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ताज़गी का अहसास करा जाते हैं राहुल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले सप्ताह राहुल गाँधी से एक और मुलाकात का मौका मिला. हुआ यूँ कि गाँधी सल्तनत के वारिस ने चुनाव जीतने के करीब ढाई माह बाद उन पत्रकारों को धन्यवाद देने के लिए एक चाय पार्टी का आयोजन किया जो चुनाव के दौरान अमेठी में उनके प्रचार पर रिपोर्ट कर रहे थे. निमंत्रण में पेंच सिर्फ़ यह था कि यह चाय-समोसा-ढोकला पार्टी अमेठी में हो रही थी. चूँकि राहुल से दिल्ली में गपशप का मौका मिलता नहीं इसलिए पत्रकारों ने सोचा कि चलिए अगर मुलाकात अमेठी में ही हो रही है, तो वहीं सही. तो बारात सज गई अमेठी में एक बार फिर. सीधे प्रसारण के लिए टीवी स्टेशनों की ओबी वैन्स, सैटेलाइट फोन वगैरह और हम भी हवाई जहाज में बैठे और लखनऊ में एक रात होटल में गुजारने जितनी पेशगी दफ्तर से लेकर अपने पत्रकार जीवन का सबसे महँगा चाय का प्याला पीने पहुँच गए अमेठी. राहुल का मूड राहुल पूरे मूड में थे. पत्रकारों से अपनी स्पेनिश गर्लफ्रेंड की चर्चा कर रहे थे, इन दिनों कौन सी किताबें वह पढ़ रहे है, इस पर रोशनी डाल रहे थे और बीच-बीच में राजनीति की बातें भी करते थे. पत्रकारों को पूरी तरह चार्ज कर रखा था उन्होंने और जब कोई ज्यादा राजनीति की बात करने कि कोशिश करता तो उससे वह कह देते, "भई चाय-चू तो पी नहीं रहे हैं आप, बस सवाल पर सवाल दागे जा रहे हैं. आज तो अनौपचारिक बातें होनी है." मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के बारे में वह कुछ ज्यादा नहीं बोले. यह पूछे जाने पर भी नहीं जब उनसे कहा गया कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती हैं और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के शक्तिशाली होने के लिए सपा का कमज़ोर होना ज़रूरी है. वह बार-बार स्वयं को राजनीतिक रंगरूट बताने की कोशिश कर यही कहते रहे कि अभी तो सक्रिय राजनीति में उन्हें कुछ माह ही हुए हैं और उनकी भूमिका फिलहाल अमेठी के सांसद के पद तक ही सीमित है. कांग्रेस की विवशता राहुल कुछ भी कहें और कितना ही स्वयं को पदों, मंत्रिमंडल और कांग्रेसी चमचों की भीड़ से अलग-थलग रखने का प्रयास करें, लोग उन्हें राजनीति में शनै:-शनै: उतरने का समय नहीं देने वाले.
क्योंकि कांग्रेस की धुरी ही गाँधी परिवार के सदस्यों के इर्द-गिर्द घूमती है, इसलिए चाह-अनचाहे राहुल को पूरी तरह राजनीति की कीचड़ में उतरना ही पड़ेगा. वो यह तय नहीं कर सकते कि वह सिर्फ़ अपनी उँगली ही इस कीचड़ में डालेंगे और धीरे-धीरे ही खुद को सियासी दलदल में उतारेंगे. वजह एकदम साफ़ है. चुनावों में सबने बच्चों, यानी राहुल और प्रियंका का करिश्मा देख लिया है. गाँधी होने का यह फ़ायदा भी है कि उनके कहे को पार्टी में कोई चुनौती भी नहीं दे सकता. साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश फूँकने और कांग्रेस संगठन में वापस जान डालने की संजीवनी भी अगर किसी के पास है तो वह हैं गांधी बच्चे. तो अब बच्चों को यह कहकर अपने बिल में वापस घुसने की अनुमति पार्टी कॉडर नहीं दे सकता कि अभी तो ये नए हैं. देखना यह है कि ये अब अगले चुनावों में ही वापस प्रकट होंगे या इनकी कर्मभूमि अभी अमेठी-रायबरेली तक ही सीमित रहेगी. उम्मीदें पार्टी राहुल से उम्मीद करती है कि वह कम से कम उत्तर प्रदेश में तो खुलकर मुलायम सिंह एंड कंपनी का लोहा लें और फिर उन राज्यों में भी जाएँ जहाँ चुनाव होने वाले हैं, मसलन महाराष्ट्र. कौन है पार्टी नेता जो वहाँ बालासाहब और उनके कुनबे के सामने कांग्रेस का झंडा लेकर खड़ा होगा. राहुल यह सब समझते हैं. पर वह अपनी गति से ही अभी गोता लगाना चाहते हैं. कहते हैं अभी-अभी तैरना सीखा है, कहीं डूब न जाएँ. राहुल से मिल यह तो लगता ही है जैसे कोई ताज़ी हवा का झोंका आपको छू रहा है. शायद नए हैं राजनीति में इसलिए अब भी काफी आदर्शवादियों जैसी बातें करते हैं.
ईमानदार और गंभीर लगते हैं और देश के लिए कुछ कर गुज़रने के अपने जज्बे को पत्रकारों के साथ बाँटते हैं. ऐसा नहीं लगता कि कोई घाघ राजनेता आपकी आंखों में धूल झोंकने की कोशिश कर रहा है. पर क्या राहुल ऐसे ही रहेंगे. और उससे भी ज्यादा क्या वह अपने उन सपनों को साकार कर पाएँगे जो उन्होंने भारत के लिए सँजोए हैं. उत्तर आसान नहीं है, ठीक उसी तरह, जिस तरह राहुल के लिए वह सब कुछ कर गुज़रना जो वह चाहते हैं. क्योंकि भारतीय राजनीति कोई मुम्बइया फिल्म नहीं है जहाँ अंत में हीरो की जीत होती ही है. राजनीति में तो ज़्यादातर सेहरा खलनायक के सर ही बँधता है. चुनौतियाँ मसलन यह कि भारतीय राजनीतिक दाँव-पेंच समझने और उन्हें अपने बस में करने के लिए नायक में खलनायक के भी सभी गुण होने चाहिए. इस्तेमाल करने के लिए नहीं तो अपने विरोधियों की चाल समझने और उन्हें मात देने के लिए. यहाँ राहुल शायद कुछ फँस जाते हैं. उनके तरकश में वैसे बाण नजर नहीं आते जो आज की राजनीतिक महाभारत के लिए ज़रूरी हैं. वह कुछ हद तक उसी 'बाबा लोग संस्कृति' के बीच फँसे हुए लगते हैं जिसने कभी उनके पिता राजीव गांधी को जीती हुई बाजी हरवा दी थी. राजीव को अपने ही घर में धृतराष्ट्र बना दिया था ताकि उन्हें विभीषण दिखाई न दें. सिर्फ करिश्माई व्यक्तित्व, जनता के प्यार और आदर्शवादी होने से ही आज की भारतीय राजनीति में कोई सफल नही हो सकता. सिर्फ अभिमन्यु होना तो महाभारत काल में भी काफी नहीं था. आज के युग में अभिमन्यु में कृष्ण और अर्जुन के साथ-साथ कुछ कंस और दुर्योधन का समावेश भी होना चाहिए. नहीं तो आप दु:शासन और जयद्रथ के चक्रव्यूह में फँस जाएँगे. |
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