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'फ़तवा जबरन थोपा नहीं जा सकता'
सुप्रीम कोर्ट
केंद्र सरकार का कहना है कि फ़तवा सिर्फ़ सुझाव या विचार है
भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दायर कर कहा है कि मुस्लिम मौलवियों का फ़तवा महज एक सुझाव है और इसे ज़बर्दस्ती थोपा नहीं जा सकता.

केंद्र सरकार ने यह हलफ़नामा सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका के जवाब में दिया है जिसमें देश के सभी इस्लामी और शरियत अदालतों को भंग करने की माँग की गई है.

यह जनहित याचिका इमराना मामले में दारुल उलूम के फ़तवे के बाद दायर की गई थी.

 मुफ़्ती के पास इस तरह का कोई अधिकार नहीं है कि वो किसी भी व्यक्ति को फ़तवा मानने के लिए मजबूर करें. यहाँ तक कि जो व्यक्ति सलाह माँग रहा है, वो भी इसे मानने को बाध्य नहीं है
केंद्र सरकार का हलफ़नामा

इमराना ने अपने ससुर पर बलात्कार का आरोप लगाया था और दोषी साबित होने पर निचली अदालत ने उन्हें दस साल के कारावास की सज़ा सुनाई है.

इसी मामले पर दारुल उलूम ने कहा था कि ससुर के साथ शारीरिक संबंध स्थापित होने के बाद इमराना की शादी बेमतलब हो गई है.

सरकार का जवाब

सरकार ने अपने हलफ़नामे में कहा है, "मुफ़्ती के पास इस तरह का कोई अधिकार नहीं है कि वो किसी भी व्यक्ति को फ़तवा मानने के लिए मजबूर करें. यहाँ तक कि जो व्यक्ति सलाह माँग रहा है, वो भी इसे मानने को बाध्य नहीं है."

केंद्र सरकार ने कहा है कि इस्लामी अदालत दार उल क़ज़ा और निज़ाम उल कज़ा कोई 'समानांतर न्यायिक प्रणाली' नहीं हैं और ये मुसलमानों को यहाँ के क़ानूनों के तहत गठित न्यायिक व्यवस्था की शरण में जाने से नहीं रोकती हैं.

सरकार ने अदालत को बताया कि इस्लामी न्यायिक व्यवस्था वैकल्पिक है और इसके तहत आपस में ही मामला हल करने की कोशिश की जाती है लेकिन इन्हें भी बलपूर्वक अपना आदेश मनवाने का अधिकार नहीं है.

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