BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
सोमवार, 19 जुलाई, 2004 को 16:22 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
पंजाब का पानी विवाद लोकतंत्र के लिए ख़तरे की घंटी

खेती
राज्यों के बीच पानी के कई विवाद हैं
भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, इसमें कभी किसी को शक था ही नहीं. कुछ निठल्ले अवश्य थे, जो इस संदर्भ में सशंकित थे.

उनकी भी शंकाएँ पिछले सप्ताह तब पूरी तरह शांत हो गई होंगी, जब पूरे देश, संविधान और एक प्रकार से राष्ट्रहित को ठेंगा दिखाते हुए पंजाब की विधानसभा ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया कि वह किसी भी क़ानूनी और संवैधानिक मर्यादा से बँधे हुए नहीं हैं और सतलज-यमुना लिंक नहर के मामले में हुए समझौतों को नहीं मानते हुए अन्य राज्यों, ख़ासकर हरियाणा को अतिरिक्त पानी नहीं देंगे.

आनन-फानन में बुलाए गए विधानसभा सत्र में प्रस्ताव पारित हुआ और दिल्ली में केंद्र सरकार समेत कई उन दिग्गजों को भी, जिनका दावा होता है कि देश में पत्ता भी हिलता है तो उनको ख़बर रहती है, इस घटनाचक्र की जानकारी अख़बार, रेडियो और टीवी के ज़रिए ही मिली. कम से कम सबने कहा तो यही.

यह एक और तमाचा था उन सभी के लिए, जिनका हमेशा यह तर्क रहता है कि देश में दिल्ली की ही तूती बोलती है, संविधान का संघीय ढाँचा महत एक ढोंग है और दरअसल होता वही है जो केंद्र चाहता है. हमारा राज्य है, हमारी नदियाँ हैं, हमारा पानी है. हम जो चाहे करेंगे. इससे ज़्यादा आज़ादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और क्या हो सकती है.

हरियाणा भला क्यों पीछे रहता. चौटाला जी कोई महात्मा गाँधी के शिष्य तो हैं नहीं कि अगर कोई उनके एक गाल पर तमाचा मारे तो वे दूसरा गाल भी आगे कर देंगे. वैसे भी महात्मा गाँधी तो ग़ुलामी के दिनों के प्रतीक थे और उस समय के राष्ट्रपिता थे. अब तो देश आज़ाद है और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है.

आव देखा न ताव, चौटाला जी ने बयान जारी किया कि अगर उनका हक़ किसी ने मारा तो वह उसका बदला, दिल्ली का पानी बंद करके लेंगे.

नायक

ईंट का जवाब पत्थर, कप्तान अमरिंदर सिंह के मुक़ाबले चौटाला. टक्कर काँटे की है. इक्कीसवीं सदी के भारतीय नायक जो आमने-सामने हैं.

कैप्टन अमरिन्दर सिंह
कैप्टन ने पानी देने से इनकार किया

दिल्ली में गठबँधन सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, (उनकी जगह अगर वाजपेयी होते तो भी स्थितियाँ कुछ ऐसी ही होतीं. इसलिए कृपया इस मामले और इस लेख, दोनों को ही कांग्रेस बनाम भाजपा की नज़र से न देखें. यह तो सिर्फ़ आधुनिक भारत के राष्ट्रभक्त नेताओं और मौजूदा राजनीति को आइना दिखाने का प्रयास है) की हालत कुछ ऐसी ही है, जैसी कि मुग़लकाल के आख़िरी बादशाहों की थी, जिनकी सल्तनत दिल्ली के आसपास तक ही सिमट कर रह गई थी.

पिछले सप्ताह जो भी मनमोहन सिंह से मिला, वो यही सुन उनके साथ संवेदना व्यक्त करता नज़र आया कि भई कमाल हो गया, अमरिंदर जी ने प्रधानमंत्री तक को जानकारी दिए बिना विधानसभा सत्र बुला लिया और ऐसा प्रस्ताव पारित कर दिया.

कितने भोले हैं हम सब, जिस दल में छोटे से छोटा क़दम आलाकमान की हरी झँडी के बिना नहीं उठाया जाता, वहाँ ये कैसे हो सकता है कि हमेशा भट्ठल की बग़ावत से घबराए रहने वाले अमरिंदर सिंह बिना आलाकमान को विश्वास में लिए हुए इतना बड़ा कदम उठा लें. हाँ, मनमोहन सिंह तो झूठ नहीं बोल सकते, उनसे नहीं पूछा गया होगा, वो आलाकमान हैं भी नहीं.

बात यह भी महत्वपूर्ण नहीं है कि किससे पूछा गया और किसे अंधेरे में रखा गया. महत्वपूर्ण तो यह है कि भारत के नेता अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने के लिए किस हद तक जा सकते हैं. इस पूरे घटनाक्रम का निचोड़ यही है कि अगर अब भी किसी को यह ग़लतफहमी है कि भारतीय नेता राष्ट्रहित के बारे में सोचते हैं तो फिर उस जैसे आशावान व्यक्ति ही इस देश के लोकतंत्र को बचाए हुए हैं.

मतलब

पंजाब विधानसभा में पारित प्रस्ताव ने एक प्रकार से उस राजीव-लोंगोवाल समझौते को ही नकार दिया है, जिसने पंजाब में क़रीब सात-आठ वर्ष के भीषण उग्रवाद के बाद शांति की नींव रखी थी. समझौते पर केंद्र सरकार की मोहर थी. अर्थ क्या निकालें - केंद्र सरकार के किए हुए समझौतों का कोई मूल्य नहीं है! तो फिर शिमला समझौते या लाहौर घोषणा-पत्र का क्या अर्थ है. अगर यही झमेला कावेरी और अन्य नदियों के जल-बँटवारे को लेकर खड़ा हो गया तो क्या होगा?

ओमप्रकाश चौटाला
दिल्ली का पानी रोकने की धमकी

और फिर बात पानी तक ही सीमित क्यों रहेगी. जिस राज्य में बिजली का उत्पादन होता है, वो भी पड़ोसी राज्यों को बिजली देने से मना कर सकता है. तेल और गैस के भंडार, धातुओं की खानें इत्यादि भी जिस प्रदेश में हों, वही उनका पूरा मालिक हो जाएगा और किसी अन्य के साथ उसे बाँटने को तैयार नहीं होगा.

आज ही उमर अब्दुल्ला संसद में एक पत्रकार से कह रहे थे कि क्या होगा अगर कश्मीर भी यह कह दे कि वह सिंधु जल संधि को मानने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि इस समझौते में तो राज्य शामिल भी नहीं था. वह क़रार तो भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था. सोचिए क्या होगा?

भारत में अब भी बहुत विशेषज्ञ जल विवाद में आए इस ताज़ा मोड़ से बहुत चिंतित नहीं हैं और यह कहते सुने जा सकते हैं कि यह और कुछ नहीं, राजनीति है. सर्वोच्च न्यायालय सब ठीक कर देगा.

यह सोच, शेर की सवारी से कम नहीं है. मामला चाहे अयोध्या का हो या जल-विवाद का, कार्यपालिका अपनी ज़िम्मेदारी न्यायपालिका पर डाल कर बच नहीं सकती है.

आवश्यकता है बड़े क़द के राष्ट्रीय नेताओं की. दुर्भाग्य है कि वे या तो हैं नहीं और या फिर अपनी ही राजनीति में फँसे हुए हैं. जल-विवाद पर पँजाब विधानसभा का प्रस्ताव और उसके बाद घूमे घटनाचक्र को अगर एक ख़तरे की घँटी की तरह नहीं लिया गया तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आने वाले वक़्त में सबसे ज़्यादा अराजकता देखे जाने का ख़तरा उत्पन्न हो सकता है.

इससे जुड़ी ख़बरें
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>