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मंगलवार, 13 जुलाई, 2004 को 01:22 GMT तक के समाचार
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किस-किस को मनाएँ वित्त मंत्री चिदंबरम

चिदंबरम
बजट के बाद भी चिदंबरम को आराम नहीं
भारतीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम की व्यस्तता है कि ख़त्म ही नहीं हो रही है.

सोचा था कि बजट पेश कर कुछ आराम का मौक़ा मिलेगा लेकिन चिदंबरम साहब पर तो जैसे बजट के बाद मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा है.

उनकी कोशिश नई सरकार के पहले बजट से सबको ख़ुश करने की थी लेकिन हुआ है यह कि बजट से सभी नाराज़ हैं- मित्र दल भी और विपक्षी पार्टियाँ भी.

बजट के तुरंत बाद दिए गए क़रीब एक दर्जन एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में चिदंबरम साहब किसी तोते की तरह हर चैनल पर यह बोलते देखे गए कि उनका बजट ग़रीब के लिए भी अच्छा है और अमीरों के लिए भी, किसानों के लिए भी और उद्योगपतियों के लिए भी, मज़दूरों के लिए भी और पूँजीपतियों के लिए भी.

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि उनकी बात मानने के लिए कोई भी तैयार नहीं है. सबको साथ रखने की कोशिश की थी वित्त मंत्री ने पर अकेले पड़ गए.

उद्योगपतियों को मनाने के सिलसिले में चिदंबरम ने फ़िक्की से जुड़े पूँजीपतियों से भेंट की. एक मुलाक़ात सीआईआई के झंडे तले भी हुई.

सबको कह रहे हैं कि इस सरकार की कर नीति स्थायी और उदार है जिससे धीरे-धीरे करों की दर में गिरावट लाई जाएगी और इंस्पेक्टर राज का आने वाले दिनों में अंत होगा.

आलोचना

1998 में चिदंबरम के बजट को ड्रीम बजट कहने वाले इस बार के बजट को किसी भयावह स्वप्न से कम नहीं मान रहे हैं.

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ख़ास निशाने पर तो नहीं शेयर दलाल?

चिदंबरम ने शेयर दलालों पर टर्न ओवर टैक्स बढ़ाने, ग्रामीण क्षेत्रों ख़ासकर खाद्य सामग्री पर सब्सिडी जारी रखने और बीजेपी सरकार की सरकारी कंपनियों को बेचने के निर्णय को पूरी तरह उलटा कर देने पर तथाकथित उदारवादी आर्थिक नीतियों का समर्थन करने वाले बहुत नाराज़ हैं.

उनका मानना है कि मनमोहन-चिदंबरम की नीतियों पर चलते हुए भारत के लिए सात से आठ फ़ीसदी विकास दर बनाए रखना बहुत मुश्किल होगा.

चलिए इस तबके और पूँजीपति वर्ग की नाराज़गी तो समझ में आती है. यही वह वर्ग है जो काफ़ी हद तक बीजेपी सरकार की आर्थिक नीतियों का समर्थक था और उस इंडिया शाइनिंग का भी पक्षधर था जिसकी दुहाई देते-देते बीजेपी और उनके सहयोगी चुनावी बेदी पर बली चढ़ गए.

पर चिदंबरम-मनमोहन-मॉन्टेक टीम के लिए असली सिरदर्द यह उच्च मध्यवर्गीय और पूँजीपति तबका नहीं है.

कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि काँग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार शेयर बाज़ार और उनसे जुड़े लोगों को कुछ मज़ा भी चखाना या यों कहिए कि सबक सिखाना चाहती है.

ख़ासकर उस ब्लैक मंडे के लिए जब काँग्रेस और मित्र दलों की विजय की ख़बर के बाद शेयर बाज़ार लगभग 20 प्रतिशत गिर गया था और वित्तीय हलकों में ख़ासा हड़कंप मच गया था.

हालाँकि व्यक्तिगत तौर पर मैं इस थ्योरी को नहीं मानता.

वामपंथी रुख़

सरकार की आर्थिक नीतियों और बजट प्रस्तावों की सबसे ज़्यादा आलोचना कर रहे हैं सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दल.

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वामपंथी दल सरकार की नीतियों में अपना दख़ल चाहते हैं

इस सरकार को स्थायित्व तो शायद वामपंथी दलों से ही सबसे ज़्यादा मिलेगा क्योंकि काँग्रेस से भी ज़्यादा बीजेपी और एनडीए की संभावित वापसी से अगर कोई चिंतित है तो वे हैं वामपंथी दल.

वामपंथी दल राजनीतिक स्थायित्व तो ज़रूर चाहेंगे लेकिन नीतियों के स्तर पर उहा-पोह की स्थिति हमेशा ही बनी रहेगी.

वे सत्ता में आएँगे भी नहीं, ज़िम्मेदारी भी नहीं लेंगे पर नीति निर्धारण में अपना दख़ल जारी रखेंगे.

फिर मामला चाहे विदेश नीति का हो या फिर आर्थिक मामलों का वामपंथी दल अपनी धुन अलापेंगे और पूरा प्रयास करेंगे कि उन्हीं धुनों पर सरकार नाचे.

विडम्बना देखिए विरोध किया जा रहा है दूरसंचार और बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ाए जाने का.

कहा जा रहा है कि दूरसंचार तो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और उदाहरण दिया जा रहा है अमरीका का जिसे वामपंथी दल अपना दुश्मन मानते हैं.

दूरसंचार क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ाए जाने से देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक को सबसे ज़्यादा लाभ होगा. जो मोबाइल टेलिफ़ोन के क्षेत्र में सबसे बाद में आया है लेकिन अब इस बाज़ार में अपना एकाधिपत्य जमाने को तैयार है.

तो दुर्दशा तो श्रमिक संगठनों की है पर उदाहरण अमरीका का दिया जा रहा है.

मज़ेदार बात यह है कि बजट की कई विसंगतियों की आलोचना न वामपंथी कर रहे हैं और न दक्षिणपंथी.

कई हज़ार करोड़ का घाटा कर चुकी वित्तीय संस्था आईडीबीआई में सरकार नौ हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च और करने जा रही है.

फिर एक नए इंडियन बैंक जैसे घोटाले की तैयारी है. शायद लोन तो दिए जाएँगे और जवाबदेही किसी की होगी नहीं.

आईटीआई को 200 करोड़ दिए जाएँगे. उन्हें आधुनिक और प्रासंगिक बनाने के लिए.

लेकिन ये मुद्दे किसी राजनीतिक विचारधारा और फ़ोरम में फिट नहीं बैठते तो इन पर ध्यान देने से क्या लाभ.

बात वहीं करें जो राजनीतिक बिसात पर सही चाल की तरह देखी जाए. देश की लाभ-हानि से उन्हें क्या मतलब. यही हमारे राजनेताओं की सोच है और देश की त्रासदी.

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