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मुंबई धमाके: गुप्तचर एजेंसियों पर सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुंबई में 11 जुलाई के धमाकों के बाद मुंबईवासी भले ही अपने रोज़मर्रा के काम पर लौट आए हों पर घटना के पीछे किसका हाथ है और क्या रही भारतीय गुप्तचर सेवाओं की खामियाँ. ऐसे सवाल अभी भी जवाब खोज रहे हैं. मुंबई धमाकों के समाचारों के साथ ही ये स्वर भी उठने लगे की क्यों देश की गुप्तचर सेवाओं को पता नहीं चला कि इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया जाने वाला है. रक्षा विश्लेषक प्रवीण स्वामी कहते हैं, "ये एक बहुत बड़ी घटना थी जो रोकी जा सकती थी. ऐसी ही चार घटनाएँ इससे पहले डेढ़ वर्षों में रोकी गई थीं. वर्ष 2004 में लश्करे तैयबा के समूह में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज को उड़ाने की योजना बनाई थी. 2005 में भी दो बार ऐसी कोशिशें हुई थीं. एक समूह ने आरएसएस के मुख्यालय पर हमला किया था. जब बहुत सारे हमलों की साज़िशें होंगी तो कोई न कोई सफल तो होगा ही." ऐसा नहीं है कि मुंबई में ऐसा पहले नहीं हुआ या भीड़-भाड़ वाली रेल सेवाओं और सार्वजनिक स्थानों को निशाना न बनाया गया हो पर एक ही दिन श्रीनगर और फिर मुंबई में धमाके चौंकाते ज़रूर हैं. सवाल भी उठता है कि क्या दोनों के तार जुड़े थे. 'असफलता नहीं' भारतीय गुप्तचर सेवा में संयुक्त निदेशक रहे मलयकृष्ण धर इस घटना को जाँच तंत्र की असफलता नहीं मानते. वो बताते हैं कि भारत का गुप्तचर विभाग दुनिया के किसी भी दूसरे गुप्तचर विभाग से कम नहीं है. उनकी इस बात पर विशेषज्ञों में आम राय है कि गुप्तचर सेवाओं को सबल बनाने की ज़रूरत है. पर सरकारें आती-जाती है. इस पर पुख्ता क़दम नहीं उठाए जाते. दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर राधा कुमार कहती हैं, "सबसे पहली बात है कि आपको लंबे समय को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी चाहिए. अगर आप लोगों को पकड़े तो वहीं एक दबाव बन जाता है." हालांकि वो कहती है, "हम सही तरीक़े से सबूत इक्ट्ठे नहीं कर सकते. बारीक़ी से सुरक्षा के लिए जो एहतियाती तैयारी होनी चाहिए वे नहीं हैं. मुंबई की ही बात लीजिए तो यह पहली घटना नहीं है फिर भी क्यों कहीं पर भी क्लोज़ सर्किट कैमरा नहीं लगाया गया है. दरअसल गुप्तचर विभाग और पुलिस में समन्वय का अभाव है." रक्षा विशेषज्ञ टी श्रीधर का मानना है कि भारत पाकिस्तान सरकार से बात कर रहा है पर ज़रूरत है फौज के हर स्तर पर बात करने की जो नहीं हो रही है और उसकी वजह यह है कि पाकिस्तान ऐसा नहीं चाहता. विश्लेषक कहते हैं पाकिस्तान से बातचीत की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए पर साथ ही देश के जाँच तंत्र को भी मज़बूत बनाने और चरमपंथी संगठनों के एजेंटों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर उनपर लगाम कसने की ज़रूरत है. |
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