BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 04 अगस्त, 2006 को 12:20 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
श्रीलंका में तनाव बढ़ने के मूल कारण

तमिल विद्रोही
हिंसा के बावजूद दोनों पक्ष इसे युद्धविराम का उल्लंघन नहीं मानते
श्रीलंका की सेना और तमिल छापामार संगठन एलटीटीई के बीच नवीनतम तनाव त्रिंकोमाली स्थित एक बांध के पानी को रोकने पर हुआ.

अब लड़ाई पड़ोस के मुट्टूर तक पहुँच गई है. यानि, फ़रवरी 2002 में किए गए युद्धविराम समझौते का उल्लंघन हो रहा है. ये अलग बात है कि दोनों पक्ष इसे युद्धविराम समझौते का उल्लंघन नहीं मानते.

श्रीलंका सरकार के शांति सचिवालय के प्रमुख पलिथा कोहनाका कहते हैं, "मैं नहीं मानता कि इसे युद्ध का फिर शुरू होना कहा जा सकता है. तमिल छापामार भी कह रहे हैं कि युद्धविराम समझौता लागू है. सरकार भी युद्धविराम के प्रति वचनबद्ध है और अगर तमिल छापामारों ने ये कार्रवाही नहीं की होती तो सेना की जवाबी कार्रवाई नहीं होती."

किलीनोची में तमिल छापामारों के सैन्य विभाग के प्रवक्ता इलानथिरैयन का कहना था कि एलटीटीई की कार्रवाई नागरिकों की रक्षा के लिए की गई. उनका कहना था, "मामला बांध का पानी छोड़ने से जुड़ा है. जब श्रीलंका मोनेटरिंग मिशन के पर्यवेक्षक इस बारे में बात कर रहे थे तब कोलंबो से सेना ने हवाई हमला किया जिसने स्थिति को बिगाड़ दिया."

 मैं नहीं मानता कि इसे युद्ध का फिर शुरू होना कहा जा सकता है. तमिल छापामार भी कह रहे हैं कि युद्धविराम समझौता लागू है. सरकार भी युद्धविराम के प्रति वचनबद्ध है और अगर तमिल छापामारों ने ये कार्रवाही नहीं की होती तो सेना की जवाबी कार्रवाई नहीं होती
श्रीलंका की सरकार के प्रवक्ता

'कोई रोडमैप नहीं'

फिर आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है और हमलों का भी. दो दशक से ज़्यादा समय बहुसंख्यक सिन्हला आबादी और तमिल भाषी लोगों के बीच मतभेद रहे हैं.

शुरुआत 1950 के दशक में सिन्हला को राष्ट्रीय भाषा बनाने से हुई. पर आज तमिल पृथक तमिल राष्ट्र या ईलम की माँग से पीछे नहीं हटना चाहते, तो सरकार तमिल भाषी लोगों को अधिक स्वायत्ता देना नहीं चाहती.

कोलंबो विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर जयदेव उयनगोड़ामें कहते हैं, "पिछली सरकार ने तमिल छापामारों से 2002 में बातचीत शुरू की थी. उसके पास भी कोई रोडमैप नहीं था. एलटीटीई का मानना था कि वो उत्तर और पूर्वी प्रांतों में एक अंतरिम प्रशासन स्थापित कर पाएंगे, जिसमें उनको काफ़ी हद तक क्षेत्रीय स्वायत्तता मिलेगी."

 पिछली सरकार ने तमिल छापामारों से 2002 में बातचीत शुरू की थी. उसके पास भी कोई रोडमैप नहीं था. एलटीटीई का मानना था कि वो उत्तर और पूर्वी प्रांतों में एक अंतरिम प्रशासन स्थापित कर पाएंगे, जिसमें उनको काफ़ी हद तक क्षेत्रीय स्वायत्तता मिलेगी
राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर जयदेव

प्रोफेसर जयदेव कहते हैं, "तब की यूनाइटेड नेशनल फ्रंट सरकार जो कि एलटीटीई से बात कर रही थी वो ऐसा नहीं चाहती थी. राजपक्षे की नई सरकार के सामने अब चुनौती है एक नई शांति प्रक्रिया स्थापित करना जिसके लिए नई राजनीतिक पहल चाहिए. पर इसके बारे में शायद इस सरकार ने सोचा नहीं है."

अगर आप तमिल छापामारों की सुनें तो युद्धविराम समझौते और आज तक किए गए वादों को सरकारों ने पूरा नहीं किया. चाहे थिंपू में 1985 में हुई बैठक के वादे हों - 'श्रीलंका सरकार ने उस वक्त माना था कि देश में रहने वाले सभी तमिलों को नागरिक अधिकार दिए जाएंगे. तमिल पृथक लोग है. इन्हें पृथक राष्ट्र मिलना चाहिए और उन्हें अपने बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया था.

प्रभाकरन
'2003 में ओसलो में विक्रेंद्रीकरण पर बात हुई पर 2005 चुनाव के बाद कुछ नहीं हुआ'
पर 1987 में भारत श्रीलंका समझौते पर हस्ताक्षर से पूर्व और उत्तर को तमिल राज्य के रूप में स्वीकृति मिली थी. 2003 में ओसलो में विक्रेंद्रीकरण पर बात हुई थी पर अब 2005 के चुनावों के बाद सब खत्म हो गया है.'

'सरकार पर विश्वास नहीं'

तमिल समाचार पत्र उथयन के संपादक एन विथ्याथरन तमिल छापामारों के विचारों से सहमति रखते हैं. उनका कहना है,"हमें सरकार पर कोई विश्वास नहीं. राष्ट्रपति दिखावा तो कर रहे हैं कि वो इस समस्या का हल चाहते हैं पर ज़मीन पर ऐसा कुछ नहीं कर रहे जिससे लगे कि वे असल में गंभीर हैं."

 हमें सरकार पर कोई विश्वास नहीं. राष्ट्रपति दिखावा तो कर रहे हैं कि वो इस समस्या का हल चाहते हैं पर ज़मीन पर ऐसा कुछ नहीं कर रहे जिससे लगे कि वे असल में गंभीर हैं
एलटीटीई समर्थक अख़बार के संपादक

वहीं सरकारी अख़बार डेली न्यूज़ के संपादक बंडुला जयसेकरा सवाल पूछते हैं कि आख़िर शांति की राह से कौन दूर हुआ. वे मानते हैं, "सरकार को तमिल छापामारों से बातचीत करनी चाहिए और सरकार ने ऐसी पेशकश भी की है. लेकिन एलटीटीई नेता प्रभाकरन ने हिंसा जारी रखी है और वही बातचीत की मेज पर नहीं आ रहे."

बंडुला जयसेकरा कहते हैं, "सरकार पूर्वोत्तर श्रीलंका के विकास के लिए करोड़ों खर्च कर रही है. पर विनाश कौन कर रहा है? प्रभाकरण और उसके लोग ऐसा होने नहीं दे रहे हैं. वे काँन्ट्रेकटर की हत्या कर देते हैं. सरकार तो अब लोगों को तमिल सीखने के लिए भी प्रोत्साहित कर रही है. यानी सरकार जहाँ भरोसा बनाने की कोशिश कर रही है वहीं प्रभाकरण उसे नष्ट करने में जुटे हुए हैं."

श्रीलंका में सरकार, बुद्धिजीवी या आम आदमी सभी का मानना है कि उनके देश की जातीय समस्या के हल में भारत की अहम भूमिका हो सकती है, और होनी चाहिए. राष्ट्रपित महिंद्रा राजपक्षे मानते हैं कि भारत प्रभाकरण पर बातचीत के लिए आने का दबाव डाल सकता है.

वहीं पत्रकार लेखक कार्ल मुलर कहते हैं कि राजीव गांधी हत्या के आरोप में भारत सरकार को प्रभाकरण को गिरफ़्तार करना चाहिए.

 सरकार पूर्वोत्तर श्रीलंका के विकास के लिए करोड़ों खर्च कर रही है. पर विनाश कौन कर रहा है? प्रभाकरण और उसके लोग ऐसा होने नहीं दे रहे हैं. वे काँन्ट्रेकटर की हत्या कर देते हैं. सरकार तो अब लोगों को तमिल सीखने के लिए भी प्रोत्साहित कर रही है. यानी सरकार जहाँ भरोसा बनाने की कोशिश कर रही है वहीं प्रभाकरण उसे नष्ट करने में जुटे हुए हैं
एक सरकारी अख़बार के संपादक

वे और उन जैसे कई लोगों का मानना है कि प्रभाकरण के ख़ात्मे के साथ ही देश में शांति लौटेगी. अब एलटीटीई और तमिल इच्छाएँ एक नहीं रहीं.

एन विथ्याथरन भारत की भूमिका को स्वीकार करते हैं पर प्रभाकरण के ख़ात्मे को समस्या के अंत के रूप में देखने को बचकाना मानते हैं. वे कहते हैं, "सवाल ये है कि क्या वे ऐसा कर सकते हैं. आप देखिए श्रीमावू बंडारानाइके के ज़माने से उनकी मुहीम शुरू हुई फिर जे जयवर्धने, प्रेमदास और चंद्रिका आए और गए और अब राजपक्षे आए हैं, पर प्रभाकरण अब भी हैं."

इस बीच तमिल छापामारों पर यूरोपीय संघ ने प्रतिबंध लगाया. अमरीका का एलटीटीई को आतंकवादी संगठनों की सूची में रखना, प्रभाकरण के सहयोगी करूणा का संगठन से अलग होना और फिर करुणा को सरकार का तथाकथित समर्थन मिलना, सभी का असर शायद प्रभाकरण पर हुआ. पर आज श्रीलंका में संघर्ष से जहाँ जनता उब चुकी है वहीं दोनों पक्ष एक कदम आगे बढ़ने को तैयार नहीं.

टीकाकार मानते हैं एक पृथक राष्ट्र की परिकल्पना शायद अब एक परिकल्पना ही रहेगी. पर तमिल इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए न केवल उन्हें समान अधिकार पर, कुछ हद तक क्षेत्रीय स्वायत्तता देना भी सरकार को स्वीकार करना पड़ सकता है. यानी श्रीलंका के एक हिस्से के रूप में तमिल बहुल इलाकों को ज़्यादा अधिकार देना इस समस्या का समाधान हो सकता है.

लेकिन क्या दोनों पक्ष अपने हितों की बजाय राष्ट्र हित की सोच कर थोड़ा-थोड़ा झुकने के लिए तैयार होंगे? सारी दुनिया की नज़र इसी पर है.

श्रीलंका समय चक्र - 1श्रीलंका समय चक्र-1
1999 तक श्रीलंका के इतिहास की प्रमुख घटनाओं पर एक नज़र...
श्रीलंका समय चक्र - 2श्रीलंका समय चक्र-2
श्रीलंका की वर्ष 2000 से आगे की प्रमुख घटनाओं पर एक नज़र...
श्रीलंकाहमेशा ही चौकसी है
श्रीलंका में सुरक्षा बलों की मौजूदगी आम हो गई है.
श्रीलंका संकट में महिलाएँतमिल महिलाएँ
श्रीलंका संकट में महिलाएँ भी प्रभावित हुई हैं.
श्रीलंका में विस्फोटश्रीलंका में विस्फोट
श्रीलंका में विस्फोट की तस्वीरें.
कोलंबो शहरकैसीनो वाला कोलंबो
दो दशकों से संघर्ष झेलते श्रीलंका का दूसरा चेहरा भी है जो भोग-विलास का है.
कुमारतुंगा और विक्रमसिंघेश्रीलंका की डायरी
संजीव श्रीवास्तव बता रहे हैं कि श्रीलंका में नहीं पनपी है घूस की परंपरा.
इससे जुड़ी ख़बरें
भीषण लड़ाई के कारण लोगों का पलायन
04 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस
सेना पर तमिल विद्रोहियों के हमले
02 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>