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उम्मीदों की कसौटी पर संविधान? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ था तो सोचा यही गया था कि देश में लोगों का, लोगों के लिए, लोगों के द्वारा निर्वाचित सरकार होगी जिसमें न सिर्फ़ सब लोगों को बराबरी का हक़ मिलेगा बल्कि शोषितों को ऊपर उठने का मौका भी मिलेगा. इस मोड़ पर भारत ने बहुत से सपने देखे लेकिन आधी सदी के बाद एक आम आदमी क्या हाशिये पर धकेल नहीं दिया गया, जिसे उसे लोकतंत्र की धुरी पर होना था? इस सोच में अब कितना दम है कि लोकतंत्र का मतलब जनहित को बढ़ावा देना होता है? इन प्रश्नों के बीच तमिलनाडु के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला ने तो राज्य विधानसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारत के संविधान को नए सिरे से लिखा जाना चाहिए. इस वक्तव्य पर काँग्रेस के नेताओं ने भी कहा कि इस पर बहस होनी चाहिए. 'कसौटी पर खरा उतरा' अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर का इस संबंध में कहना है, "ये माँग सिर्फ़ इसलिए उठ रही है क्योंकि तमिलनाडु में आरक्षण 69 प्रतिशत है, जबिक सुप्रीम कोर्ट ने कहा हुआ है कि यह 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए." राजेंद्र सच्चर कहते हैं, "इस पर बहस हो सकती है लेकिन सिर्फ़ इस आधार पर संविधान को नए सिरे से लिखने की माँग नहीं की जा सकती. संविधान पूरी तरह से कसौटी पर खरा उतरा है. इसे लागू करने में भले ही कोताही हुई होगी." वैसे जब संविधान लागू होने के 50 साल पूरे हुए थे तो तत्कालीन सरकार ने एक संविधान समीक्षा समिति बनाई थी. इस समिति ने कुछ सिफ़ारिशें भी दी थीं जिस पर अब तक अमल नहीं किया जा सका है. लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप भी उस समिति के एक महत्वपूर्ण सदस्य थे. संविधान को नए सिरे से लिखे जाने के सवाल पर वे कहते हैं, "मैं ये नहीं कहता कि संविधान को नए सिरे से लिखा जाना चाहिए लेकिन इसमें बहुत-सी ख़ामियाँ सामने आई हैं जिनपर विचार किया जाना चाहिए. जैसे केंद्र का राज्यों पर कितना अधिकार हो और बार-बार राज्यों पर धारा-356 लगाए जाने का मामला." दूसरी ओर सेंटर फॉर द स्टडीज ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ यानी सीएसडीएस के सीनियर फेलो राजीव भार्गव मानते हैं कि वर्तमान संविधान किसी भी परिस्थिति से निपटने में सक्षम है. वे कहते हैं, "इसके नैतिक और राजनीतिक दर्शन के प्रावधानों को एकदम छेड़ा नहीं जाना चाहिए लेकिन संस्थागत व्यवस्था और इसे लागू करने के तरीके पर विचार करते रहना चाहिए और हम यह करते भी रहते हैं." आरक्षण और संशोधन कुछ क्षेत्रों में दलील दी जाती है कि अगर आरक्षण के मुद्दे पर इस बात की आशंका न होती कि न्यायपालिका विधायिका का साथ नहीं देगी तो संविधान में संशोधन की बात नहीं उठती. संविधान सभा में आरक्षण की ज़ोरदार वकालत करते हुए भीमराव अंबेदकर ने कहा था, "शुरुआत करने के लिए और इस देश में रहने वाले हर वर्ग को प्रेरित करने के लिए बहुसंख्यक वर्ग की ओर से यह एक बड़ा काम होगा कि वह उन लोगों के पूर्वाग्रहों को नज़रअंदाज करे जो साथ चलने के लिए तैयार नहीं हैं. आइए, हम लोग उन नारों और शब्दों का त्याग करें जो डर पैदा करते हैं. अगर हम इन रास्तों पर लंबे समय तक एक साथ चलें तो हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता." लेकिन जब इस आरक्षण को 40 वर्ष से और आगे बढ़ाया गया और इसके दायरे में दूसरी पिछड़ी जातियों को लिया गया तो विरोध के स्वर उठे और एक लंबी बहस शुरू हुई. संविधानविद् सुभाष कश्यप कहते हैं, "आरक्षण का मुद्दा बहुत तरह से आ रहा है लेकिन यह व्यवस्था कहाँ तक लोकतंत्र और सुशासन के साथ चल सकती है यह विचार करने की बात है. जो पिछड़े हैं उनको औरों के बराबर आने का मौका मिलना चाहिए, इस पर कोई दो राय नहीं है लेकिन क्या यह सिर्फ़ आरक्षण से होगा, इस पर मत अलग-अलग हो सकते हैं." तो क्या भारतीय संविधान में ख़ामियाँ ही ख़ामियाँ है? अगर संविधान अपनी कसौटियों पर खरा नहीं उतरा को क्या ये उसका दोष है? राजेंद्र सच्चर इसके लिए लोगों को दोषी ठहराते हैं. वे कहते हैं, "संविधान तो सरकार चलाने की एक व्यवस्था होती है. अगर ग़रीबी जैसी समस्याओं से सरकारें नहीं निपट पाईं तो यह क्रियान्वयन की समस्या है." सवाल उठता है कि वो कौन से क्षेत्र रह गए जिनमें न तो संविधान में कुछ कहा गया और न ही इसे लागू करने वालों ने कोई पहल की. सीएसडीएस के राजीव भार्गव का मानना है, "जिस तरह से गोपनीयता के क़ानून का इस्तेमाल होता है उसपर विचार करना चाहिए." इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज़ादी के बाद संविधान निर्माताओं ने भारत को एक से एक लोकतांत्रिक संस्थाएं दीं. आज ज़रूरत है एक ऐसी पहल करने की जिससे लोकतांत्रिक संस्थाएं आम आदमी की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने का वाहक बने. | इससे जुड़ी ख़बरें न्यायपालिका बनाम विधायिका की बहस13 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस आपातकाल के साथ ही सभी अटकलों पर विराम12 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस बांग्लादेश की आज़ादी का सफ़र15 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस श्रीलंका में तनाव बढ़ने के मूल कारण04 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस क्या आम आदमी पर नज़र है अदालतों की?25 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस 'अदालती फ़ैसले पर राजनीति उचित नहीं'23 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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