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बूटा की रिपोर्ट की जाँच होगी: सुप्रीम कोर्ट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क़ानूनी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह पर लगे पक्षपात के आरोपों की जाँच की जानी चाहिए. इनमें केंद्र सरकार को ग़लत रिपोर्ट देने का आरोप भी शामिल है जिसके आधार पर बिहार में विधानसभा भंग कर दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों की बेंच ने कहा कि देश के राज्यपालों को संवैधानिक तौर पर अदालती कार्रवाइयों से छूट मिली हुई है लेकिन उनके ऊपर लगे आरोप इस संवैधानिक छूट के दायरे से बाहर हैं. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि उन पर ग़लत मंशा के साथ रिपोर्ट भेजने के आरोप लगा है और उसकी जाँच करने का अधिकार अदालत को है. अदालत का कहना है कि राज्यपाल पर लगे आरोपों की सफ़ाई देना केंद्र सरकार का काम है, सरकार को चाहिए कि वह बिहार विधानसभा में विपक्षी गठबंधन एनडीए के विधायक रहे लोगों के सवालों के जवाब दें. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत मिली छूट में ग़लत मंशा का मामला शामिल नहीं है, इस अनुच्छेद के तहत मिली छूट का यह मतलब नहीं है कि राज्यपाल असंवैधानिक व्यवहार करें. सरकार को चाहिए कि इस मामले पर वह याचिकाकर्ताओं की चुनौती का जवाब दे." बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र अदालत ने इस मामले की सुनवाई तय तारीख़ से पहले शुरू कर दी है. इस मामले में तेज़ गति से सुनवाई करने का निर्णय करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए सिर्फ़ तीन दिन का समय दिया है. अदालत का कहना है कि 29 सितंबर तक इस मामले की सुनवाई समाप्त हो जाएगी और फ़ैसला हर हाल में बिहार में चुनाव से काफ़ी पहले कर दिया जाएगा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव पर स्थगनादेश देने से इनकार कर दिया है और कहा है कि चुनाव तय कार्यक्रम के हिसाब से ही होंगे. मगर अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की रिपोर्ट को संविधान सम्मत नहीं पाया तो क्या होगा, क्योंकि इसी रिपोर्ट के आधार पर विधानसभा भंग की गई थी जिसके परिणामस्वरूप वहाँ चुनाव हो रहे हैं. अब सबकी नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि अगर राज्यपाल को ग़लत मंशा से निर्णय करने का दोषी माना गया तो क्या बिहार में होने वाले चुनाव रद्द कर दिए जाएँगे और पिछली विधानसभा बहाल की जाएगी या नहीं. |
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