनीति की रपटीली राहों में चलना चाहिए? देखिए पहले नेता सामाजिक सेवा से आते थे. इसके बाद का दौर आंदोलनों के नायकों से नेतृत्व निकलने लगा. इससे भी लोग निराश हुए तो तीसरा दौर जातिवाद से नेताओं के पैदा होने का रहा और आज दुर्भाग्य है कि बंदूक की नोक के दम पर भी नेता बन रहे हैं. नक्सलवाद पनप रहा है. युवाओं के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं. लोकतंत्र के लिए परिवारवाद भी बहुत बड़ा ख़तरा है. अच्छा इन संजीदा बातों के बीच ये सवाल कि कभी क्या मन का वो बच्चा हिलोरें मारता है? बहुत इच्छा होती है. गाना गाता हूँ, कुछ खाने का मन भी करता है. एक सच्चाई ये भी है कि मन का बालक उसी में जगता है जब ईश्वर की कृपा होती है. मोदी जी, हमारी शुभकामना है कि आप अपनी मंजिल पर पहुंचने में कामयाब रहें, और आपका ये अकेलापन भी कहीं किसी मोड़ पर जीवनसाथी मिलने के साथ दूर हो. बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको. आप सब लोग जब साथ हैं तो कैसा अकेलापन. बीबीसी के सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार. धन्यवाद. |
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