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रविवार, 09 दिसंबर, 2007 को 07:55 GMT तक के समाचार
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गुजरात में चुनाव प्रचार से ग़ायब है रौनक

चुनाव आयोग का भवन (फ़ाइल फ़ोटो)
चुनाव आयोग की सख़्ती से अब नज़र नहीं आते हैं चुनावी बैनर-पोस्टर और दीवारों पर लिखे नारे
मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने जब चुनाव सुधारों की शुरूआत की होगी तो उन्हें भी इस दृश्य की कल्पना नहीं रही होगी जो आज गुजरात के चुनावों में दिखाई देता है.

अहमदाबाद, मेहसाणा, बनासकाँठा, साबरकाँठा से लेकर राजकोट, वड़ोदरा और भरूच तक किसी भी ज़िले के किसी भी शहर में चले जाइए एक सन्नाटा पसरा दिखाई पड़ता है.

ऐसा सन्नाटा जिसकी कल्पना कुछ बरस पहले चुनावों के दौरान तो कतई नहीं जा सकती थी.

चुनाव आयोग ने साबित कर दिया है कि संवैधानिक संस्थाएँ अगर अपने अधिकारों का ठीक-ठीक इस्तेमाल करें तो इस देश में परिस्थितियाँ बदल सकती हैं.

वही राजनीतिज्ञ जिन पर काबू पाना आमतौर पर किसी के बूते की बात नहीं दिखाई देती वहीं राजनीतिज्ञ सीधे रास्ते पर चलते दिखाई देते हैं.

पाटन विधानसभा क्षेत्र में चुनाव को आठ दिन ही बचे हैं. इसे बड़ी सीट माना जाता है. यहाँ से शिक्षा मंत्री आनंदी बेन पटेल चुनाव लड़ रही हैं. वे मोदी की नज़दीकी मानी जाती हैं.

गायब चुनावी माहौल

पाटन नया ज़िला मुख्यालय भी है. वहाँ आधे घंटे घूमने के बाद जो पोस्टर बैनर दिखाई दिए वे सिर्फ़ पार्टी मुख्यालयों में थे.

शहर में जो रौनक दिखाई पड़ी वह ज़िला न्यायालय के आसपास थी.

न्यायालय परिसर में खड़े एक वकील महोदय से पूछा कि चुनाव का माहौल क्यों नहीं दिखता, उन्होंने पास से गुज़र रही एक चुनावी गाड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा कि अब चुनाव ऐसे ही होते हैं.

यही हाल बनासकाँठा के ज़िला मुख्यालय पालनपुर का था. वहाँ भी आप जाएँ तो चुनावी माहौल देखने को तरस ही जाएँगे.

पहले तो लगा कि उत्तरी गुजरात में चूंकि मतदान 16 दिसंबर को है इसलिए माहौल कुछ ठंडा लग रहा होगा लेकिन दक्षिण गुजरात में भी कमोबेश वही माहौल दिखा जैसा उत्तरी गुजरात में था.

भरूच में भी चुनाव के दो दिनों पहले ऐसा माहौल दिखता है मानो अभी चुनाव हो ही न रहे हों.

छत्तीसगढ़ से चुनाव की रिपोर्ट करने आए वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार ने अपनी रिपोर्ट में ख़ूब लिखा है, “गुजरात में चुनाव का माहौल ढूँढ़ना ऐसा ही है जैसा रेगिनस्तान में झरना ढूँढ़ना.”

 जिन्होंने सत्तर के दशक के चुनाव देखे हैं, उन्हें बख़ूबी याद होगा कि किस तरह शहर की हर दीवार चुनावी नारों से पट जाती थी. और किस तरह शहर की गलियों से गुज़रते हुए आसमान देखना असंभव होता था क्योंकि सर उठाएँ तो सिर्फ़ पोस्टर और चुनावी झंडे दिखाई पड़ते थे.

उनकी स्मृति में भी शेषन के पहले के चुनाव हैं और राजनीतिक रिपोर्ट करते हुए यक़ीनन उन्हें वही माहौल याद आता होगा.

जिन्होंने सत्तर के दशक के चुनाव देखे हैं, उन्हें बख़ूबी याद होगा कि किस तरह शहर की हर दीवार चुनावी नारों से पट जाती थी. और किस तरह शहर की गलियों से गुज़रते हुए आसमान देखना असंभव होता था क्योंकि सर उठाएँ तो सिर्फ़ पोस्टर और चुनावी झंडे दिखाई पड़ते थे.

हालांकि चुनाव संचालकों से बात करने पर पता चलता है कि चुनाव का खर्च इसके बाद भी कम नहीं हुआ है.

हिंदू नेता कहाँ हैं

यह एक सवाल गुजरात के चुनाव को देख रहे हर व्यक्ति के मन में है.

ख़ासकर प्रवीण तोगड़िया के बारे में हर कोई पूछ रहा है कि पिछले चुनाव में मोदी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने के बाद इस चुनाव में वे कहाँ नदारद हैं?

बताते हैं कि संघ परिवार और भाजपा के शीर्ष नेताओं में एक बार इस बात पर विचार हुआ था कि क्या गुजरात का नेतृत्व प्रवीण तोगड़िया को सौंप देना चाहिए?

यह प्रस्ताव तोगड़िया जी तक भी गया था. लेकिन जैसा कि वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश शाह बताते हैं कि उन्होंने कहा कि वे तो विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव हैं और एक छोटे से राज्य का नेतृत्व उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं होगा.

ज़ाहिर है उनकी नज़र दिल्ली में किसी पद पर रही होगी. पता नहीं एनडीए सरकार में किसी मंत्री के पद पर या फिर सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर.

विहिप महासचिव प्रवीण तोगड़िया (फ़ाइल फ़ोटो)
चुनाव प्रचार में नहीं सुनाई दे रहे हैं विहिप महासचिव प्रवीण तोगड़िया के ज़ोशीले भाषण

जानकार बताते हैं कि प्रवीण तोगड़िया की उपस्थिति को हर कहीं महसूस किया जा सकता है. वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह कहना है कि मोदी के ख़िलाफ़ जितनी भी असंतुष्ट गतिविधियाँ चल रही हैं उन सबके पीछे तोगड़िया जी का ही आशीर्वाद है.

वे राजकोट के किसान संघ के आंदोलन को भी इसी तरह से देखते हैं.

कहीं ऐसा तो नहीं कि हिंदूत्व से दूर रहने की रणनीति के तहत यह प्रहसन खेला जा रहा हो? इस सवाल पर प्रकाश शाह कहते हैं कि यह प्रहसन है भी तो एक ट्रैजिक कॉमेडी है.

शराब बंदी

गुजरात में शराब बंदी है क्योंकि यह गांधी का गुजरात है.

लेकिन यह शराब बंदी सिर्फ़ इतनी ही दिखाई देती है कि यहाँ सड़कों पर दुकानें नहीं हैं और आप सार्वजनिक रुप से शराब लेकर कहीँ आ-जा नहीं सकते.

वरना अहमदाबाद से लेकर नवसारी तक और जामनगर से बनासकाँठा तक कहीं भी जाइए, शराब इतनी आसानी से मिलती है जितनी आसानी से पीने का साफ़ पानी न मिले.

 अगर आप अतिथि हैं तो गांधी के गुजरात में आप पर पाबंदी लागू नहीं होती. अपनी यात्रा का टिकट दिखाइए और गुजरात में पिछले सात दिनों से होने का सबूत दीजिए और सरकारी काउंटरों से शराब ख़रीद लीजिए.

वैसे अगर आप अतिथि हैं तो गांधी के गुजरात में आप पर पाबंदी लागू नहीं होती. अपनी यात्रा का टिकट दिखाइए और गुजरात में पिछले सात दिनों से होने का सबूत दीजिए और सरकारी काउंटरों से शराब ख़रीद लीजिए.

शराब पाने का एक तरीक़ा और भी है. डॉक्टर से लिखवाइए कि आपके स्वास्थ्य के लिए शराब ज़रुरी है और आपको शराब मिल जाएगी. इस परमिट के लिए एक पर्ची भरनी पड़ती है. उस पर्ची की भाषा ज़रुर आपको आपत्तिजनक लग सकती है...उसमें कॉलम होते हैं, शराबी का नाम, शराबी के बाप का नाम....आदि-आदि.

और अगर यह दोनों रास्ते मंज़ूर नहीं तो इंतज़ार कीजिए आपके होटल का कोई बेयरा ही आकर ज़रा देर में आपसे पूछेगा, सिर्फ़ चाय पिएँगे या और कुछ चाहिए.

इस और कुछ में बीयर, वाइन से लेकर स्कॉच तक सब कुछ हासिल हो सकता है. बस ज़रा दाम ज़्यादा देने पड़ते हैं.

और शराब पीने वाले अक्सर दाम के चक्कर में नहीं पड़ते.

सच कहें तो दिल्ली और मुंबई में भी शराब इतनी आसानी से नहीं मिलती.

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