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शुक्रवार, 07 दिसंबर, 2007 को 05:27 GMT तक के समाचार
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अख़बारों में मोदी की आलोचना
नरेंद्र मोदी पर अख़बार
समाचार पत्रों के संपादकीयों में कहीं मोदी को हिदायत तो कहीं उन्हें फटकार लगाई गई है
गुजरात विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले पर टिप्पणी और फिर इस पर चुनाव आयोग के नोटिस की ख़बर दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अनेक समाचार पत्रों में छाई हुई है और कई अख़बारों ने इस पर संपादकीय भी छापे हैं.

जिस तरह से दिल्ली के अख़बारों के पहले पन्ने गुजरात चुनाव के रंग से ऐसे रंगे हैं, उससे इस ख़बर के महत्व का आभास तो होता ही है, साथ ही समाचार पत्रों के संपादकीयों में कहीं मोदी को हिदायत तो कहीं उन्हें फटकार लगाई गई है.

हिंदी और अंग्रेज़ी के अनेक समाचार पत्रों ने इसे अपनी मुख्य ख़बर बनाया है या फिर पहले पन्ने पर इसे प्रमुखता से छापा है. जहाँ नवभारत टाइम्स की सुर्खी है - 'मोदी के बयान पर उठा तूफ़ान' वहीं पंजाब केसरी की सुर्खी है - 'तुलसी की धमकी के बाद मोदी को नोटिस.'

 भारतीय चुनाव आयोग को अब क़ानून के तहत कार्रवाई करनी है क्योंकि अनेक लोगों और मानावाधिकार गुटों ने उससे शिकायत की है. केंद्र पर भी दबाव है कि वह क़ानून के तहत जनता के एक सेवक के ख़िलाफ़ सार्वजनिक तौर पर हिंसा भड़काने के लिए कार्रवाई करे...
संपादकीय - एशियन एज

अपने संपादकीय में नवभारत टाइम्स लिखता है - 'आख़िरकार बात वहीं पहुँच गई, जहाँ उसे ले जाने से नरेंद्र मोदी अब तक इनकार कर रहे थे. गुजरात के 'विकास पुरुष' ने इलेक्शन कैम्पेन के एकदम आख़िरी दिनों में बहस को सांप्रदायिकता के घाट पर उतार दिया है....मोदी के लिए विकास और सांप्रदायिकता के बीच आवाजाही उतनी ही आसान है, जितनी टीवी के चैनल बदलना.."

जनसत्ता ने भी इसे मुख्य समाचार बनाते हुए हेडलाइन दी है - "मोदी को आयोग का नोटिस - कहा सोहराबुद्दीन पर दिए बयान से बढ़ेगी नफ़रत."

जनसत्ता अपने संपादकीय में कहता है - "गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ़र्ज़ी मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन के मारे जाने को जायज़ ठहरा कर एक ओर राजनीतिक विवाद को न्योता दिया है तो दूसरी ओर उनके बयान ने कई संवैधानिक सवाल भी खड़े किए हैं...चुनाव में भाजका को फ़ायदा होगा यह तो बाद में पता चलेगा, मगर एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर उसकी विश्वसनीयता को गहरी ठेस पहुँची है."

 चुनाव में भाजका को फ़ायदा होगा यह तो बाद में पता चलेगा, मगर एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर उसकी विश्वसनीयता को गहरी ठेस पहुँची है
संपादकीय - जनसत्ता

यही ख़बर इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, एशियन एज, द स्टेट्समैन, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और कई अन्य अख़बारों के भी पहले पृष्ठ पर प्रमुखता से छपी है.

अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपने संपादकीय में नरेंद्र मोदी की कड़ी आलोचना की है. अख़बार ने कई सवाल उठाए हैं - "क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल समय-समय पर चुनाव कराना ही है? लोगों के चुने प्रतिनिधियों का लोकतंत्र में आचार हो? क्या वह जनता का शासक है या फिर उसे मतदाताओं का नौकर होने चाहिए, और इनमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने उसके ख़िलाफ़ वोट दिया हो......."

 'आख़िरकार बात वहीं पहुँच गई, जहाँ उसे ले जाने से नरेंद्र मोदी अब तक इनकार कर रहे थे. गुजरात के 'विकास पुरुष' ने इलेक्शन कैम्पेन के एकदम आख़िरी दिनों में बहस को सांप्रदायिकता के घाट पर उतार दिया है....
संपादकीय - नवभारत टाइम्स

एशियन एज ने इसे अपनी मुख्य ख़बर तो बनाया ही है, साथ ही संपादकीय का शीर्षक दिया है - 'साएलेंट ऑन मोदी' यानी 'मोदी पर चुप.' अख़बार लिखता है - "भारतीय चुनाव आयोग को अब क़ानून के तहत कार्रवाई करनी है क्योंकि अनेक लोगों और मानावाधिकार गुटों ने उससे शिकायत की है. केंद्र पर भी दबाव है कि वह क़ानून के तहत जनता के एक सेवक के ख़िलाफ़ सार्वजनिक तौर पर हिंसा भड़काने के लिए कार्रवाई करे...."

अख़बारों की सुर्खियों से स्पष्ट है कि गुजरात के चुनाव पर राज्य की जनता की ही नहीं बल्कि भारत में राष्ट्रीय स्तर पर दिलचस्पी बनी हुई है.

ये भी स्पष्ट है कि ये चुनाव अब कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की बीच लड़ाई से आगे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कथन, उनकी शासन और कार्यशैली, उनकी सोच के इर्दगिर्द घूमने लगा है.

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