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बुधवार, 11 अगस्त, 2004 को 17:30 GMT तक के समाचार
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श्रीलंका कितना भारत जैसा, कितना अलग

कोलंबो शहर
कोलंबो दिल्ली से थोड़ा अलग दिखता है
कोलंबो में आए क़रीब दो सप्ताह होने वाले हैं और जाने की तारीख़ पास आ रही है.

स्वाधीनता दिवस दिल्ली में ही मनाया जाएगा.

फ़र्क दिल्ली और कोलंबो में बहुत हैं. मसलन यहाँ भिखारी कम हैं और जापानी गाड़ियाँ काफी हैं.

सड़क के किनारे बसे इस द्वीप देश की राजधानी दिल्ली के मुक़ाबले साफ़ भी बहुत ज़्यादा नज़र आती है और मध्यमवर्गीय लोगों का रहन-सहन भारत के मुकाबले कुछ बेहतर नज़र आता है.

ट्रैफिक कांस्टेबल यहाँ दिल्ली के मुक़ाबले ईमानदार हैं और जब आप लालबत्ती का उल्लंघन कर आगे बढ़ते हैं या कोई और कानून तोड़ते हैं तो बाकायदा ज़ुर्माना देना पड़ता है.

ज़ुर्माने की दस प्रतिशत रकम घूस में कांस्टेबल के हाथ थमाकर आगे बढ़ने की प्रथा भारतीय शहरों की तरह अभी यहाँ नहीं पनपी है.

कुछ शौकीन लोगों के लिए यहाँ नाइट क्लब और कैसिनो भी हैं जो दिल्ली में नहीं हैं.

पर अगर इन सतही क़िस्म की चीजों पर हम ध्यान न दें तो फिर बुनियादी फ़र्क कोई ख़ास नहीं है.

शायद किसी भी दक्षिण एशिया के देश में नहीं है.

एकरुपता

सरकारी कर्मचारी यहाँ भी कामचोर हैं.

राजनेता यहाँ अपने स्वार्थ को देश के हित के आगे रखते हैं और गठबंधन की राजनीति ने श्रीलंका का भी कुछ वैसा ही बेड़ागर्क़ किया हुआ है जैसा कि भारत में.

चीनी, रूसी और स्थानीय कॉलगर्ल्स और वेश्याएँ यहाँ भी दिल्ली, मुम्बई की तरह शाम ग्राहकों की तलाश में पांच सितारा होटलों की लॉबी और बार में नज़र आ जाएँगी.

नौकरों के उत्पीड़न की कहानी भी वही है तो किसानों और मज़दूरों की उपेक्षा की और सरकारी समस्याओं, स्कूलों और यातयात साधनों कि गिरी-पड़ी हालत में भी कोई ज़्यादा अंतर नहीं है.

शहरों को यहाँ भी गाँवों के मुक़ाबले तरजीह मिलती है, वर्षा के महीने हैं तो यहाँ भी डेंगू बुखार का प्रकोप है और पीने के पानी के लिए यहाँ भी कई जगह गाँव वालों को मीलों पैदल जाना पड़ता है.

क्रिकेट दीवानगी में श्रीलंका के लोग भारत से आगे हैं और प्रचार-प्रसार माध्यमों और मॉडलिंग इत्यादि में यहाँ क्रिकेट सितारों की दादागिरी है.

वही एकमात्र राष्ट्रीय नायक हैं यहाँ क्योंकि भारत की तरह यहाँ क्रिकेट खिलाड़ियों को बालीबुड के सुपरस्टार का मुकाबला नहीं करना पड़ता.

महारानी कुमारतुंगा

अगर कुछ अपनी बिरादरी की बात करें तो पत्रकार तबके का गुज़ारा यहाँ तमिल विद्रोहियों, चंद्रिका कुमारतुंगा और शांति वार्ता के भरोसे ही पूरी तरह चलता है.

चंद्रिका कुमारतुंगा
चंद्रिका कुमारतुंगा की राजनीतिक दबदबे का कोई मुक़ाबला नहीं दिखता

कोई दिन नहीं गुज़रता जब शांति प्रस्तावों की पेचदगियों, लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन की अपने लोगों पर जर्बदस्त और खूंखार पकड़ और राष्ट्रपति कुमारतुंगा की कुछ इंदिरा गांधी जैसी राजनीतिक पकड़ और कुछ सोनिया गांधी जैसी राजसी अंदाज़ की खबरें न होतीं हों.

चंद्रिका और प्रभाकरन अपने-अपने अंदाज के एकछत्र नेता हैं और दोनों ही यह बात मौक़े-बेमौक़े साबित करने में कतराते भी नहीं.

अप्रैल माह में प्रभाकरन के दाएँ हाथ माने जाने वाले कमांडर ने बग़ावत का बिगुल बजाया तो सही लेकिन उसके समर्थकों की जिस निर्ममता से हत्याएँ की जा रही हैं उससे साफ़ है कि अपने क्षेत्र में प्रभाकरन की पकड़ और आतंक, दोनों की बरकरार है.

चंद्रिका कुमारतुंगा राष्ट्रपति कम, महारानी अधिक हैं.

उनके भाई और केन्द्रीय मंत्री अरुणा भी उनके मेहरबान नज़र के लिए तरसते ही रह जाते हैं.

छोटे-मोटे नेताओँ और जनता की तो बिसात ही क्या.

अरुणा चाहते थे पिछले सप्ताह उन्हें सत्ताधारी गठबंधन के अध्यक्ष की कुर्सी मिल जाएगी, चंद्रिका के इस्तीफ़े के बाद.

इतने बेताब थे कि एक प्रेस कांफ्रेंस में घोषणा भी कर दी कि वह पद संभालने के लिए तैयार हैं.

क्रिकेट खिलाड़ी
क्रिकेट खिलाड़ी श्रीलंका के सितारे हैं

पर राष्ट्रपति ने अपने भाई को नहीं एक पुराने वफ़ादार और मौजूदा रानजीति में कोई बहुत महत्व नहीं रखने वाले पूर्व प्रधानमंत्री रत्नागिरी विक्रमनायके को यह पद बख्शकर सबको हैरान कर दिया.

बस चंद्रिका की सिर्फ एक ही समस्या है.

जनता ने बहुमत से उनके दल को नहीं जिताया और इसिलए अब इन्हें गठबंधन की राजनीति में अपने हाथ गंदे करने पड़ते हैं और शांति प्रस्ताव पर कुछ कड़ा रूख रखने वाले जोड़ीदार दल जेवीपी के नेताओँ से जूझना पड़ता है, अपनी बात मनवाने के लिए.

लेकिन कमबख्त जेवीपी के नेता हैं कि उनकी सारी बातें कभी मानते ही नहीं.

चंद्रिका को कुछ चिंता अब भविष्य की भी सताने लगी है.

श्रीलंका के संविधान के अनुसार कोई दो बार से अधिक राष्ट्रपति बन नहीं सकता और चंद्रिका कुमारतुंग का राष्ट्रपति की तरह दूसरा कार्यकाल अगले वर्ष समाप्त होने जा रहा है.

अब वह चाहती हैं कि संविधान में संशोधन हो, पर उसके लिए आवश्यक बहुमत उनके पास संसद में है नहीं.

शांतिवार्ता

शांति वार्ता की कहानी के तार इतने उलझ गए हैं कि आसानी से सुलझते नहीं लगते.

प्रभाकरन
एलटीटीई के साथ शांति वार्ता खटाई में पड़ी हुई है

तमिल विद्रोहियों और सरकार के बीच वैसा विश्वास नहीं है जैसा कि रानिल विक्रमसिंघे की सरकार के साथ था.

सरकार तमिल विद्रोहियों की अंतरिम स्वायत्त शासन की मांग की ही बातचीत आगे बढ़ाने की एक मात्र शर्त को मानने के लिए एकदम तैयार नहीं दिखती.

युद्ध विराम अवश्य जारी है परंतु जिस युद्ध ने पिछले-करीब 20 सालों में 60 हज़ार लोगों की जान ली है और श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को लगभग चरमरा दिया था उसका हल स्थायी शांति से ही होगा, किसी युद्ध विराम से नहीं.

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