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'सांप्रदायिकता' पर भारी मोदी का शासन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे दिखाते हैं कि ये मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भारी विजय है. ये जीत यह भी दिखाती है कि चुनावों में सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेशक्षता कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया. जनता ने मोदी को भारी संख्या में वोट दिया और इसकी बहुत-सी वजहें रहीं. इसमें एक प्रमुख कारण यह था कि जनता की नज़र में हिंदु-मुस्लिम या 2002 के दंगे कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन पाए. जनता की नज़र में बड़ा मुद्दा था मोदी का एक अच्छा शासन देना और ईमानदार सरकार चलाना. आज के दौर में जब राजनेताओं को काफी भ्रष्ट माना जाता है तो भी मोदी अपनी यह छवि बनाने में सफल रहे कि वे एक ईमानदार नेता हैं और मोदी के व्यक्तिगत जीवन पर भी कोई लाँछन नहीं लगा पाया है. मोदी की जीत के पीछे दूसरा कारण भारी मतदान रहा. युवाओं और महिलाओं में नरेंद्र मोदी काफी लोकप्रिय रहे. जितने भी नए मतदाता जुड़े वे भाजपा से ज़्यादा ख़ुद को नरेंद्र मोदी की विचारधारा और उनके कामकाज के तरीके के क़रीब पाते थे. मोदी की लोकप्रियता महिलाओं में मोदी की लोकप्रियता की चर्चा चुनाव प्रचार के दौरान भी देखी गई. गुजरात के लोगों ने बताया कि महिलाओं को स्थायित्व और सुरक्षा का आश्वासन चाहिए जो मोदी ने दिया.
पिछले पाँच बरसों में राज्य में कोई दंगा नहीं हुआ और उससे पहले के दंगों की छाया इस चुनाव पर नहीं पड़ी. सोहराबुद्दीन के जिस मुद्दे को विपक्ष ने भुनाने की कोशिश की वो उलटा विपक्ष पर ही भारी पड़ गया क्योंकि मोदी उस मुद्दे को अपने पक्ष में करने के लिए उसे राज्य की सुरक्षा से जोड़ने में कामयाब रहे. जहाँ तक गुजराती अस्मिता का सवाल है तो काँग्रेस के ‘चक दे गुजरात’ के नारे पर मोदी का ‘जीते है गुजरात’ का नारा भारी पड़ गया और गुजराती गौरव भी इस नारे के साथ जुड़ गया. नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ जितनी लामबंदी बढ़ी, उतना ही मोदी को ही लाभ मिला. जनता को लगा कि जो व्यक्ति अच्छा शासन दे रहा है, ईमानदारी से चल रहा है, हम उसके ख़िलाफ़ क्यों हों. नरेंद्र मोदी की जीत में इन सब बातों का काफी योगदान रहा. राष्ट्रीय प्रभाव इसका राष्ट्रीय राजनीति पर तुरंत जो प्रभाव पड़ता दिखाई दे रहा है वो काफी अजीब हो सकता है.
जैसे शायद इससे केंद्रीय राजनीति में स्थायित्व बढ़ेगा. वाम दल और कांग्रेस मोदी और भाजपा के मजबूत होने के डर से और नजदीक आ सकते हैं. दूसरा यह है कि मायावती को इस चुनाव में कोई सीट नहीं मिली है जिससे यह साबित हुआ है कि लड़ाई केवल दो घोड़ों के बीच थी. जिन भी राज्यों में अगले वर्ष चुनाव होने वाले हैं वहाँ काँग्रेस ये दिलासा रख सकती है कि उसकी लड़ाई केवल भाजपा से है और कोई तीसरा दल उसके वोटों में सेंध नहीं लगा सकता. आने वाले चुनाव इस वजह से और दिलचस्प बनेंगे. भाजपा पर इससे कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा. मोदी के विजयी होने से आडवाणी को कोई चुनौती नहीं है. उन्हें राज्य स्तर पर प्रमुख और मजबूत नेता चाहिए और वो तो चाहेंगे कि उनकी पार्टी के पास ऐसे और भी मोदी हों. हाँ, इतना ज़रूर हुआ है कि मोदी ने खुद को भाजपा की अगली पीढ़ी के नेताओं में सबसे ऊपर लाकर खड़ा कर दिया है. |
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