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हताश भाजपा और नेतृत्व की चुनौती | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कई हफ्तों की तेज़ गर्मी के बाद दिल्ली में सोमवार को मौसम ख़ुशनुमा हुआ. नमी लिए हुए हवा में ठंडक है और बरखा जैसे राजधानी पर दस्तक दे रही है. आ जाए तो राहत मिले. मौसम बदल रहा है लेकिन सिर्फ़ आम आदमी के लिए. संसद के मानसून सत्र (इस बार इसे बजट सत्र कहा जाएगा) के पहले दिन सदन के भीतर का पारा ज्यों का त्यों है. माहौल बहुत गर्म है, नोक-झोंक तीखी है और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थमने के बजाय और उग्र होता नज़र आ रहा है. राज्यपालों की बर्खास्तगी और दागी मंत्रियों के मसले पर विपक्ष सत्तारूढ़ गठबंधन को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश में है. शोर बहुत है, योजनाएँ भी सरकार को घेरने की कई हैं पर विपक्ष, ख़ासकर भाजपा नेताओं की 'बॉडी लैंग्वेज' अभी भी एक ऐसे पराजित योद्धा की है जिसके गले यह सच्चाई नहीं उतर रही है कि वह चुनावी समर में कुछ सप्ताह पूर्व ही एक अप्रत्याशित पराजय का सामना कर चुका है. भाजपा की भी कई समस्याएँ हैं. आगे की क्या रणनीति हो, पार्टी कार्यकर्ताओं में कैसे उत्साह फूँका जाए, हिंदुत्व पर लौटें या एनडीए के अन्य दलों को साथ रखते हुए अपना जनाधार और व्यापक करने का प्रयास करें, शीर्ष नेता वाजपेयी को माने या आडवाणी को, वैंकेया नायडू जैसे अध्यक्ष को कब तक ढोएँ, आरएसएस को कितने हस्तक्षेप की अनुमति दें या फिर संघ परिवार को ही पूरी पार्टी मशीनरी को हाईजैक करने दें, सवाल अनेक हैं और त्रासदी यह है कि हारी हुई पार्टी के पास उत्तर नहीं है.
इन दोनों नेताओं के अलावा पार्टी के पास कोई राष्ट्रीय पहचान वाला नेता है ही नहीं. सच्चाई यह है कि हमेशा काँग्रेस की गाँधी परिवार के प्रति आसक्ति की आलोचना करने वाली भाजपा ने भी दूसरी पँक्ति का नेतृत्व तैयार करने की कोई ख़ास कोशिश नहीं की. वैंकेया नायडू पार्टी अध्यक्ष क्यों हैं, इसका विश्लेषण शायद वे स्वयं भी नहीं कर सकते. प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसे नेताओं की स्थिति यह है कि वह पूरे देश में एक भी लोकसभा सीट नहीं बता सकते जहाँ से उनकी जीत निश्चित हो. नरेंद्र मोदी के साथ इन तीनों नेताओं को भाजपा के भविष्य की तरह देखा जा रहा है, तीनों ही ख़ुद को भविष्य के प्रधानमंत्री की तरह देखते हैं, एक-दूसरे का क़द भी हर संभावित जगह पर कम करने से नहीं चूकते, वाक-चतुर भी यह तीनों हैं और चुनावी बिसात भी अच्छी तरह बिछाते हैं. पर जन-नेता की श्रेणी में ये नहीं हैं और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के पास वाजपेयी-आडवाणी टीम का अब भी कोई विकल्प नहीं है.
विपक्षी दल की राजनीति कुछ भी हो, उनकी विचारधारा से आप सहमत हों या न हों, पर इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भारत जैसे लोकतंत्र में विपक्ष का इस तरह का बिखराव अच्छा संकेत नहीं है. सिर्फ छह वर्ष सत्ता में रहने के बाद, सत्ता जाने का इतना मातम भी अच्छा नहीं है. ख़ासकर अगर यह बिना सही आत्मविश्लेषण और बगैर आगे की रणनीति बनाए मनाया जा रहा है. भाजपा के भविष्य के लिए बेहतर होगा कि वाजपेयी और आडवाणी आज के हालात समझें, हार के मातम से उबरें और ज्योंतिषियों की भविष्यवाणियों के सच्चा निकलने का इंतज़ार छोड़, विपक्ष की भूमिका निभाना आरंभ करें और विपक्ष के अपने लम्बे अनुभव का पूरा लाभ उठाएँ. |
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