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शुक्रवार, 12 जनवरी, 2007 को 02:33 GMT तक के समाचार
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आपातकाल के साथ ही सभी अटकलों पर विराम

सेना
आपातकाल लागू होते ही मुख्य स्थानों पर सेना की तैनाती की गई है
बांग्लादेश में लगभग दो महीने से जारी राजनीतिक उठापटक के बाद आपातकाल लागू हो गया है.

सुनने में ये भले ही विचित्र लगे लेकिन सच यही है कि आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कहीं न कहीं राजनीतिक संकट को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है.

संकट तब शुरू हुआ जब स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए कार्यवाहक सरकार का गठन हुआ लेकिन अब राष्ट्रपति इयाजुद्दीन अहमद ने इस अंतरिम सरकार को ही भंग कर दिया है और इसके मुखिया पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.

कार्यवाहक सरकार के पतन से ऐसी उम्मीद जगी है कि अब स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जा सकते हैं.

आवामी लीग की अगुआई में गठित कई दलों के गठबंधन ने 22 जनवरी को प्रस्तावित चुनाव का बहिष्कार करने की धमकी दी थी.

इस गठबंधन की माँग थी कि इयाजुद्दीन अहमद राष्ट्रपति और कामचलाऊ सरकार के मुखिया की दोहरी भूमिका छोड़ दें, चुनाव आयोग का पुनर्गठन करें, मतदाता सूची का नवीकरण कराएँ और नए सिरे से चुनाव कार्यक्रम तैयार करें.

इन माँगों के समर्थन में चलाए जा रहे आंदोलन के आगे आख़िरकार राष्ट्रपति अहमद को झुकना पड़ा.

राह में रोड़े अभी भी हैं

कार्यवाहक सरकार के मुखिया पद से उनके इस्तीफ़े से बांग्लादेश में शांतिपूर्ण, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होने की संभावना बनी है.

हालाँकि ये चीजों को आशावादी तरीक़े से देखने जैसा है क्योंकि कई ऐसे कारण हैं जो निराश भी करते हैं. आगे रास्ते में कई और बाधाएँ हैं.

राष्ट्रपति ने ऐलान किया है कि सलाहकारों की नई टीम बनाई जाएगी. नई अंतरिम सरकार सभी दलों से चुनाव के बाबत सलाह मशविरा करेगी.

लेकिन मौजूदा संकट विश्वास का है. आवामी लीग और उनके सहयोगियों को तनिक भी विश्वास नहीं था कि कार्यवाहक सरकार निष्पक्ष चुनाव करवाएगी.

आवामी लीग ने राष्ट्रपति से दोहरी भूमिका छोड़ने की माँग की थी

आवामी लीग को लगा कि राष्ट्रपति बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के पक्ष में चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं. बीएनपी ने ही वर्ष 2002 में इयाजुद्दीन अहमद को राष्ट्रपति पद के लिए नामित किया था.

अब सवाल ये है कि नई अंतरिम सरकार का स्वरूप क्या होगा और इसके कामकाज पर राष्ट्रपति की कितनी पकड़ होगी?

अगर बीएनपी सरकार के समर्थक रहे मुख्य अधिकारियों को चुनाव कार्यों से अलग कर दिया जाए तो नई सरकार में आवामी लीग का विश्वास बढ़ सकता है. लेकिन नई सरकार के गठन में देरी से लोग सड़कों पर फिर उतर सकते हैं.

कुछ महत्वपूर्ण फ़ैसले

आपातकाल के दौरान लागू होने वाले कुछ फ़ैसलों का विरोध हो सकता है. निजी चैनलों को समाचार और समसामयिक कार्यक्रमों का प्रसारण बंद करने का आदेश दिया गया है. उन्हें सिर्फ़ सरकारी टेलीविज़न पर प्रसारित होने वाली ख़बरें दिखाने को कहा गया है.

अख़बारों से कहा गया है कि वे सरकार की आलोचना में कोई संपादकीय न छापें. इन आदेशों से अस्सी के दशक की वो यादें ताज़ा हो गई हैं जब शासन की बागडोर सैनिक तानाशाहों के हाथों में चली गई थी.

इस बार भी राष्ट्रपति ने रैली निकालने और प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा दिया है. ढाका समेत मुख्य शहरों में रात का कर्फ़्यू लगा दिया गया है.

संवैधानिक व्यवस्था से खिलवाड़

वर्ष 1996 में बांग्लादेश के सभी राजनीतिक दलों ने मिल कर ऐसी व्यवस्था बनाई कि पाँच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद शासन कार्यवाहक सरकार को सौंप दी जाएगी जिसमें राजनीतिक दखलंदाज़ी नहीं होगी.

राजनीतिक दलों ने तब ये स्वीकार किया था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के मामले में नेताओं पर विश्वास नहीं किया जा सकता.

इसके बेहतर परिणाम 1996 और 2001 के चुनावों में दिखाई दिए. दोनों बार 75 फ़ीसदी से ज़्यादा मतदाताओं ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग किया.

लेकिन पिछले साल अक्तूबर में बीएनपी सरकार ने इस व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश की. न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की अवधि बढ़ा दी गई. सरकार पर आरोप लगा कि इस फ़ैसले से वो कभी बीएनपी के नेता रह चुके मुख्य न्यायाधीश केएम हसन को कामचलाऊ सरकार का मुखिया बनाना चाहती है.

रही सही कसर राष्ट्रपति ने ख़ुद को कार्यवाहक सरकार का मुखिया घोषित कर पूरी कर दी. अब जब नई अंतरिम सरकार का गठन होगा तो ये देखने वाली बात होगी कि इसे जनता का कितना समर्थन मिलेगा.

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