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फ़र्ज़ी मुठभेड़ों के लिए ज़िम्मेदार कौन ? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आधुनिक राष्ट्र की कुछ ख़ास चीज़ों को गिना जाए तो सिर्फ़ उसे ही एक तरह से नियोजित हत्या यानी योजना बनाकर किसी नागरिक को मारने का एकाधिकार है. प्रजातांत्रिक देशों में इस अधिकार का इस्तेमाल न्यायपालिका करती है. सिर्फ़ न्यायपालिका को ही हक़ है कि वो किसी की मौत का आदेश दे सके. प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और सेना प्रमुख भी ऐसा नहीं कर सकते तो फिर पुलिस की बिसात ही क्या है. लेकिन भारत में ऐसा होता आया है और पिछले 30-35 सालों में ये प्रवृत्ति बढ़ी है. मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक के एस ढिल्लों कहते हैं, ''ये कोई नई बात नहीं है. जब सरकार चाहती है तो पुलिस वाले ऐसा करने लगते हैं. तेलंगाना आंदोलन, पैप्सू आंदोलन, बंगाल में 70 के दशक में नक्सलवादी आंदोलन और पंजाब में राज्य प्रायोजित 'आतंकवाद' का इस्तेमाल हुआ.'' वे कहते हैं, ''अब मुंबई और दिल्ली जैसे इलाक़ों में इसके होने की वजह यह है कि सरकार और समाज को लगा कि कई लोग जिन्हें जेल में होना चाहिए वे सुनवाई में गवाह न मिलने से छूट जाते हैं, इससे फ़र्ज़ी मुठभेड़ की स्वीकार्यता मिल गई.'' भारत इस बात पर गर्व करता है कि वो कोई 'कठपुतली प्रजातंत्र' नहीं है. लोकतंत्र की जड़ें अगर बहुत मज़बूत नहीं हैं तो कमज़ोर भी नहीं हैं. समाज की स्वीकार्यता सवाल उठता है कि पुलिस को फ़र्ज़ी मुठभेड़ का सहारा क्यों लेना पड़ता है? दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त और मणिपुर और झारखंड में राज्यपाल रहे वेद मारवाह मानते हैं, '' इस समस्या के दो पहलू हैं. कुछ अफ़सर अपने फ़ायदे के लिए इस तरह की घटनाएं करते हैं. दूसरा पहलू प्रणाली की खामी बताता है, जिसके काफ़ी ख़तरनाक संकेत हैं. कई योग्य पुलिस अधिकारी मानते हैं कि क़ानून के दायरे में रहकर आतंकवाद या अपराध से नहीं लड़ा जाता है. इसे एक हद तक समाज और सरकार दोनों की स्वीकार्यता है.'' अधिकतर मामलों में राजनीतिज्ञ भी पुलिस पर दबाव डालते हैं कि वो इस तरह के हथकंडे अपनाए. क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि चाहे दिल्ली में अंसल प्लाज़ा की गोलीबारी हो या पंजाब में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियान हो या गुजरात की ताज़ा घटना पुलिस बिना अधिकार के ही राजनीतिक सहयोग और संरक्षण से इस तरह की जुर्रत कर सकते हैं. मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले गौतम नवलक्खा कहते हैं,'' इसकी मुख्य वजह ये है कि हुकूमत में रहने वाले लोग सुरक्षा के नाम पर अलग-अलग चीज़ों को ख़तरा मान लेते हैं और जनता भी कुछ हद तक समर्थन करती है. जनता को लगता है कि आतंकवाद से बचने का कोई और तरीका नहीं है. न्यायिक प्रक्रिया काफ़ी लंबी है और इसमें कई बार वे छूट भी जाते हैं.'' गुजरात में फ़र्ज़ी मुठभेड़ के आरोप में गिरफ़्तार पुलिस अधिकारी का ये कहना है कि सोहराबुद्दीन को मारना एक देशभक्ति का काम है- दर्शाता है कि राज्य में शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों की मानसिकता क्या है. यदि दोषी व्यक्ति को सज़ा देने का अधिकार पुलिस के पास है तो फिर अदालतों की ज़रूरत तो होनी ही नहीं चाहिए. गौतम नवलक्खा एक पुरानी कहावत को याद करते हैं. उनका कहना है, ''सैमुअल जॉनसन पहले ही कह चुके हैं - पेट्रियॉटिज़म इज़ द लास्ट रिज़ॉर्ट ऑफ़ ए स्काऊड्रल - यानि ग़लत काम करके आप कह सकते हैं कि ये तो हमने देशभक्ति के नाम पर किया है. इसको अगर आप थोड़ी संजीदगी से देखें तो पाएंगे एक ख़ास किस्म की सोच के तहत ख़ासकर गुजरात और आंध्र प्रदेश में जैसे जगहों में सुरक्षा के नाम पर ख़तरा माने जाने वालों लोगों को मार डालना देशभक्ति का बढ़िया तरीका है. अब इसमें बेगुनाह मारे जाएं या गुनाहगार मारे जाएं किसी को चिंता नहीं है.'' 'पुलिस का सांप्रदायीकरण' दूसरी तरफ़ अहमदाबाद के एक सामाजिक कार्यकर्ता रईस खाँ कहते हैं देशभक्ति की बात तो वहाँ होनी चाहिए जहाँ सच्चाई हो. वे कहते हैं,''अगर मुठभेड़ के पीछे जाएंगे तो आपको वे सभी फ़र्ज़ी मिलेंगे.'' परेशानी वाली बात ये भी है जिस तरह से इसकों फ़िल्मों, किताबों और समाचार पत्रों में महिमामंडित किया गया मानो बहुत बड़ा काम है. एक और प्रवृत्ति देखने में आई है और वो है भारतीय पुलिस में सांप्रदायीकरण की. केएस ढिल्लों मानते हैं,'' कुछ राज्यों की पुलिस सांप्रदायिक हो रही हैं और पिछले 20-25 साल से ये प्रवृत्ति शुरू हुई है. राज्य में जिस पार्टी की हुकूमत होती है वे उसके हिसाब से काम करने लगते हैं. हालांकि केंद्रीय बल में अभी ऐसी प्रवृत्ति नहीं है.'' दूसरी तरफ़ वेद मारवाह कहते हैं कि पुलिस इस बीमारी से अछूती नहीं रह सकती क्योंकि वो भी समाज का एक अंग है. वे कहते हैं, ''अगर समाज में सांप्रदायिकता है तो पुलिस में भी ऐसी भावना आ जाती है. पुलिस का प्रशिक्षण ऐसा होना चाहिए कि समाज के सभी वर्ग को समान समझे.'' सोहराबुद्दीन और कौसर बी इसलिए मारे गए क्योंकि वो एक ख़ास संप्रदाय से थे. चाहे वो कश्मीर हो या दिल्ली का अंसल प्लाज़ा कथित चरमपंथियों के शवों को चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई में जीत की ट्रॉफी के रूप में दिखाया जाता रहा है. इस तरह का आसान रास्ता चुनने का ये परिणाम है कि किसी को दोषी सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं है लेकिन चिंता इस बात को लेकर है कि अगर ये तर्क सोहराबुद्दीन शेख जैसे अपराधियों के लिए दिया जा सकता है तो क्या गारंटी है कि क़ानून का पालन करने वाले नागरिक इसकी चपेट में नहीं आएंगे. |
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