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रविवार, 23 दिसंबर, 2007 को 08:22 GMT तक के समाचार
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ये 'हिंदुत्व' नहीं 'मोदीत्व' की जीत

नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी ने 2001 में गुजरात की सत्ता संभाली थी
गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की जीत न तो पार्टी की जीत है और न ही हिंदुत्व की बल्कि यह ‘मोदीत्व’ की जीत है.

हालांकि बीजेपी नेता इसे टीम बीजेपी की जीत बताते हैं और मोदी को ‘मैन ऑफ द मैच’.

लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह ‘मैन ऑफ द मैच’ न केवल पूरी टीम पर बल्कि पूरे मैच पर ही भारी पड़ रहा है क्योंकि यह एक ऐसा मैन ऑफ द मैच है जिसने टीम ( पढ़ें पार्टी ) के कई खिलाड़ियों और चयन समिति ( पढ़ें आरएसएस) की नाराज़गी के साथ इस मैच का नेतृत्व किया और जीत हासिल की है.

मोदी की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब वो उन नेताओं की श्रेणी में शामिल हो गए हैं जिन्होंने सत्ता विरोधी लहर को मात दी है. वो भी पार्टी, संघ और संघ से जुड़े संगठनों के प्रत्यक्ष और परोक्ष विरोध को सहते हुए.

आलोचक भले ही उन्हें फासीवादी, हिटलर और मौत के सौदागर कहते रहें और गुजरात को ‘ हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ , यह तथ्य दीगर है कि मोदी ने इस बार किसी बड़ी हिंदुत्व लहर की गैर मौजूदगी जीत दर्ज़ की है.

तो फिर जीत किसकी हुई, पार्टी की, हिंदुत्व की या फिर मोदी की ?

आने वाले दिनों में मोदी के जीत के कारणों का ‘पोस्टमार्टम’ ज़रुर होगा और इस जीत के राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले परिणामों की भी बात होगी.

पहली नज़र में मोदी की जीत दो बातें दिखाती हैं.

आने वाले दिनों में बीजेपी के और नेता भी संघ से अलग हटकर अपना रास्ता बना सकते हैं और हो सकता है कुछ और राज्य मोदी की तर्ज़ पर कट्टर हिंदुत्व ( पढ़ें मोदीत्व) के साथ साथ तीव्र विकास का भी रास्ता अपनाएं.

वैसे कई वरिष्ठ टीकाकार पहले ही कह चुके हैं कि इन आम चुनावों में न सही आने वाले आम चुनावों तक नरेंद्र मोदी बीजेपी में सबसे कद्दावर नेता के रुप में उभर सकते हैं जो बीजेपी के लिए ख़तरनाक भी हो सकता है.

इतना ही नहीं अगर आने वाले दिनों में कांग्रेस के लिए राहुल गांधी तुरुप का पत्ता बनने वाले थे तो अब उसे टक्कर देने के लिए बीजेपी के पास मोदी जैसा करिश्माई नेता भी है.

मोदी के करिश्मे को कई आलोचक तानाशाहों से जोड़कर देखते हैं लेकिन तानाशाह लोकतांत्रिक रुप से चुनाव नहीं लड़ते तो फिर मोदी की जीत का क्या कारण हो सकता है.

मुझे ऐसा लगता है कि जिस तरह से 2002 के दंगों के बाद न केवल मोदी बल्कि पूरे गुजरात और गुजरात के लोगों को निशाने पर रखा गया वो कहीं न कहीं लोगों को नागवार गुज़रा है.

शायद यही कारण है कि जब कभी मोदी ने राष्ट्रीय मीडिया को लताड़ा, उनसे बात नहीं की, तब तब लोगों ने उसका साथ दिया. विकास की योजनाओं में स्थानीय लोग बढ़ चढ़कर आए और मोदी के मुस्लिम विरोध के बावजूद लोगों ने उनके लिए वोट दिया.

यानी ये कहा जा सकता है कि कांग्रेस और अन्य दलों या फिर स्वयंसेवी संगठनों और मीडिया द्वारा मोदी को गुजरात की सभी बुराईयों की जड़ बताना उनकी जीत का एक बड़ा कारण बन गया.

पिछले पाँच वर्षो में इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि गुजरात की तरक्की हुई है और साथ ही किसी को इस तथ्य से भी गुरेज़ नहीं है कि एक विशेष समुदाय के साथ भेदभाव किया जा रहा है.

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