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बुधवार, 05 दिसंबर, 2007 को 22:35 GMT तक के समाचार
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चुनाव: मोदी की राजनीतिक कसौटी

नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी की राजनीति हमेशा से विवादास्पद रही है
गुजरात में ख़ास तौर पर शहरों में अगर आप नरेंद्र मोदी के बारे में बात करें तो आप पाएंगे कि लोगों की राय या तो अपने मुख्यमंत्री के बारे बहुत अच्छी है या बहुत ख़राब.

जैसे अहमदाबाद के समाजसेवी हनीफ़ लकड़ावाला मानते हैं कि नरेंद्र मोदी एक बुरे इंसान हैं और वो 2002 के दंगों में हुई मौतों के लिए ज़िम्मेदार हैं.

लकड़ावाला शहर में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव बढ़ाने के प्रयासों से जुडे हैं.

दूसरी और अहमदाबाद के ही रहने वाले डॉ प्रवीण सेठ का मानना है कि नरेंद्र मोदी एक बहुत अच्छे प्रशासक हैं.

वो यह भी मानते हैं कि आज के मोदी 2002 वाले मोदी हैं ही नहीं बल्कि उसकी जगह वो एक सहिष्णु और एक सच्चे प्रगतिवादी इंसान हैं.

डॉ सेठ मानते हैं की गुजरात चालने के लिए मोदी से बेहतर व्यक्ति अभी कोई नहीं है.

डॉ सेठ "इमेजिस ऑफ़ ट्रांस्फोर्मेशन:गुजरात एंड नरेंद्र मोदी" नामक पुस्तक के लेखक हैं.

अपने बारे में राय के कारण नरेंद्र मोदी का राजनीतिक जीवन भी दो एकदम विरोधाभासी छोरों पर चलता दिखता है.

मोदी चुनावों के पहले पत्रकारों को गुजरात के अभूतपूर्व विकास को देख पाने में अक्षमता लिए फटकार रहे थे.

चुनाव के दौरान अब वह ख़ुद राजनीतिक बहस को एक बार फिर भावनात्मक और सांप्रदायिक मुद्दों पर ले आए हैं.

राजनीतिक विरोधाभास

उनकी राजनीति में यह विरोधाभास नया नहीं है. एक समय के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक मोदी आज गुजरात में हिंदूवादी संगठनों और साथी स्वयंसेवकों की आँख की सबसे बड़ी किरकिरी हैं.

मोदी आज अपनी पार्टी में सबसे व्यापक जनाधार वाले नेता है.

 मोदी कांग्रेस की तरह व्यक्तिवादी राजनीति कर रहे हैं और उन्होंने पार्टी और संगठन का अस्तित्व गौण कर दिया है
अच्युत याज्ञनिक, समाजशास्त्री

उन्हें दिल्ली के दवाब के बाद 2002 में कुर्सी मिली और उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का पहला चुनाव मुख्यमंत्री बनने के बाद लड़ा.

करीब दो दशक पहले "इंदिरा इज़ इंडिया- इंडिया इज़ इंदिरा" के ख़िलाफ़ लड़ने वाले मोदी आज "नरेंद्र मोदी इज़ गुजरात- गुजरात इज़ नरेंद्र मोदी" के नाम पर चुनाव लड़ रहे हैं.

जाने माने समाजशास्त्री और राजनीतिक मामलों के जानकार अच्युत याज्ञनिक का मानना है कि राज्य मैं भाजपा का कांग्रेसीकरण हुआ है और वह नरेंद्र मोदी ने किया है.

उनका कहना है," मोदी कांग्रेस की तरह व्यक्तिवादी राजनीति कर रहे हैं और उन्होंने पार्टी और संगठन का अस्तित्व गौण कर दिया है. यह ठीक उसी तरह है कि आप अगर आप कांग्रेस के परिपेक्ष्य में देखेंगे तो पाएँगे कि राज्य में उसका भाजपाईकरण हुआ है और वह सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल रही है."

असहमति अस्वीकार्य

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का मुख्य कार्य पार्टी में परस्पर विरोधी गुटों और नेताओं के बीच समन्वय बैठाने का था और उनका पूरा समय केवल लोगों के साथ मिल बैठ कर एक राय बनाने में जाता था.

 नरेंद्र मोदी समाज का भला कर सकते हैं. पर वह यह मानते हैं कि यह काम उनके अलावा कोई और नहीं कर सकता इसलिए उन्होंने सत्ता में आने के बाद किसी भी साथी कार्यकर्ता को शासन में कोई जिम्मेवारी नहीं सौपीं
घनश्याम शाह, राजनीतिक विश्लेषक

पर मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद उन्होंने हर उस पार्टी नेता और कार्यकर्ता को किनारे कर दिया कर दिया जो जरा उनकी राय से असहमत था.

अहमदाबाद निवासी राजनीतिक मामलों के जानकर डॉ घनश्याम शाह कहते हैं कि एक आरएसएस कार्यकर्ता होने के नाते मोदी के पास एक मिशन है. मिशन को पूरा करने के लिए ज़रूरी प्रतिबद्धता है.

वो मानते हैं कि अपनी विचारधारा से नरेंद्र मोदी समाज का भला कर सकते हैं. पर मोदी मानते हैं कि यह काम उनके अलावा कोई और नहीं कर सकता इसलिए उन्होंने सत्ता में आने के बाद किसी भी साथी कार्यकर्ता को शासन में कोई जिम्मेवारी नहीं सौपीं.

वो कहते हैं, " मोदी के कार्यकाल में गुजरात विधानसभा पांच साल में केवल 144 दिन मिली है जो की एक संवैधानिक ज़रूरत है. और इन दिनों में विधानसभा में 163 विधेयक पारित हुए. हर विधेयक पर विधानसभा में ढंग से बहस होनी चाहिए लेकिन गुजरात में ऐसा कुछ नही हुआ."

पर तमाम विवादों के बावजूद मोदी गुजरात के कद्दावर नेता हैं जो ये मानते हैं कि उन्होंने जो भी किया सही किया.

और यह चुनाव शायद इसी बात की कसौटी है कि उनके प्रदेश की जनता उनसे सहमत हैं या नहीं.

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