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किरण बेदी के साथ एक मुलाक़ात | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इस सप्ताह हमारे ‘शो’ की मेहमान हैं, एक बहुत ही ख़ास महिला, जो भारत की पहली महिला पुलिस अधिकारी हैं यानी किरण बेदी. आपने कहा था कि आप हमारा प्रोग्राम सुनती हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि कार्यक्रम सुनते समय आपको कान पर हाथ रखना पड़ता हो? नहीं-नहीं, मुझे ये कार्यक्रम सुनना बहुत अच्छा लगता है. इससे उस इंसान के मानवीय पक्ष का भी पता चलता है जो टेलीविज़न पर इंटरव्यू में नज़र नहीं आता. दरअसल, मैं सुबह उठती ही बीबीसी के साथ हूँ. ये सिलसिला आज से नहीं बल्कि मेरे स्कूल के दिनों से ही है. उन दिनों बड़े-बड़े रेडियो सेट हुआ करते थे. टीवी तो होते नहीं थे. जानकारी बढ़ाने के लिए मेरे पिताजी बीबीसी रेडियो लगा देते थे. तब से मैं बीबीसी सुन रही हूँ. सुबह का प्रोग्राम हो या रात का. मैं तो बीबीसी के साथ ही बड़ी हुई हूँ. अब तो इतनी बातें होती हैं आधुनिकीकरण की, नारीवाद की, क्रांति की. लेकिन आप तो ऐसी हस्ती हैं जिन्होंने अपने समय में या यूँ कहें कि समय से पहले भारतीय नारी के बारे में लोगों की सोच बदली और उदारीकरण की प्रतीक बनीं, कैसे हुआ ये सब? मेरा परिवार अमृतसर में अनोखा था. मेरे माता-पिता दूरदृष्टि वाले थे. हम चार बहनें थीं, कोई भाई नहीं था. मेरे ही परिवार की तीन बहनें शार्टस् पहनकर टेनिस खेलती थीं. जब मैं इंडिया नंबर एक और दो खेलने गई थीं तो मेरी बहन मेरे साथ खेलती थी. हमें पेशावरी बहनें कहा जाता था. मुझे लगता है कि हमारा परिवार अमृतसर ही नहीं, बल्कि पूरे भारते में अनोखा था. जहाँ कहा जाता था कि अपना जीवन बनाओ, तुम किसी से कम नहीं हो, आसमान अनंत है, पढ़ाई तुम्हारा असली धन है. शादी की कोई बात नहीं होती थी. शादी हमारे एजेंडे में कहीं नहीं थी. जब ये पेशावरी बहनें टेनिस खेलने जाती थीं तो क्या सुरक्षा गार्ड भी साथ होते थे. क्योंकि अमृतसर में पहले तो ऐसा होता नहीं था? नहीं, कोई सुरक्षा गार्ड नहीं होते थे, यहाँ तक कि सिनेमा हॉल में लड़कों की टिकटें भी मैं ही बुक कराती थी. उनको लंबी लाइन में लगना पड़ता था, मैं कहती थी कि रुक जाओ मैं बुक कराती हूँ. मैं छोटी थी और स्कर्ट पहने लाइन में लग जाती थी, मुझे देखकर लोग कहते थे आओ बेटी तुझे क्या चाहिए. तो मेरा दूसरों के काम आने का काम स्कूल से ही शुरू हो गया था. मतलब यह कि बिना ये सोचे कि मैं लड़की हूँ, दूसरों के काम आना, ये छोटे बीज बचपन में ही मेरे अंदर पड़ गए थे. यह समय से पहले की बात थी. मैं अमृतसर के सबसे अच्छे स्कूल, कॉलेज में पढ़ती थी, लेकिन मेरी कोई भी सहपाठी सिविल सर्विसेज़ में नहीं आई, क्योंकि न तो उनकी और न ही उनके माँ-बाप की सोच वैसी थी. उनके माँ-बाप बस उनकी शादी के बारे में ही सोचते थे, लेकिन मेरे माँ-बाप शादी की बात ही नहीं करते थे. वह कहते थे कि पढ़ो, कमाओ और फिर अपने फ़ैसले करो. किरण बेदी में बहुत ऊर्जा है. क्या राज़ है इसका? समय मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. मैं समय बर्बाद नहीं करती. सोना है, पढ़ना है, या कभी टीवी देखना है तो वह मेरी ज़रूरत है. ज़बर्दस्ती किसी बात की नहीं है. सुबह टूथब्रश कर रही हूँ तो बीबीसी सुन रही हूँ. सुबह वॉक कर रही हूँ तो ऑडियो बुक सुन रही हूँ, सफर कर रही हूँ तो क़िताब पढ़ रही हूँ या कंप्यूटर पर लेख लिख रही हूँ. एक साथ कई काम करना मुझे पसंद है. कोई मुझे कुछ कहता नहीं है. मैं अपने लक्ष्य खुद बनाती हूँ. आप एक साथ कई काम करने की बात कर रही हैं. एक स्तर पर इसके फ़ायदे तो बहुत हैं, लेकिन बोरियत भी तो है? कोई बोरियत नहीं है. यह एक प्राकृतिक भाव है. मैं यह सब काम ज़बर्दस्ती नहीं करती. मैं अपनी रफ़्तार से काम करती हूँ जिससे मैं बहुत संगठित हूँ. मेरे जीवन में कोई फ़ालतू काम नहीं है. मुझे जहाँ ‘हाँ’ करनी है वहाँ ‘हाँ’ करती हूँ और जहाँ ‘ना’ करनी हैं वहाँ मैं ‘ना’ करती हूँ. मेरी हर चीज़ से क्रिएटिविटि जुड़ी है. किसी से फालतू बात नहीं, चुगली सुनने का मुझे समय नहीं. अच्छी बात सुनानी है तो सुना दो बुरी बात सुनानी है तो अपने मन में रखो. इससे होता यह है कि आपका दिमाग दूषित नहीं होता. आपने ऑडियो बुक की बात की तो किस तरह की किताबें सुनना पसंद करती हैं? एंथोनी रॉबिंस, स्टीवन, श्री श्री रविशंकर की किताबें, ‘आटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ ए योगी’, स्वामी रामा की किताब ‘लिविंग अमंग हिमालय’, अध्यात्मिक किताबें, जानकारी बढ़ाने वाली किताबें मुझे पसंद हैं. मैं इन्हें इंटरनेट से डाउनलोड़ कर अपने आईपॉड में डालती हूँ. मेरा सारा ख़र्चा ऐसी ही चीज़ों में होता है. इसमें इतना आनंद मिलता है कि मैं बता नहीं सकती. सुबह का टहलना सबसे अधिक रचनात्मक है. सुबह एक घंटा टहलती हूँ. इसके बाद कसरत. मैं सारे अख़बार अपने स्टेपल पर ही पढ़ती हूँ. कुछ लोग कहते हैं कि वे ट्रेडमिल पर अख़बार पढ़ लेते हैं. आप कह रही हैं कि आप अपने स्टेपल पर ही अख़बार पढ़ लेती हैं. क्या इससे ध्यान नहीं बंटता है? नहीं, इससे दोगुना फ़ायदा होता है. इससे दोगुनी ख़ुशी मिलती है. शारीरिक तंदुरुस्ती और मानसिक फ़ायदा. दिमाग और शरीर दोनो की कसरत हो जाती है. आपकी नज़रों में परंपरागत भारतीय महिला की क्या इमेज़ है? उसे शादी करनी है, शादी के बिना उसकी लाइफ़ ही नहीं है. शादी होनी चाहिए और उसे माँ बनना चाहिए. उसकी अपने पति और परिवार के प्रति प्रतिबद्धता है. और आपके अनुसार एक भारतीय महिला कैसी होनी चाहिए? मेरे अनुसार शादी किसी महिला के लिए उसका अपना चयन होना चाहिए. वह शादी अपनी मर्जी से करे, देख-सुनकर करे. ब्लाइंड शादी में मैं विश्वास नहीं करती. मेरा मानना है कि कोई महिला शादी तभी करे, जब वह किसी साथी के लिए मानसिक रूप से तैयार हो. वह माँ तभी बनें जब वह इसके लिए तैयार हो. ससुराल वालों के साथ-साथ उसे अपने माता-पिता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में शर्माना नहीं चाहिए. वह ऐसा कभी न सोचे कि अब तो दूसरे घर आ गई है, किसी की पत्नी बन गई है. माता-पिता अपनी जगह हैं और सास-ससुर भी माता-पिता ही हैं. मेरे बहन-बहनोई दोनों मनोचिकित्सक हैं. दोनों में गज़ब का सामंजस्य है. मेरा अपना वैवाहिक जीवन भी इसी तरह है. मेरे पति अमृतसर में सामाजिक कार्यकर्ता हैं. मैं सारा समय यहाँ काम करती हूँ. हम जब मन करता है एक-दूसरे को फ़ोन करते हैं, ई-मेल करते हैं, लेकिन किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं है. मुझे लगता है कि यह एक ऐसा रिश्ता जैसा कि आप चाहते हैं.
आपके करियर की तरफ़ लौटते हैं. आप भारतीय पुलिस सेवा में आईं और पहली महिला पुलिस अधिकारी बनीं. अगर आप पुलिस अधिकारी नहीं बनती तो आपके दिमाग में कोई और करियर था क्या? करियर तो निश्चित ही होता. दरअसल, मैं एक साथ कई काम कर रही थी. पढ़ाई में टॉप कर रही थी, एनसीसी, टेनिस में भी और कॉलेज या स्कूल की अन्य गतिविधियों में भी भाग ले रही थी. यूनिवर्सिटी में गई तो वहाँ भी पढ़ाई में टॉप करना और खेल में जीत कर आना. इस तरह एक साथ कई काम करने से आपके आसपास वाले दबाव में तो नहीं रहते हैं कि किरण बेदी इतनी ज़बर्दस्त हैं, हर चीज़ बढ़िया तरीके से करती हैं. हम इनके आसपास कैसे खड़े रहें मेरा ख़्याल है कि उन पर दबाव रहता है. मेरे जूनियर महसूस करते थे कि स्पीड से कैसे चलें, क्योंकि वे मेरी स्पीड जानते थे. लेकिन मैं अपना धैर्य नहीं खोती थी और उन्हें साथ लेकर चलती थी. जहाँ पर भी मैंने काम किया है, वहाँ मुझे भरपूर समर्थन मिला. अच्छा काम करने के लिए अच्छा सपोर्ट सिस्टम चाहिए. मेरे पास सपोर्ट सिस्टम बहुत बढ़िया था, मेरे माँ-बाप का सपोर्ट, पति का सपोर्ट, बेटी का सपोर्ट. आप जब भी अपना धैर्य खोती थीं तो अपने सीनियर के साथ ही? सीनियर के साथ आदर का भाव था, मेरे साथ दो तरह के सीनियर थे, पहले वे जो बहुत अच्छे थे और जो हमेशा मुझे अपने साथ लेकर चले और आगे बढ़ने दिया, वहीं कुछ ऐसे भी थे जिनके नाम मैं नहीं लेना चाहती. मुझे रोकने वाले, ईर्ष्या रखने वाले, तंग करने वाले, स्पीड ब्रेकर लगाने वाले, मानसिक रूप से परेशान करने वाले, लेकिन वह मुझे रोक नहीं पाए. मैंने अपना पूरा जीवन अपने ढंग से जिया है. आपने नौकरी भी की तो अपने तरीके से. कभी आप क्रेन बेदी के नाम से मशहूर हुईं तो कभी तिहाड़ जेल में सुधार, नारकोटिक्स ब्यूरो में किए गए कामों से सुर्खियों में रहीं. लीक से हटकर काम करने के लिए आप खुद को मानसिक रूप से कैसे तैयार करती थीं? इसी को सरकारी नौकरी कहते हैं. या तो आप नौकरी करो या सेवा करो. मेरे मन में नौकरी करने का भाव कभी नहीं आया, क्योंकि मैं नौकरी नहीं सेवा करने आई थी. जब आप नौकरी करते हैं तो आप ढूढ़ते हैं कि रविवार कब आएगा, गुरु पर्व कब आएगा, छुट्टी कब होगी. लेकिन जब आप सेवा करते है तो आप का दायरा बढ़ जाता है. सेवा किसकी, क्यों, कितनी और किस-किस को जोड़ कर. इसलिए जब आप सेवा करने लगते हैं तो आप निडर होकर काम करते हैं. हम नौकरशाही से हटकर अगर सेवा पर आ जाएं तो सारी गवर्नेंस के मायने ही बदल जाएंगे. सब जानते है कि किरण बेदी कड़क, बहुर्मुखी प्रतिभा वाली और ज़िंदादिल महिला हैं. लेकिन घर में किरण बेदी एक माँ, एक पत्नी के रूप में कैसी हैं? मैं घर में भी बहुत व्यवस्थित हूँ. सुख से रहती हूँ. मैं अपने स्टाफ़, को बहुत आदर देती हूँ. जो खाना बनाता है, कपड़े साफ़ करता है, घर साफ़ रखता हैं, मैं उनका बहुत ख़्याल रखती हूँ. मुझे अगर दीवाली मनानी है या अपना जन्मदिन मनाना है तो पहले मैं उनके साथ मनाती हूँ. वो मेरी ताकत हैं. क्योंकि आज मैं जो हूँ वह अपने माँ-बाप या अपने घर के सपोर्टिंग स्टाफ़ की वजह से ही हूँ. वो मेरे लिए जान देते हैं. मुझे उन पर इतना विश्वास है कि आज तक मैंने आपने घर में ताला कभी नहीं लगाया. क्योंकि मैं उनके लिए जो कर सकती हूँ वह करती हूँ. मेरा कई स्टाफ़ तो 20-25 साल से काम कर रहा हैं. मेरे छोटे से घर में कोई भी चीज़ फ़ालतू नहीं हैं. मेरा घर काफ़ी खुला हुआ है. मुझे रोशनी और हवा बहुत पसंद है. कई कमरों में पर्दे भी नहीं लगे हैं. मुझे पर्दे अच्छे नहीं लगते. फ़ालतू की कोई खाने-पीने की भी चीज़ नहीं है. जो भी है मिल-बैठ के खाया जाता है. कभी कुछ गिना नहीं जाता है. हम विश्वास के साथ जीते हैं. मेरा घर बहुत साधारण हैं, भक्ति से भरा हुआ है, प्यार से भरा हुआ है, संगीत से भरा हुआ है. किताबों से भरा हुआ है. क्य़ा बात है, मुझे बहुत अच्छा लगा यह आपका यह जवाब सुनकर? एक बात और मेरा घर कंप्यूटर से भी भरा हुआ है. कहा जाता है कि अधिक उम्र वाले लोग नई तकनीक जल्दी नहीं सीख पाते, लेकिन आप तो नई तकनीक बड़े आराम से अपना लेती हैं? जब मैं 2003 में संयुक्त राष्ट्र में गई थी तो वहाँ मेरे लिए पहली शर्त थी कि मैं कंप्यूटर जानती हूँ या नहीं. अगर कंप्यूटर नहीं जानती तो मुझे वहाँ काम ही नहीं मिलता. मैंने संयुक्त राष्ट्र में पुलिस सलाहकार के रूप में काम किया. वहाँ जाने से पहले 2003 में मैंने कंप्यूटर कोर्स किया था. मुझे वहाँ पहुँचते ही ब्लैकबेरी दे दी गई कि आपको तो पूरी दुनिया के संपर्क में रहना है. शुक्र है मैं कंप्यूटर जानती थी. आज 2008 में मैं लैपटॉप, ब्लैकबेरी और इंटरनेट के बिना नहीं रह सकती. आपने कहा कि आपके लिए छुट्टी कभी नहीं होती. लेकिन जब कभी खाली समय मिलता है तो आप आराम करती हैं या नहीं? मुझे अच्छी नींद मिल जाए वह मेरे लिए सबकुछ है. अगर मैं थक कर सात घंटे सो गई तो यह भगवान का शुक्र है. मेरे लिए यह सबसे अच्छी छुट्टी है. इससे बढ़िया पोषण कुछ नहीं है. मुझे जो चीज़ सबसे अधिक तंग करती है वह है अच्छी तरह सो न पाना. अगर मैं समय से सो गई और समय से टहलने चली गई तो सारा दिन मैं जो करती हूँ उसमें मेरा मन लगता है. कितने बजे सोती हैं? रात में क़रीब 11 बजे तक सो जाती हूँ. सुबह आराम से छह-साढ़े छह बजे तक उठ जाती हूँ. अगर मैं सात घंटे तक सो गई तो वह मेरे लिए एक तोहफ़ा है. आपको छुट्टी पर जाना या घूमने-फिरने का शौक नहीं है? जब मैं रोज वही कर रही हूँ जो मेरा मन करता है, जब मैं यात्रा कर रही होती हूँ तो वह मेरे लिए छुट्टी ही है. महीने में दो-तीन दिन मैं दिल्ली से बाहर जाती हूँ. इससे मेरी एकरसता टूटती है. इससे यात्रा भी हो जाती है और नई-नई जगहों को देखना भी हो जाता है. जबसे मैंने नौकरी छोड़ी है, तबसे मैं छह बार विदेश हो आई हूँ. आपने टीवी शो पेश करने की शुरुआत भी की है. आपके लिए यह कोई वैकल्पिक कैरियर तो नहीं. कैसा लग रहा है आपको? मैं पहले सोचती थी कि यह आसान काम है, लेकिन यह बहुत कठिन काम है. बिना किसी तैयारी के बोलना, अपनी हाज़िरजवाबी बनाए रखना और बढ़िया करना. फिर भी मैं इस काम को कर रही हूँ. पहले मुझे लगा कि यह मुझसे नहीं होगा, लेकिन बाद में मैंने खुद को समझाया कि कुछ नया सीखना चाहिए. वैसे भी सीखने का कोई समय नहीं होता.
तो क्या केवल हाज़िरजवाबी का खेल होता है. बहुत दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं होती? बिल्कुल. ‘आपकी कचहरी’ के पिछले शो में एक आदमी ने कहा कि मैं अपनी पत्नी को रखने को तैयार हूँ. इससे मुझे इतना गुस्सा आया कि मैंने उससे कहा कि रखने का क्या मतलब है, रखा तो जानवरों को जाता है. पत्नी को रखा नहीं उसके साथ रहा जाता है. थोड़ी देर पहले आपने कहा कि जब आप खाली होती हैं तो संगीत सुनती हैं. किस तरह का संगीत पसंद है आपको? मुझे भक्ति और फ़िल्मी दोनों तरह का संगीत पसंद है. जैसे ‘गुरु’ के गाने मुझे बहुत पसंद हैं. रहमान का संगीत मुझे बहुत अच्छा लगता है. भक्ति संगीत में मुझे जगजीत के गाए भजन बहुत पसंद है. मेरा घर भजनों से भरा हुआ है. लेकिन मैं फ़िल्मी संगीत केवल टीवी पर ही सुनती हूँ. अगर मुझे कोई कैसेट या सीडी खरीदनी भी है तो मैं भक्ति संगीत का ही खरीदती हूँ या ऑडियो बुक खरीदती हूँ. फ़िल्में भी देखती हैं? खूब देखती हूँ, मैं पिछली सभी अच्छी फ़िल्में देख चुकी हूँ. कौन सी? ‘तारे ज़मीन पर’, ‘लगान’ देखी. मुझे अच्छी फ़िल्में पसंद हैं. मुझे इन फ़िल्मों से प्रेरणा मिलती है. अभी हवाई जहाज में ‘गांधी माई फ़ादर देखी’. जिसके बाद मैं रो पड़ी थी. फ़िल्म देखने के बाद मुझे लगा कि अगर गांधी का लड़का उनके रास्ते पर चलता तो आज देश में एक और महात्मा होता. गांधी अपने बेटे को तैयार करके जाते, लेकिन उसने उनका साथ नहीं दिया. मुझे इस तरह की फ़िल्में बहुत पसंद हैं. मैंने एक पिता के तौर पर यह महसूस किया कि उस समय गांधीजी पर क्या बीत रही होगी, उसके बाद भी वह अपने काम में लगे रहे. मुझे मनोरंजन नहीं चाहिए, मुझे केवल प्रेरणा चाहिए. मैंने ‘धूम’ केवल यह देखने के लिए देखी कि ऐश्वर्या और ऋत्विक कैसे डांस करते हैं. ऋत्विक ने बहुत बढ़िया डांस किया है. मैं उन्हें पसंद करती हूँ. कैसा लगा आपको. आपने उन्हें पास कर दिया? जी, ऋत्विक बहुत बढ़िया डांस करता है. ऐश्वर्या मेरी नज़र में सबसे सुंदर है और अभिनय में काजोल बहुत बढ़िया है. क्या बात है, आपने तो मेरे आगे के सवाल छीन लिए. आपको किस अभिनेता का अभिनय अधिक पसंद आता है? मुझे ‘फ़ना’ बहुत पसंद आई थी. इसमें आमिर ख़ान ने बहुत बढ़िया काम किया था. मुझे उसका संगीत भी बहुत पसंद है. मैं तो इस फ़िल्म के गाने पर डांस भी करती हूँ. अच्छा आप डांस भी करती हैं? हां. मुझे बड़ा मज़ा आता है डांस करने में. लेकिन अपने लिए और अपने घर में ही. जब कोई ऐसा गाना आता है तो हम सब डांस करते हैं, मेरे कपड़े धोने वाली भी और मेरा कुक भी. लोहड़ी और दीवाली पर हम सब डांस करते हैं. मैं सबकी नकल भी उतारती हूँ. किसकी नकल उतारती है आप? मैं आमिर ख़ान की नकल उतार सकती हूँ. ऋत्विक की भी. तो जरा आमिर की नकल करके दिखाएं? गाने में नहीं, केवल डांस की ही नकल उतार सकती हूँ. ऐश्वर्या की भी नकल उतार सकती हैं आप? नहीं, उसकी नहीं कर सकती. आपके जीवन का सबसे यादगार लम्हा? किसी एक का नाम तो मैं नहीं ले सकती. लेकिन रेमन मैगसेसे पुरस्कार के लिए जब मैं अगस्त 1994 में मनीला में गई तो मेरी माँ और बहन मेरे सामने बैठी थीं. उस वक़्त मुझे बहुत ख़ुशी मिली. पुरस्कार के साथ मेरा और मेरी माँ का फ़ोटो मेरे जीवन की सबसे अहम तस्वीरों में से एक है. तो आप संवेदनशील भी है? क्यों नहीं, मनुष्य बने रहने के लिए आपको अपनी संवेदनाओं को बचाए रखना पड़ता है. आप मशीन में संवेदनाएं डालें तो वह मनुष्य बन जाता है. प्यार, देखभाल, आदर देना ये सभी बहुत महत्वपूर्ण संवेदनाएं हैं. इसी को सॉफ़्ट स्किल कहते हैं. आपने सार्वजनिक मंच से भाषण देने की कला भी कहीं से सीखी थी क्या? नहीं, जब मैं कॉलेज में पहली बार भाषण देने गई तो भूल गई थी. लेकिन मैं हिम्मत करके चली गई थी कि मुझे कुछ सीखना है. मेरे पिता ने सिखाया था कि चुनौतियां लो और डरो नहीं. आप साढ़े चौदह साल की उम्र में ही कॉलेज में पहुँच गई थीं? मैंने 18 साल की उम्र में स्नातक कर लिया था और 20 की उम्र में परास्नातक. साढ़े बीस साल की उम्र में मैं एक कॉलेज में पढ़ाने लगी थी और साढ़े 22 साल की उम्र में मैं आईपीएस में चुन ली गई थी. उस समय उम्र की कोई न्यूनतम सीमा नहीं थी क्या? क्या साढ़े बाइस साल में भी आईपीएस बन सकते थे? 21 क्या 20 साल में भी आईपीएस बन सकते थे. हमारे साथ तो 20 और 21 साल के आईपीएस भी थे. इसीलिए हम इतनी जल्दी इतनी ऊंचाई पर पहुँच गए. आपकी कमज़ोरी क्या है? अगर आप मुझे सज़ा देना ही चाहते हैं तो मुझे किचन में भेज दीजिए. मैं कुछ भी नहीं बना सकती हूँ. या अगर बनाऊंगी भी तो केवल एक ही बार बनाऊंगी. आप फिर मुझे कभी खाना बनाने के लिए नहीं कहेंगे. मैं अपने सीनियर को तब तक दिल से इज़्जत नहीं करती जब तक मेरे मन में उनके प्रति इज़्जत नहीं आती. इसी कारण से कई बार मेरे सीनियर मेरे साथ नहीं थे. जो सीनियर मेरे साथ थे उनके लिए मैं जीवन त्यागने को भी तैयार रहती थी. आपने अपने जीवन में इतने सारे काम किए. अब आगे क्या करने का इरादा है? मैं एक बहुत ज़रूरी किताब लिख रही हूँ. एक तरफ़ मेरा लेखन है और मेरी यात्राएं हैं और दूसरी तरफ़ मेरे एनजीओ नवजीवन और इंडिया विज़न फ़ाउंडेशन. ये एनजीओ दस हज़ार लोगों को शिक्षित कर रहे हैं. ढाई-तीन सौ लोगों को रोजगार दे रहे हैं. इसके अलावा मेरे पास लगभग 50 प्रोजेक्ट हैं. मेरे जाने के बाद भी ये चलते रहेंगे. इन्हें मैंने इस तरह प्लान किया है कि ये पूर्णकालिक संस्थाएं बनते जाएंगे. मेरा मानना है कि इंसान जब तक तंदुरुस्त है उसे काम करते रहना चाहिए. इससे भगवान खुश होंगे. |
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