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अपना लोहा मनवाते नरेंद्र मोदी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चुनाव प्रचार के दौरान मोदी को अपनी 56 इंच की छाती की शेखी बघारने का ख़ासा शौक था. वो शायद इससे हिंदू पौरुष से प्रभावित होनेवाले अपने मतदाताओं को अपनी तरफ आकृष्ट करना चाहते थे. इस समय तो उन्हें अपना सीना साठ इंच का महसूस हो रहा होगा. उन्होंने पिछले सालों में लगातार सरकार में रहने, पार्टी के असंतुष्टों के विरोध, मुस्लिम विरोधी छवि और अक्खड़ नेता की तोहमत लगने के बावजूद पार्टी को अच्छी जीत दिलाई है. हर कोई कहता है कि कम से कम भारत में चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं जीते जाते. चुनाव प्रचार के दौरान मोदी को कहते सुना जाता था कि वो इन लोगों को ग़लत सिद्ध करके दिखाएंगे और ऐसा उन्होंने कर भी दिखाया. भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद सवाल उठाते हैं,'' जिस नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ पिछले पांच साल दुनिया के स्तर पर इतना बड़ा दुष्प्रचार हुआ, उनको लोगों ने अमरीका वीज़ा नहीं देने दिया. संसद की कोई बहस नरेंद्र मोदी और गुजरात के दंगों के बिना नहीं पूरी हुई. इसके बावजूद नरेंद्र मोदी को जनता का समर्थन क्यों है?'' उनका कहना कि नरेंद्र मोदी ने काम किया है. आज अगर ज्योतिर्ग्राम योजना की वजह से गुजरात के हर गांव में बिजली जलती है. हर गाँव में स्कूल हैं, डाक्टर हैं, कंप्यूटर हैं, इंटरनेट है.'' मोदी को ब्रांड मोदी बनाने में नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने खुद बहुत मेहनत की है. बात-बात पर उंगलियों से वी का निशान बना देना, आत्मविश्वास से या कहा जाए अकड़ से भरी चाल, उनके ट्रेडमार्क आधी आस्तीन के कुर्ते और तंग चूड़ीदार पाजामे- उनकी हर अदा बहुत सोच-समझ कर बनाई गई है. नरेंद्र मोदी खुद पिछड़ी जाति के हैं लेकिन जिस ‘गान्ची’ जाति से वो आते हैं, वहां से गुजरात की एक फ़ीसद जनता भी नहीं है. शायद वो पहले अन्य पिछड़ी जाति के नेता हैं जिसे मध्यम वर्ग ने सिर आंखों पर बैठाया है. जाने माने समाजशास्त्री आशीष नंदी कहते हैं, ''पहली बार हिंदुस्तान का कोई मध्यवर्गीय नेता निकला जिसकी अपील मध्यवर्ग के बाहर तक पहुंची है. मोदी इसलिए ऊपर आए हैं, इतना बड़ा फ़ैक्टर हो चुके हैं कि हिंदुस्तान में कि कुछ लोग उन्हें चाहते भी हैं और कुछ लोग घृणा भी करते हैं. उनके सिद्धांत, उनका वेश और उनका बात करने का तरीका सभी कुछ मध्यवर्गीय लोगों के लिए बनाया गया है.'' व्यक्तित्व बहुत से मुख्यमंत्री यहां तक कि एक छोटे-मोटे राजनीतिज्ञ के घर पर भी साथ रहने वालों का एक लंबा अमला होता है और नहीं तो काफ़ी तादाद में लोग उनके आसपास मंडराते रहते हैं. नरेंद्र मोदी इसके अपवाद हैं. सुरक्षाकर्मियों के अलावा सिर्फ़ तीन लोग हैं जो उनके सरकारी बंगले में रहते हैं. एक उनका रसोइया और दो चपरासी. नरेंद्र मोदी को दरबार लगाने का भी शौक नहीं है. यहां तक कि उनके दो असिस्टेंट या उन्हें सहयोगी कह लीजिए – ओपी सिंह और तन्मय को भी उनके निवास स्थान पर आने की इजाज़त नहीं है. मोदी से सहमत न होने वाले भी मानते हैं कि वो कामचोर नहीं हैं. सुबह आठ बजे से रात ग्यारह बजे तक वो काम करते हैं और वो ये भी दिखाने में सफ़ल रहे हैं कि कम से कम व्यक्तिगत तौर पर वे बेईमान नहीं हैं. ये अलग बात है कि इसके बावजूद उनके विरोधी उनको एक दूसरे रूप में देखते हैं. कांग्रेस नेता राशिद अल्वी कहते हैं, '' नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से गुजरात के अंदर नरसंहार कराया है, वह उनके चरित्र को ज़ाहिर करता है और शायद वही उनका ‘क्रेडिट’ और ‘डिसक्रेडिट’ भी है. नरेंद्र मोदी ने अभी चुनाव में कहा कि मैं चाहता हूँ कि मुझे इतिहास भुला दे लेकिन इतिहास उन्हें कभी नहीं भुलाएगा, वे भुलाए नहीं जा सकते.'' ये सही है कि गुजरात के इस चुनाव में वही एक एजेंडा थे, चाहे वो भारतीय जनता पार्टी हो या फिर कांग्रेस. फ़िलहाल लगता यही है कि गुजरात के लोगों ने उनको ‘थम्स अप’ कहा है जिसको करने का खुद उन्हें बहुत शौक रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें मोदी को नेता चुने जाने के लिए बैठक24 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'सीएम था और सीएम रहूंगा'23 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'सांप्रदायिकता' पर भारी पड़ा मोदी का शासन23 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस मोदी 'विरोधियों' पर पार्टी की कार्रवाई21 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस मोदी को अवमानना नोटिस12 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस गुजरात: पहले दौर के लिए मतदान 10 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस मोदी के बयान से मानवाधिकार चिंता08 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस अख़बारों में मोदी की आलोचना07 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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