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क्यों भरोसा नहीं होता सीबीआई पर? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सीबीआई फिर चर्चा में है पर शायद ग़लत कारणों से. देश की सर्वोच्च जाँच एजेंसी के रूप में सीबीआई 1963 में स्थापित की गई थी. देश के सबसे बड़े घपलों घोटालों की जाँच ये जुड़ी है. आजकल बोफोर्स जाँच के कारण सीबीआई चर्चा में है. इससे पहले चारा घोटाले, जैन हवाला कांड, बाबरी मस्जिद विध्वंस, सेंट किट्स जैसे मशहूर और राजनीतिक रूप से ज्वलंत मामलों में इसकी चर्चा होती रही है. हाल में इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोकी के खातों पर से प्रतिबंध हटाने पर सीबीआई ने कहा कि क्वात्रोकी के ख़िलाफ़ मामले लंबित है और रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी है फिर मुसीबत में फँसती सरकार को देख फिर सीबीआई ने कहा कि स्वयं सीबीआई ने क्वात्रोकी के खाते खुलवाने में पहल की थी. सवाल इस बीच सीबीआई की विश्वसनीयता पर राजनीतिक दल सवाल उठाने लगे हैं. बीजेपी के प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि 'इस सारे मामले में शिकार सीबीआई हुई है. लोकतंत्र के हिसाब से, वह देश की ऐसी संस्था है जिसके विश्वसनीयता पर बहुत सारे मामले टिके हुए हैं उसकी विश्वसनीयता पर आँच आ गई.'
वहीं फोन टैपिंग मामले में सीबीआई की क्षमता और निष्पक्षता पर मुलायम सिंह ने भी सवाल उठाए. वे कहते हैं, "दो उदाहरण अभी सामने आए हैं, भूतपूर्व मंत्री जिनका अभी हाल ही में मामला सीबीआई ने बदल दिया और दूसरा उत्तर प्रदेश के ताज कारिडोर का मामला जहाँ सीबीआई की विश्वसनीयता पर सवाल है." दबाव अगर नेताओँ और उनकी बयानबाज़ी को तरजीह न भी दें तो भी सीबीआई के बारे में न तो इसके पूर्व निदेशकों की राय अच्छी है और न ही उन लोगों की जिनका इससे कभी न कभी जिसका भी पाला पड़ा हो. सीबीआई के पूर्व सह निदेशक एनके सिंह उन दिनों को याद करते हैं जब वे राजनीतिक दबाव में न आकर निष्पक्षता से अपना काम करना चाहते थे. वे कहते हैं, "किस्सा कुर्सी का खेल हो या इंदिरा गाँधी की गिरफ़्तारी का मामला हो, 1980 में जब इंदिरा गाँधी की सरकार आई तो बदले की भावना से मुझे घर से उठवाकर तत्कालीन सरकार ने एक झूठा केस तैयार किया. मुझे सीबीआई से दो दो बार निकाला गया." एनके सिंह ने कहा, "सेंट किट्स केस में मेरे ऊपर दबाव डाला गया, पर दबाव में नहीं आए तो फिर से सीबीआई से निकाल दिया गया. मैंने सुप्रीम कोर्ट तक इसके ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई लड़ी. मैंने एक किताब भी लिखी है 'द प्लेन ट्रुथ'." वहीं सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह इस संगठन की मज़बूरी यूँ गिनाते हैं, "सीबीआई स्वतंत्र इसलिए भी नहीं है क्योंकि वह क़ानून मंत्रालय के आदेश पर चलती है. इसलिए जो भी क़ानून मंत्रालय कहेगा वह अंतिम है. अटार्नी जनरल जो कहेंगे वह सीबीआई के लिए फाइनल है." वे कहते हैं, "मायावती के भी केस में अटार्नी जनरल ने कहा कि वह केस नहीं है तो लगा कि सीबीआई दवाब में आ गई. पर सच ये है कि जब क़ानूनी सलाह ही ऐसी मिली तो इसके लिए कोई और तरीका नहीं रहता. सीबीआई राक्षस और समुद्र के बीच में है." जैन हवाला मामले में वकील रहे अनिल दीवान ने तो सीबीआई के मामले को सर्वोच्च न्यायालय में भी उठाया था. वे कहते है, "मैंने सुप्रीम कोर्ट में लिखित रूप में कहा है कि वे लोग केस ऐसा बनाते हैं कि उसमें समस्याएँ आ जाएँ और दोषी निकल जाए. जैन हवाला कांड में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि सब लोग क्यों छूट गए." कौन ज़िम्मेदार लाल बहादुर शास्त्री के ज़माने में स्थापित सीबीआई निष्पक्ष और योग्य अंवेषण संस्था मानी जाती थी. कहा जाता है कि जैसे जैसे राजनीतिक स्तर घटा, वैसे-वैसे सीबीआई में दखल बढ़ा है. पर एनके सिंह का कहना है कि संस्था को दोष देने के बजाए सीबीआई के नेतृत्व की क्षमता उसके स्तर के लिए जिम्मेदार है. साथ ही सरकार की मंशा भी नहीं है कि उसे पूरी तरह से स्वतंत्र बनाया जाए. वे कहते हैं, "ऊँचे पदाधिकारियों के ख़िलाफ सीबीआई अगर जाँच करना चाहती है तो नियमों के तहत उसे सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है और वह अनुमति उसे नहीं मिलती." नेताओं की बयानबाज़ी कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि सीबीआई की गाज किस पर गिर रही है. जब सीबीआई का काम उनके मन अनुसार होता है तो उन्हें सीबीआई को परहेज़ नहीं होता. अनिल दीवान का कहना है कि सीबीआई के सुधार का नुस्खा उसकी पूर्ण स्वतंत्रता ही है. वे कहते हैं, "न्यायपालिका को देखिए, उसमें कोई राजनीतिक व्यक्ति तबादला नहीं कर सकता, तरक्की नहीं दे सकता. न्यायायिक सेवा या चुनाव आयोग जैसा है वैसा ही कैडर बनाइए भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ तो वही व्यक्ति अभी से दस गुना स्वतंत्र हो जाएगा क्योंकि उनको मंत्री से कुछ लेना नहीं होगा. उनकी पोस्टिंग, ट्रांसफर, तरक्की सब ख़ुद ब खुद होगी." साफ़ है कि ज़रूरत एक नई जाँच एजेंसी की नहीं है, ज़रूरत है अपनी जाँच एजेंसी को दुरुस्त बनाने की और नफ़ा नुक़सान सोचे बिना राजनीतिक दलों को इस संस्था को न्यायपालिका और चुनाव आयोग की तरह स्वतंत्र बनाने की. पर क्या ऐसी हिम्मत आज के राजनेता रखते हैं? | इससे जुड़ी ख़बरें सरकार को बचाने सामने आई सीबीआई16 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस क्वात्रोकी के ख़िलाफ़ सबूत नहीं: सरकार12 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सीबीआई के छापे30 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस सीबीआई की कार्यक्षमता पर सवाल13 जून, 2005 | भारत और पड़ोस अब सीबीआई करेगी तहलका की जाँच04 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस कोई हस्तक्षेप नहीं: वाजपेयी | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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