|
कथित मुठभेड़ मामले में नए 'गवाह' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में गुजरात पुलिस के हाथों कथित रूप से सोहराबुद्दीन शेख़ और उनकी पत्नी के मारे जाने के मामले ने नया मोड़ ले लिया है. हैदराबाद की एक ट्रेवल एजेंसी के कर्मचारियों ने कहा है कि 22 नवंबर 2005 की रात हैदराबाद से बेलगाम जा रही उनकी बस से पुलिस इस जोड़े समेत एक अन्य व्यक्ति को पकड़ कर ले गई थी. बस के ड्राइवर मिस्बाहुद्दीन से कई बार इस मामले में पूछताछ हो चुकी है. उन्होंने कहा है कि वे पूरा सहयोग करने के लिए तैयार हैं. मिस्बाहुद्दीन वही व्यक्ति है जिसने गुजरात पुलिस द्वारा सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी और एक अन्य व्यक्ति को उनकी बस से उतारकर ले जाते हुए देखा था . वे संगीता ट्रेवल्स में ड्राइवर का काम करते हैं.मिस्बाहुद्दीन के अलावा संगीता ट्रेवल्स के मैनेजर ने भी कहा है कि वे गवाही देने के लिए तैयार हैं. हाल ही में गुजरात की एक महिला पुलिसकर्मी संगीता ट्रेवल्स के दफ़्तर में आई थी. मिस्बाहुद्दीन कहते हैं कि पिछली बार पुलिस ने रात भर उनसे पूछताछ की थी. मिस्बाहुद्दीन कहते हैं, "मैं बहुत चिंतित हूँ. मेरा परिवार भी चिंता में है. गुजरात पुलिस से सब डरते हैं. मैं चाहता हूँ कि ये पूरा मामला जल्द से जल्द ख़त्म हो जाए. मैं सहयोग देने के लिए तैयार हूँ लेकिन सब कुछ जल्दी-जल्दी होना चाहिए. वरना मैं काम नहीं कर सकता." 'बस को रोका गया' एक अज्ञात स्थान से टेलीफ़ोन के ज़रिए बात करते हुए मिस्बाहुद्दीन ने 22 नवंबर 2005 की रात के बारे में बताया," करीब डेढ़ बजे का वक़्त था जब एक क्लाविस ने अचानक आकर मेरी बस का रास्ता रोका. एक व्यक्ति ने मुझसे कहा कि पुलिस कुछ छानबीन कर रही है और मैं अपनी सीट से न उठूँ. मैं उस व्यक्ति का चेहरा नहीं देख पाया. मेरा केबिन बस से अलग था इसलिए बस में क्या हुआ मैं देख नहीं पाया." इसके बाद ये बस बिदर के टडोला गाँव में जाकर रुकी और पुलिस ने करीब 10 मिनट तक इसकी जाँच की. पुलिसकर्मियो ने तीन व्यक्तियों को नीचे उतार लिया और ड्राइवर से बस ले जाने के लिए कहा. मिस्बाहुद्दीन बताते हैं, "कुछ दूर जाने के बाद मैने बस रोकी. मैने सफ़ाई करने वाले कर्मचारी से यात्रियों की गिनती करने के लिए कहा. कुल 35 यात्रियों में से तीन ग़ायब थे-सीट नंबर 29,30 और 31 पर बैठने वाले. तब जाकर मुझे पता चला कि पुलिस उन्हें ले गई है." मिस्बाहुद्दीन का कहना है कि इस दौरान उन्होंने किसी की चीख़-पुकार की आवाज़ नहीं सुनी. मिस्बाहुद्दीन ने कहा कि उन्हें लगा कि ये किसी लड़की के किसी के साथ भगाने का मामला होगा और पुलिस उन्हें ले गई होगी. इसके आगे के सफ़र में कुछ नहीं हुआ और अगले दिन मिस्बाहुद्दीन हैदराबाद वापस आ गए और संगीता ट्रेवल्स के मैनेजर नंदगिरी कुमार को पुलिस द्वारा तीन यात्रियों को ले जाने की बात बताई. बाद में नंदगिरी कुमार को पता चला कि इन तीनों यात्रियों की टिकिट किसी और ट्रेवल एजेंट ने बुक करवाई थी और उनके नाम और टेलीफ़ोन नंबर फ़र्ज़ी थे क्योंकि दिए गए नंबर पर कोई फ़ोन नहीं उठा रहा था. इसके बाद कोई इस मामले के बारे में पूछने नहीं आया तो संगीता ट्रेवल्स के कर्मचारी भी इस किस्से को भूल गए. सहयोग के लिए तैयार फिर मई 2006 में गुजरात के पुलिस अधिकारी संगीता ट्रेवल्स के दफ़्तर में ,सादे कपड़ों में आए. ये लोग मामले के बारे में और जानकारी चाहते थे. पुलिसवालों ने नंदगिरी कुमार, मिस्बाहुद्दीन, सफ़ाई कर्मचारी और मोहम्मद नईमुद्दीन से पूछताछ की. मिस्बाहुद्दीन कहते हैं, "पुलिसवाले जानना चाहते थे कि यात्रियों को कौन ले गया और क्या मैं उन लोगों को पहचान सकता हूँ जो यात्रियों को ले गए थे. मैंने उन्हें बताया कि मैं उस व्यक्ति का चेहरा नहीं देख पाया था." गुजरात के पुलिसकर्मी मिस्बाहुद्दीन को उस जगह पर भी ले गए जहाँ बस को रोका गया था और वहाँ वीडियोग्राफ़ी की. जबकि नंदगिरी कुमार का कहना है कि उन्हें मामले की गंभीरता के बारे में तब पता चला जब मीडिया में इस बारे में छपना शुरू हुआ. वे कहते हैं कि तब उन्हें एहसास हुआ कि क्यों पुलिसवाले बार-बार उनके यहाँ आ रहे हैं. मोहम्मद नईमुद्दीन ने बस को कुकतपल्ली के पास से रवाना किया था. वे बताते हैं कि उन्होंने ग़ायब हुए तीनों यात्रियों का चेहरा तो नहीं देखा था लेकिन उन्हें भरोसा कि बस पूरी तरह भरी हुई थी और लोग अपनी-अपनी सीटों पर ही बैठे थे. मोहम्मद नईमुद्दीन कहते हैं," अगर यात्रियों में कुछ झगड़ा हुआ होता तो मैने उनके चेहरे ज़रूर देखे होते." नंदगिरी कुमार कहते हैं कि वे मामले में सहयोग देने के लिए तैयार हैं और किसी भी कोर्ट में जाकर गवाही दे सकते हैं. हालांकि गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि हैदराबाद पुलिस ने भी उसके साथ सहयोग किया है लेकिन हैदराबाद पुलिस से कोई संगीता ट्रेवल्स नहीं आया है. मामला दरअसल गुजरात पुलिस ने दावा किया था कि उनके आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) और राजस्थान पुलिस के संयुक्त अभियान में 26 नवंबर 2005 को सोहराबुद्दीन मारे गए थे. पुलिस की इस कार्रवाई को फ़र्ज़ी मुठभेड़ बताते हुए सोराबुद्दीन के भाई ने सुप्रीम कोर्ट में न्याय की फ़रियाद की थी. इसके बाद इसके बाद डीजी वंजारा (उपमहानिरीक्षक, सीमा क्षेत्र, गुजरात), राजकुमार पांडियन (पुलिस अधीक्षक, इंटेलिजेंस ब्यूरो) और दिनेश एमएन (पुलिस अधीक्षक, अलवर, राजस्थान) को गिरफ़्तार कर लिया गया था. | इससे जुड़ी ख़बरें फ़र्जी मुठभेड़ मामले पर आज फ़ैसला30 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस 'फ़र्जी मुठभेड़' मामले में नया मोड़27 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस 'फ़र्जी मुठभेड़ पर सीबीआई जाँच हो'26 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस आईपीएस अधिकारी पुलिस हिरासत में 25 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गिरफ़्तार24 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस पार्टी से निलंबित किए गए बाबूभाई कटारा18 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस बाबू भाई कटारा पुलिस हिरासत में 19 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||