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गुरुवार, 11 जनवरी, 2007 को 14:29 GMT तक के समाचार
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विधायिका-न्यायपालिका में टकराव बढ़ेगा?

सुप्रीम कोर्ट
इस फ़ैसले से संसद में बने लगभग सभी क़ानून न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गई है
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए कहा है कि संविधान की नौवीं अनुसूची में रखे गए क़ानूनों की भी न्यायिक समीक्षा हो सकती है.

यानी ऐसे क़ानून जिन्हें नौवीं सूची में रख कर न्यायिक समीक्षा को टाला जा सकता था अब संभव नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का सीधा असर यूपीए सरकार की अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण विधेयक और दिल्ली सीलिंग एक्ट पर पड़ सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश वाईके सभरवाल की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यों की संवैधानिक खंडपीठ ने एक मत से कहा है कि संसद ऐसा कोई का़नून नहीं बना सकती जो न्यायिक समीक्षा के दायरे में ना हो.

संविधान की नौवीं सूची में रखे गए क़ानून हालाँकि न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर माने जाते थे. अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नौवीं सूची में रखे गए सभी क़ानूनों की समीक्षा हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ का फ़ैसला है कि अगर कोई क़ानून मौलिक अधिकारों के अनुरूप नहीं है और इस वजह से वो संविधान के मूल्यों को क्षति पहुँचाता है तो उसे रद्द कर दिया जाएगा.

हाल ही में अन्य पिछ़ड़ा वर्ग के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण और दिल्ली के रिहायशी इलाकों में ग़ैर क़ानूनी दूकानों को हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट और संसद के बीच मतभेद रहे हैं.

अंतिम फ़ैसला

सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ वकील एमएन लाहोटी कहते हैं कि अब इन कानूनों की वैधता पर अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट ही करेगा.

 ऐसे परिवर्तन न्यायपालिका में बहुत कम हुए हैं. वहीं किसी क़ानून की न्यायिक समीक्षा इस आधार पर हो कि वो संविधान के मूल ढांचे पर कुठाराघात करता है, एक पेचीदा मसला है क्योंकि यह तो तय हो कि संविधान के मूलभूत सिद्धांतो की परिभाषा होनी चाहिए. और इसका अधिकार संसद को होना चाहिए
जगदीप धनकड़

केंद्र सरकार ही नहीं बल्कि कई राज्यों सरकारों द्वारा बनाए गए क़ानूनों पर भी इस फ़ैसले से सवालिया निशान लग सकते हैं.

कई न्यायविदों का यह भी मानना है कि सरकारें अपनी राजनीतिक मजबूरियों की वजह से कुछ कानून बनाती है और उन्हें संविधान की नौवीं सूची में रखती हैं ताकि सुप्रीम कोर्ट उन्हें बदल ना सके.

यहाँ तक कि 1973 तक नौवीं सूची में केवल दर्जन भर क़ानून थे लेकिन तब से अब तक यह संख्या बढ़ कर 280 तक पहुँच गई है.

अपने फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संविधान की धाराओं का अर्थ लगाने का अधिकार सिर्फ़ उसके पास है और कोई क़ानून इस दायरे से बाहर नहीं है.

हालाँकि क़ानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने इस पर यह कहते हुए प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है कि उन्होंने अभी पूरा फ़ैसला नहीं देखा है. कांग्रेस की महासचिव जयंती नटराजन ने दबे से शब्दों में इसका स्वागत किया है.

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने भी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया है.

नौवीं अनुसूचि के बारे में पूर्व क़ानून मंत्री और न्यायविद जगदीप धनकड़ का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का यह मतलब नहीं है कि नौवीं अनुसूची का औचित्य ख़त्म हो गया है.

सुप्रीम कोर्ट का कहना इतना ही है कि इसमें अगर कोई ऐसा क़ानून है जो संविधान में व्यक्त मौलिक अधिकारों के ख़िलाफ़ है तो उसकी समीक्षा की जाएगी.

जगदीप धनकड़ ने यह भी कहा कि 50 साल से अधिक समय में जो सामाजिक परिवर्तन आए हैं मिसाल के तौर पर पिछड़ें वर्ग को जिस प्रकार विधायिका और कार्यपालिका में निर्णायक जगह मिली है उतनी जगह न्यायपालिका में नहीं मिली है.

उन्होंने कहा, "ऐसे परिवर्तन न्यायपालिका में बहुत कम हुए हैं. वहीं किसी क़ानून की न्यायिक समीक्षा इस आधार पर हो कि वो संविधान के मूल ढांचे पर कुठाराघात करता है, एक पेचीदा मसला है क्योंकि यह तो तय हो कि संविधान के मूलभूत सिद्धांतो की परिभाषा होनी चाहिए. और इसका अधिकार संसद को होना चाहिए."

दूसरी ओर संविधान के जानकार सुभाष कश्यप नहीं मानते कि इससे न्यायपालिका और विधायिका में कोई टकराव आएगा.

उनका कहना है कि संविधान के सिद्धांतों को परिभाषित करना सुप्रीम कोर्ट का काम है. विधायिका को क़ानून बनाने का अधिकार है लेकिन वो संविधान के मौलिक सिद्धांतों के अनुरूप है यह नहीं यह तय करना सुप्रीम कोर्ट का काम है.

लोकतंत्र के यह दोनों ही स्तंभ अपना अपना काम करते हैं इसे टकराव की तरह नहीं देखा जा सकता.

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