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गुजरात विधानसभा चुनाव: कांटे की टक्कर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछली बार से अलग इस बार के गुजरात विधानसभा चुनावों में राज्य के दोनों प्रमुख दलों, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही के बीच कांटे की टक्कर नज़र आ रही है. शुरुआत में केवल विकास की बात पर चुनाव लड़ने की बात कह रहे गुजरात के मुख्यमंत्री ने विवादित सोहराबुद्दीन एन्काउन्टर मामले को उछाल कर राज्य में चुनाव प्रचार का स्वर ही बदल दिया. पर मोदी ने ऐसा किया क्यों? इस सवाल के उत्तर में जाने माने लेखक और राजनीतिक विश्लेषक अच्युत याग्निक कहते हैं, " नरेंद्र मोदी के तीन पुराने मुद्दे हैं. पहला हिंदुत्व, दूसरा गुजरात की अस्मिता और तीसरा विकास. इस बार चुनावों में जब उन्होंने देखा की गुजरती गौरव और विकास का मुद्दा उन्हें जीत नहीं दिला सकता तो वो सोहराबुद्दीन के जरिए हिंदुत्व पर आ गए." याग्निक ने सोहराबुद्दीन मसले पर कांग्रेस को अपना पक्ष सफ़ाई से न रखने का भी दोषी ठहराया. सोहराबुद्दीन पर बात कर के मोदी ने न केवल राज्य के हिंदू आग्रहियों पर निशाना साधा बल्कि कांग्रेस के प्रचार की गाड़ी भी पटरी से उतार दी. कांग्रेस में इस मुद्दे पर हिचकिचाहट दिखी. सोहराबुद्दीन पर बहस में पड़ने का मतलब मोदी द्वारा निर्धारित एजेंडे पर चलना हुआ. इस विषय पर न बोलने का मतलब अपनी धर्मनिरपेक्षता सवालिया निशान लगवाना. जो बात इन चुनावों को पिछली राज्य विधानसभा चुनावों से अलग बनती है वो है राज्य में सत्ताधारी भाजपा की अंदरूनी कमजोरी है. नरेंद्र मोदी का विरोध राज्य में भाजपा की रीढ़ माने जाने वाले पटेल समुदाय से संबंध रखने वाले पार्टी के कई कद्दावर नेता मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल और राज्य की पूर्व गृहमंत्री गोवर्धन झड़पिया इन्हीं में से हैं. विश्व हिंदू परिषद् के अंतरराष्ट्रीय महासचिव प्रवीण तोगडिया की मुख्यमंत्री से नाराज़गी जगजाहिर है. विश्व हिंदू परिषद् और इससे जुड़े बजरंग दल ने पिछले चुनावों में नरेंद्र मोदी की सरकार बनवाने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत की थी. पर क्या इन पटेल नेताओं का अपने समुदाय पर इतना प्रभाव है कि वे अपने पूरे वोट कांग्रेस या दूसरे मोदी विरोधियों को देने के लिए मना सकें! अहमदाबाद निवासी डॉ घनश्याम शाह का कहना है," इन नेताओं की केवल न्यूसेंस वेल्यू है, ये लोग केवल 8 से 10 फ़ीसद मतों को इधर उधर कर सकते हैं बस. पर कांग्रेस को निश्चित ही इन मतों से भारी फ़ायदा होगा क्योंकि इससे उसके मतों में अतिरिक्त वृद्धि होगी जो परम्परागत रूप से भाजपा को जाते रहे हैं. अन्य छोटी जातियों, मुसलमानों और आदिवासी मतों में जुड़ कर यह मत कांग्रेस को काफ़ी लाभ देंगे, ऐसा लगता है. " चुनावी मुद्दे प्रचार माध्यमों को देख कर लगा कि जैसे गुजरात में आमजन केवल सोहराबुद्दीन एन्काउन्टर केस या पटेल नेताओं की मोदी से नाराज़गी के राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक आयामों पर ही बहस कर रहे होंगे. पर ऐसा नही हैं. अगर अहमदाबाद में रहने वाले मंसूर अहमद के लिए मुसलमानों को चैन से रहने देने का मसला प्रमुख है तो गुजरात चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज की प्रमुख पारु एम जयकृष्णा जोर देती हैं कि राज्य में पिछले पांच वर्षों में दंगा नहीं हुआ, यह बात तो मुसलमान भी मानेगें. इसी तरह अमरेली की किसान वेलजी पटेल के लिए उनके खेतों की सिंचाई के लिए बिजली का मसला हर मसले से बड़ा है. मतलब किसी की सोच और प्राथमिकताएँ प्रभावित नहीं हुईं हैं. सन् 2002 के चुनावों में हिंदुओं, मुसलमानों के बीच हुई जातीय हिंसा के बाद राज्य में भाजपा के पक्ष में लहर के कारण 182 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस केवल 51 की संख्या पर सिमट गई थी. वहीं नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ी भाजपा को 127 स्थानों पर अभूतपूर्व जीत हासिल हुई थी. पर 2004 में हुए लोक सभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों को 90-90 विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल हुई थी. हालांकि लोक सभा में कांग्रेस को 12 और भाजपा को 14 सीटों पर सफलता हासिल हुई थी. राजनीतिक विश्लेषक ये भी मानते हैं, यह चुनाव एक तरह से मोदी विरुद्ध अन्य का चुनाव हैं. और भाजपा जीतती है तो यह मोदी की निजी जीत होगी. राज्य में नरेंद्र मोदी ही अपनी पार्टी की तरफ़ से अकेले स्टार प्रचारक हैं. पार्टी के बाकी के प्रचारक या तो नाराज़ हो कर मोदी का विरोध कर रहे हैं या उनका राज्य में कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं है. इसी तरह कांग्रेस की तरफ़ से पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गाँधी पूरे राज्य में पहचाना जाने वाला अकेला कांग्रेसी चेहरा है. यह भी कांग्रेस की विफलता है कि 17 साल विपक्ष में रहने के बाद भी पार्टी ऐसे नेता सामने नहीं ला पाई जो अपने भाजपा विरोध के कारण पहचाने जा सकें. अगर राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ तो इसके लिए कांग्रेस की मजबूती से ज़्यादा भाजपा में छिड़ी कलह जिम्मेदार होगी. पर राज्य में अगली सरकार का फ़ैसला राज्य के साढ़े तीन करोड़ से अधिक मतदाता करेंगें, साथ ही वे नरेंद्र मोदी के भविष्य का और कुछ हद तक भाजपा और कांग्रेस के भविष्य भी तय करेंगे. |
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