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शनिवार, 13 जनवरी, 2007 को 09:05 GMT तक के समाचार
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न्यायपालिका बनाम विधायिका की बहस

सुप्रीम कोर्ट
ताज़े फ़ैसले से संसद में बने लगभग सभी क़ानून न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गई है
संसद की शक्तियों के संबंध में एक और ऐतिहासिक फ़ैसला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया क़ानून न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह मुक्त नहीं है.

अगर इस क़ानून से मौलिक अधिकारों और संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन होता है तो देश की सर्वोच्च अदालत इसकी समीक्षा कर सकती है.

अधिकतर लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का स्वागत किया है लेकिन कुछ लोगों ने इसे सुप्रीम कोर्ट की सक्रिय होती भूमिका का एक और मिसाल बताया है.

14 जनवरी को अवकाश ग्रहण कर रहे न्यायमूर्ति वाईके सभरवाल की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने जो फ़ैसला सुनाया है उसके बारे में कहा जा रहा है कि वो आने वाले समय में सरकारों को नए-नए क़ानूनी चक्रव्यूह बनाने और संविधान की नौवीं अनुसूची को रामबाण की तरह इस्तेमाल करने से पहले कई बार सोचने पर मजबूर करेगा.

'ऐतिहासिक फ़ैसला'

कुछ हल्कों में इसे पिछले साठ साल में सुप्रीम कोर्ट का सबसे ऐतिहासिक फ़ैसला कहा जा रहा है.

जाने-माने क़ानूनविद एजी नूरानी कहते हैं, "इसे शायद ऐतिहासिक फ़ैसला कहा जाए लेकिन हक़ीकत ये है कि इस फ़ैसले को आने में 34 वर्ष लगे और हैरत की बात ये है कि किसी ने भी इसे चुनौती नहीं दी थी. आरक्षण की वज़ह से इसे चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा ही माकूल फ़ैसला दिया है."

वर्ष 1951 में जब जवाहर लाल नेहरू ने भूमि सुधारों की शुरुआत की थी तब नौवीं अनुसूची को संविधान में जोड़ा गया था ताकि इन सुधारों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सके.

नौवीं अनुसूची का ये मतलब यह नहीं था कि थोक के भाव में 60-70 क़ानून बनाकर इसमें डाल दीजिए.
सीपी भांबरी

लेकिन बाद में इसमें ऐसे क़ानून डाले गए जिनके बारे में सरकार को डर था कि अदालतें प्रतिकूल फ़ैसला सुना सकती है.

जाने-माने राजनैतिक विश्लेषक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफ़ेसर सीपी भांबरी मानते हैं, "नौवीं अनुसूची का मतलब यह नहीं था कि थोक के भाव में 60-70 क़ानून बनाकर इसमें डाल दीजिए. केंद्र और राज्य सरकारों ने न्यायिक समीक्षा से बचने के लिए क़ानून बनाकर डाल दिए."

भांबरी कहते हैं, "तमिलनाडु ने तो हद ही कर दी. वहाँ 70 फीसदी आरक्षण है और नए प्रस्ताव के तहत इसे 80 फीसदी करना प्रस्तावित है. सबसे बड़ा मजाक तो दिल्ली में होनेवाला था. राजनीतिक दल शहर के मास्टर प्लान को ही नौवीं अनुसूची में डालने की माँग कर रहे थे. ये सब देखकर तो लगता है कि न्यायिक समीक्षा ज़रूरी हो गई थी."

सवाल उठता है कि इस फ़ैसले के भारतीय राजनीति पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ने जा रहे हैं.

आरक्षण और सीलिंग जैसे मुद्दे जिन्हें नौवीं अनुसूची में डालने की बात की जा रही थी, अब सरकार ऐसा करने से पहले सौ बार सोचेगी.

एजी नूरानी मानते हैं, ''अब सरकार किसी मुद्दे को नौवीं अनुसूची में डालने से पहले सोचेगी क्योंकि उसे चुनौती मिलने का ख़तरा बना रहेगा. तमिलनाडु जैसे राज्य और सांसद भी बेजा दबाव नहीं बना पाएंगे.''

छोटे राजनीतिक दलों जैसे पीएमके और एआईडीएमके ने इस फ़ैसले पर आपत्ति जताई है लेकिन काँग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के क़ानून विशेषज्ञों ने इसका स्वागत किया है.

'ताकतवर न्यायपालिका'

आरक्षण समर्थक भी इस फ़ैसले को नहीं पचा पा रहे हैं. दलित नेता रामदास अठावले भी इससे बहुत ज़्यादा खुश नहीं हैं.

जस्टिस सब्बरवाल
न्यायपालिका की अति सक्रियता पर फिर से बहस छिड़ गई है

वे कहते हैं, '' हम तो सुप्रीम कोर्ट का आदर करते हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट को भी संसद का आदर करना चाहिए. क़ानून बनाने का अधिकार संसद को है और संसदीय प्रजातंत्र में संसद ही सर्वोच्च है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ख़ुद को सर्वोच्च मान रहा है. इसलिए इस पर और विचार किए जाने की ज़रूरत है.''

बदली हुई परिस्थितियों में ख़ास कर जब गठबंधन की राजनीति का जमाना है, सरकार के लिए गठबंधन दलों की लोक लुभावन नीतियों को नौवीं अनुसूची का कवच पहनाना मुश्किल हो जाएगा.

जाने-माने वकील और काँग्रेस सांसद आर के आनंद कहते हैं, ''पहले एक ही पार्टी की सरकार होती थी तो वो अपना काम नौवीं अनुसूची में डाल देती थी. आज ये मुश्किल हो गया है. अब उचित आधार पर ही ऐसा करना संभव हो पाएगा. ''

हाल के दिनों में देखी गई न्यायिक सक्रियता पर एजी नूरानी कहते हैं, ''ऐसा तभी होता है जब सरकारें कमज़ोर होती हैं. इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के जमाने में ऐसा नहीं होता था. नरसिम्हा राव के समय से ये दौर शुरू हुआ.''

 'ऐसा तभी होता है जब सरकारें कमज़ोर होती हैं. इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के जमाने में ऐसा नहीं होता था.
एजे नूरानी

जिस तरह की सक्रियता सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई है उससे उसके बारे में कहा जाने लगा है कि भारतीय न्यायपालिका दुनिया की सबसे ताकतवर न्यायपालिका है.

इससे जुड़े सवाल पर सीपी भांबरी कहते हैं, '' सबसे शक्तिशाली न्यायपालिका तो अमरीका की है क्योंकि वहाँ पर सामाजिक सुधारों के ख़िलाफ़ बहुत लोग हैं. यहाँ पर तो सामाजिक सुधार राज्य का विषय है. संसद और अदालत, दोनों प्रजातंत्र की संस्थाएं हैं. इससे कोई घबराने वाली बात नहीं है.''

हो सकता है कि आने वाले समय में इस फ़ैसले को विधायिका और न्यायपालिका के बीच टकराव के एक और उदाहरण के रूप में देखा जाए लेकिन इस फ़ैसले के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की मूल भावना की रक्षा करने का जज़्बा जरूर दिखाया है.

टॉमस हक्सले ने एक बार बिल्कुल सही कहा था कि ये ज़रूरी नहीं है कि कौन सही है बल्कि क्या सही है ये ज़रूरी है.

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