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भारत, रूस और चीन की बैठक का महत्व

भारत, रूस और चीन के विदेश मंत्री
संयुक्त विज्ञप्ति में बहुध्रुवीय विश्व और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण पर ज़ोर दिया गया
चौदह फ़रवरी को नई दिल्ली में भारत, रूस और चीन के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई जिसमें अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, पश्चिम एशिया और उत्तर कोरिया जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई.

बातचीत के बाद जारी संयुक्त विज्ञप्ति में बहुध्रुवीय विश्व और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण पर ज़ोर दिया गया.

क्या इस बैठक से एक नए भू-रणनीतिक गठबंधन की भूमिका बन रही है? क्या भारत, रूस और चीन विश्व पटल पर अमरीका को चुनौती देने की स्थिति में हैं? और इसको लेकर अमरीका में क्या चिंताएं हो सकती हैं?

क्या हैं कारण?

विदेश मंत्री स्तर की ये तीनों देशों की दूसरी बैठक थी. दो साल पहले रूसी शहर व्लाडीवॉस्टोक में तीनों देशों के विदेश मंत्रियों की पहली बैठक हुई थी.

जुलाई में सेंट पीटर्सबर्ग में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ एक साथ मिले थे. दुनिया के दो सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देशों की आबादी में अगर रूस के 15 करोड़ लोग जोड़ दिए जाएँ तो ये तीनों देश दुनिया की 40 फ़ीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं.

 दस साल के बाद फिर दोस्ती की बात हो रही है. शीत युद्ध के बाद से जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परिवर्तन और बदलाव आया है उसका ये एक पहलु है. फ़ायदा तीनों देश उठाना चाहते हैं
चीन विशेषज्ञ, अल्का आचार्य

विश्व अर्थव्यवस्था का पाँचवां हिस्सा इन देशों के नियंत्रण में है और विश्व के कुल परमाणु हथियारों में आधे से ज़्यादा इन तीनों देशों के पास है. ये तीनों देश बहुत तेज़ी से दुनिया की नई शक्तियों के रूप में उभर रहे हैं जिनका दुनिया भर के उत्पादन क्षेत्रों, ऊर्जा आपूर्ति और सबसे बढ़कर सेवा क्षेत्र पर प्रभुत्व बढ़ता ही जा रहा है.

भारत और रूस के बीच तो हमेशा से ही गर्मजोशी के संबंध रहे हैं लेकिन चीन दोनों देशों के निकट नहीं रहा है. चीन का 1962 में भारत से और 1969 में रूस से, सीमा विवाद पर झगड़ा हुआ है.

सालों के अविश्वास, लड़ाई और विरोध के बावजूद इस तरह के फ़ोरम की ज़रूरत क्यों महसूस की गई? क्या इसके सदस्य देशों में आपस में अंर्तविरोध नहीं है?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीनी मामलों की विशेषज्ञ अलका आचार्य कहती हैं, "पहली बार जब तीनों देशों के त्रिकोणीय संबंध की बात की गई थी तब 1990 में प्रीमाकोव रूस के विदेशमंत्री थे. उस समय इसकी प्रतिक्रिया वैसी ही था जैसे कि दरिया में पत्थर फेंकें और डूब जाए. लेकिन 10 साल के बाद उस बात को फिर नया मोड़ दिया गया है. इसको हमें शीत युद्ध के बाद से जो अंतरराष्ट्रीय संबंध में परिवर्तन और बदलाव आया है उसका एक पहलु है. सभी देशों को एक नया लचीलापन मिला है अपने रिश्तों को अलग स्वरूप देने का और उसका फ़ायदा तीनों देश उठाना चाहते हैं."

बैठक के बाद तीनों विदेश मंत्रियों ने ज़ोर देकर कहा कि वो बहुध्रुवीय कूटनीति के प्रति प्रतिबद्ध हैं और इस समूह को किसी और देश के हितों के ख़िलाफ़ नहीं देखा जाना चाहिए.

'अमरीका विरोधी नहीं'

 हम तीनों इस बात पर सहमत हुए है कि हमें अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण के लिए और मेहनत करनी है और बहुध्रुववाद के सिद्धांत का सम्मान करना है
चीनी विदेश मंत्री

चीन के विदेश मंत्री ली झाओ सिंग ने कहा, "हम तीनों इस बात पर सहमत हुए है कि हमें अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण के लिए और मेहनत करनी है और बहुध्रुववाद के सिद्धांत का सम्मान करना है. तीनों देशों ने इस बात पर भी ज़ो दिया कि उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों के बीच एकता और बढ़ानी है ताकि संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद विश्व शांति और विकास में और बड़ी भूमिका निभा सके."

दूसरे शब्दों में कूटनीति की भाषा में अमरीका को ये बताया जा रहा है कि ये अमरीका विरोधी गठबंधन कतई नहीं है. लेकिन दूसरी तरफ़ ये तर्क भी दिया जा सकता है कि कूटनीतिक भाषा में ही सही ये देश अमरीका के अकेले 'सुपर-पावर' होने को चुनौती दे रहे हैं.

हिंदू अख़बार के विदेशी मामलों के संवाददाता अमित बरूआ ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है, "मैं चुनौती तो नहीं मानूंगा, क्योंकि आप संयुक्त घोषणा पत्र देखें तो बहुत सतर्कतापूर्ण बातें कही है और जानबुझकर ऐसा कुछ भी नहीं कहा है जिससे लोगों को कोई चिंता हो. ऐसा नहीं है कि यह बैठक होकर फिर अगली बार नहीं होगी. एक दिलचस्प बात यह भी है कि भारत शेंघाई कॉपरेशन ऑर्गनाइज़ेन का भी पर्यवेक्षक है जिसमें रूस और चीन ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. यह एक रोचक घटनाक्रम है, 'एक्सेस' नहीं है किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है. लेकिन ये एक संकेत लगता है कि जो एकतरफ़ा कार्रवाई करने वाली शक्तियाँ हैं उनको रोकने का भविष्य में ये लोग कार्यक्रम बना सकते हैं."

सवाल ये उठता है कि भारत और चीन के जिस तरह से संबंध अमरीका से हैं उसे देखते हुए क्या ये गुट अमरीका का विरोध करने की स्थिति में हैं?

दूसरे इस तरह की नौबत भी आ सकती है कि कुछ मुद्दों पर भारत को चीन और अमरीका में से एक का चुनाव करना पड़े. पूर्व विदेश सिचव शशाँक कहते हैं कि ऐसी स्थितियाँ बहुत कम आएंगी.

उनका कहना है, "चीन और अमरीका के संबंध कई मसलों पर बहुत अच्छे जुड़े हुए हैं और अभी भी साल में तीन या चार बार राष्ट्र प्रमुखों की मुलाकात हो जाती है. इसी प्रकार भारत को चीन के साथ अपने विश्वास को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है. इसी प्रकार से डब्ल्यूटीओ में जहाँ चीन नया सदस्य है वहां भारत में और अमरीका में थोड़ी सी चिंता ज़रूर है कि चीन को उत्पादन के क्षेत्र में सब्सीडी मिल जाती है तो किस प्रकार से और देशों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर असर पड़ेगा. "

तीनों देश इस बात पर सहमत थे कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों में टकराव का विरोध किया जाए. ज़ाहिर है उनका इशारा अन्य मुद्दों के अलावा ईरान की तरफ़ भी है.

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