मुग़लों से कोहिनूर हीरा लूटने वाले नादिर शाह की कहानी

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- Author, असद अली
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, लंदन
यह अठारहवीं सदी के लगभग मध्य की बात है, जब माउंट क़ाफ़ की चोटियों के नीचे, उस समय दुनिया की "सबसे शक्तिशाली सेना" ऑटोमन साम्राज्य पर आक्रमण करने के लिए तैयार थी.
जब इतिहासकार इसे अपने समय की सबसे बड़ी सेना कहते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे इसे केवल एशिया या मध्य पूर्व की सबसे बड़ी सेना कह रहे हैं, बल्कि वे इसकी तुलना उस समय की यूरोप की सबसे बड़ी सेनाओं से भी करते हैं.
थोड़े ही समय में पश्चिम में ऑटोमन साम्राज्य में इराक़ और सीरिया से लेकर पूर्व में दिल्ली तक बहुत से युद्धों में सफलता हासिल करने वाली ये सेना अपने कमांडर नादिर शाह की जीवन भर की रणनीति और कड़ी मेहनत का नतीजा थी.
साल 1743 तक नादिर शाह और उसकी सेना की कार्रवाइयों की एक झलक इतिहासकार माइकल एक्सॉर्डी की इन कुछ पंक्तियों में देखी जा सकती है.
"नादिर शाह ने ईरान को अफ़ग़ान के क़ब्ज़े से आज़ाद कराया, ऑटोमन तुर्कों को ईरानी क्षेत्र से बेदख़ल किया, योजनाएं बनाकर रूसियों से अपने क्षेत्रों को ख़ाली कराया, ऑटोमन साम्राज्य के क्षेत्रों पर हमला किया और उसे हराया, और ख़ुद को ईरान का बादशाह बनाया. अफ़ग़ानों पर उनके क्षेत्रों में घुस कर हमला किया और उन क्षेत्रों पर दोबारा क़ब्ज़ा किया, फिर भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली पर विजय प्राप्त की, मध्य एशिया में दाख़िल हो कर, तुर्कमान और उज्बेक्स को काबू में कर के दोबारा पश्चिम का रुख़ किया और ऑटोमन के ख़िलाफ़ सफल युद्ध लड़ा."
मुग़ल साम्राज्य की कमज़ोरी
इतिहासकार माइकल एक्सॉर्डी लिखते हैं, कि "नादिर शाह की सेना के सैन्य कौशल का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आगे चल कर उनके दो कप्तानों ने दो अलग-अलग राज्यों, अफ़ग़ानिस्तान और जॉर्जिया की स्थापना की."
ऐसा कहा जाता है कि अगर नादिर शाह न होते तो शायद ईरान भी नहीं होता और वो "अफ़ग़ानों, रूसियों और तुर्कों में विभाजित हो जाता." जब नादिर शाह ने ईरानी सल्तनत की सत्ता संभाली तो ये विभाजन काफ़ी हद तक हो चुका था.
दिल्ली पर नादिरशाह के आक्रमण ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को भी मुग़ल साम्राज्य की कमज़ोरी के प्रति सचेत कर दिया, और एक्सॉर्डी का तो मानना है कि "नादिर शाह न होते तो ब्रिटिश युग देर से और अलग ढंग से शुरू होता और या शायद कभी न भी होता."
नादिर शाह का जन्म किसी शाही या नवाबी परिवार में नहीं हुआ था. ईरानी साम्राज्य की राजधानी से दूर एक सीमावर्ती क्षेत्र में जन्मे, इस योद्धा को जो थोड़े बहुत विशेषाधिकार अपने पिता की वजह से मिल सकते थे, उनके पिता की जल्दी मृत्यु के कारण इसकी संभावना भी सम्पत हो चुकी थी.
इसके बावजूद जीवन जीने के लिए जंगल से लकड़ियां इकट्ठी करके बेचने से जीवन की शुरुआत करने के लगभग तीस वर्षों में, वह ख़ुद अपनी खड़ी की हुई दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना के कमांडर बन चुके थे.
लेकिन इस योद्धा की कहानी में भी अधिकांश कहानियों की तरह बुलंदियों के बाद जवाल (पतन) आया. नादिर शाह अपने बेटों के लिए एक मज़बूत राज्य और अपनी सेना छोड़कर नहीं जा सके.
इतिहासकारों का मानना है कि अगर ऐसा हो जाता तो उनका शक्तिशाली परिवार न केवल ईरान की सीमाओं को मज़बूत करता, बल्कि ऐसे बदलाव लेकर आता जैसी यूरोपीय राज्यों में एक दूसरे से मुक़ाबले और आधुनिक सेना रखने की ज़रूरतों ने उसी दौर में संभव बनाई थी.
इतिहासकारों का मानना है, कि "यह भी कहा जा सकता है कि अफ़ग़ानों के हाथों हार के बाद, दोबारा उठता हुआ ईरान अपेक्षाकृत कमज़ोर मुग़ल और ऑटोमन साम्राज्यों से पैदा हुई खाई को भरता. और एक ऐसे परिवार के नेतृत्व में जो शिया-सुन्नी के विभाजन को मिटाना चाहता था, वह यूरोप से मुक़ाबले में इस्लामी दुनिया के पतन को रोक सकता था."
लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि, नादिर शाह की कहानी का अंत इसे एक 'त्रासदी' बना देता है, जिसे आज युद्ध की सफलताओं से ज़्यादा नादिर शाह की अत्याचार और क्रूरता और अंतिम दिनों की मानसिक असंतुलन की वजह से याद किया जाता है.

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ख़तरनाक सीमा क्षेत्र में जन्म
माइकल एक्सॉर्डी ने अपनी किताबों 'ईरान: एम्पायर ऑफ़ दि माइंड' और 'दि स्वॉर्ड ऑफ़ पर्शिया' में, नादिर शाह के जीवन के उतार-चढ़ाव को विस्तार से लिखा है.
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि नादिर शाह की जन्मतिथि और शुरुआती जीवन का विवरण स्पष्ट नहीं है और उन पर और शोध करने की ज़रूरत है.
नादिर शाह का जन्म ईरानी साम्राज्य के पूर्वी प्रांत ख़ुरासान के उत्तरी भाग में एक ख़तरनाक इलाक़े में हुआ था. उनके जन्म की तारीख़ के बारे में अलग-अलग मत हैं, लेकिन एक्सॉर्डी के अनुसार यह तारीख़ 6 अगस्त 1698 थी और उनका जन्मस्थान दर्रा ग़ाज़ के क्षेत्र में अल्लाहु अकबर पर्वत पर दस्तगर्द नामक गाँव था.
उनकी मातृभाषा तुर्की थी लेकिन उन्होंने जल्द ही फ़ारसी भी सीख ली होगी. यह क्षेत्र ख़ुरासान की राजधानी मशहद के उत्तर में था.
उनके पिता तुर्कमान के अफशर क़बीले में एक चरवाहे थे जिनका संबंध निम्न वर्ग लेकिन सम्मान से देखे जाने वाले वर्ग से था. शायद वह गांव के मुखिया भी थे.
नादिर शाह का अतीत
नादिर शाह ने इस अतीत को हमेशा अपने सामने रखा और बादशाह बनने के बाद भी उन्होंने कभी भी अपने बचपन के बारे में कोई शानदार कहानी गढ़ने की कोशिश नहीं की.
अगर आप उनके शाही इतिहासकार के काम को देखें, तो इस तरह की बाते पढ़ने को मिलेंगी कि "तलवार की अपनी ताक़त होती है, इसका संबंध इस बात से नहीं है कि जिस लोहे से वो बनी है वह किस खान से निकाला गया है."
नादिर शाह की कहानी पर आगे बढ़ने से पहले तलवार के बारे में ही एक दिलचस्प घटना के बारे में पढ़ें.
जब नादिर शाह की सेना दिल्ली में भारतीयों से धन इकट्ठा कर रही थी, नादिर शाह ने अपने बेटे नसरुल्लाह की शादी शहंशाह औरंगज़ेब की परपोती और मुहम्मद शाह की भतीजी से कर दी. दोनों परिवारों ने नवविवाहितों को महंगे तोहफ़े दिए और यमुना के तट पर ख़ूब आतिशबाजी की गई.
परंपरा के अनुसार, मुग़ल अधिकारी दूल्हे की सात पीढ़ियों का पता कराते थे. जब नादिर शाह के बेटे के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, कि "उन्हें बताओ कि वह नादिर शाह का बेटा है जो तलवार इब्ने तलवार इब्ने तलवार है और सत्तर पीढ़ियों से ऐसा ही है."
जन्म के समय उनका नाम नादिर क़ली रखा गया था, जिसका अर्थ है 'शान वाले का ग़ुलाम'. वर्षों बाद, जब चरवाहे सरदार इमाम क़ली का पुत्र बादशाह बना, तो उसका नाम नादिर शाह हो गया.
अठारहवीं सदी की शुरुआत में, ख़ानाबदोश और अर्ध-ख़ानाबदोश चरवाहे ईरानी साम्राज्य की आबादी का एक तिहाई हिस्सा थे, जो लगभग तीस लाख बनती है.
सांस्कृतिक रूप से वह फ़ारसी संस्कृति को अपना चुके थे, लेकिन उनकी पहचान अमीर तैमूर और चंगेज़ ख़ान से जुड़ी तुर्की-मंगोल परंपराएं थीं.
वे अपने आप को उस क्षेत्र में बसे उन लोगों से बेहतर मानते थे जो उनके घुड़सवार पूर्वजों के अधीन थे.
नादिर शाह दोहरी संस्कृति में पले-बढ़े. ईरानी साम्राज्य का तुर्की-भाषा बोलने वाला नागरिक, जिसके व्यक्तित्व का एक पहलू वो फ़ारसी संस्कृति भी थी, जिसे इस्तांबुल से समरक़ंद और दिल्ली तक अपनाया जा चुका था.
दस साल की उम्र में, वह एक अच्छे घुड़सवार और शिकारी के रूप में जाने जाते थे, जो तीरंदाज़ी और भाला फेंकने में भी माहिर थे. उनके बचपन में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई और परिवार ग़रीबी में डूब गया.

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माइकल एक्सॉर्डी लिखते हैं कि जिस समाज में पुरुष के बिना महिला बहुत कमज़ोर हो जाती थी, वहां उनकी मां ने एक ग़रीब विधवा होते हुए हार नहीं मानी.
इतिहासकारों का कहना है कि शायद अपनी मां को इतनी मेहनत करते देखने से ही उनमें महिलाओं के प्रति सहानुभूति की भावना पैदा हुई, जिसे बाद में उन्होंने कई बार अभियानों के दौरान भी साबित किया.
कठिनाई के इन दिनों को वह कभी नहीं भूले, न ही वह उन दिनों के साथियों को भूले, ख़ासकर अपनी मां और भाई इब्राहीम को.
उन्होंने ऐसे दिन भी बिताये, जब वे जंगल से लकड़ी चुनकर ऊँटों और खच्चरों पर शहर लेजाकर बेचते थे और यही उनकी आय का स्रोत था.
एक्सॉर्डी का कहना है कि बादशाह बनने के बाद, उन्होंने अपने एक लकड़ी काटने वाले साथी को पुरस्कृत करते हुए उससे कहा, कि "घमंडी मत हो जाना, इस खच्चर को और लकड़ी चुनने को याद रखना."
उनके पिता की मृत्यु से पहले अगर उनका बचपन ख़ुशी-ख़ुशी और अन्य बच्चों पर रोब जमाते हुए बीता था, तो उनके पिता की मृत्यु के बाद ग़रीबी के कारण वो अपने साथियों से कट गए थे जैसे कि वह अब उनके बराबर न रहे हों.
इतिहासकार लिखते हैं कि बादशाह बनने के बाद भी अपने आस-पास के माहौल में, भव्य दरबार और कुलीनों में "फिट न होने की भावना" जीवन भर उनके साथ रही.
नादिर शाह का ईरान में 'सैन्य क्रांति' की ओर पहला क़दम
पंद्रह साल की उम्र में, वह एक स्थानीय सरदार और एबियार्ड शहर के गवर्नर बाबा अली बेग, की सेवा में शामिल हो गए. ख़ुरासान के अफ़सरों में बाबा अली बेग एक महत्वपूर्ण सरदार थे.
उन्होंने बाबा अली बेग की सेवा में एक तमंची के रूप में शुरुआत की और समय के साथ साथ उनका दाहिना हाथ बन गए.
यह वह समय था जब ईरानी साम्राज्य के इस सुदूर इलाक़े में भी बारूदी हथियार पहुंच चुके थे, और नादिर ने उस समय के आधुनिक युद्ध विधियों के आधार पर अपने करियर की नींव रख दी थी.
आने वाले महीनों और वर्षों में, नादिर शाह ने ईरान की सैन्य क्षमताओं में क्रांति ला दी.
साल 1714-15 में, एक तुर्क क़बीला ख़ुरासान की उत्तरी सीमा को पार करके राज्य में दाख़िल हो गया. लड़ाई हुई, बाबा अली की सेना का पलड़ा भारी रहा, सैकड़ों हमलावर क़ैदी बन गए.
नादिर ने निश्चित तौर पर अहम भूमिका निभाई होगी, इसीलिए बाबा अली ने इस कामयाबी की सूचना साम्राज्य की राजधानी इस्फ़ाहान जाकर ईरान के सफ़विद बादशाह सुल्तान हुसैन तक पहुंचाने के लिए नादिर शाह को चुना.
बादशाह के सामने पेश होने के सम्मान के साथ, नादिर शाह को दरबार में एक सौ तमन भी इनाम में मिले. यह इस्फ़ाहान की उनकी पहली यात्रा थी जहां वह एक बिलकुल ही नई दुनिया से परिचित हुए.
"एक ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार, नादिर के साथ कुछ दरबारी अधिकारियों ने दुर्व्यवहार किया था और जब वर्षों बाद वह बादशाह बना, तो उसने अपने दरबारियों के मनोरंजन के लिए इस घटना को एक थियेटर ड्रामे के रूप में प्रस्तुत करने का आदेश दिया."
नादिर शाह के शाही वैभव को देखने का यह अनुभव अच्छा नहीं रहा और वह कभी भी इस चीज़ को पसंद नहीं कर सके.
यह घटना उनके आसपास के माहौल में मिस फिट होने का एक और उदाहरण है. दरबारी इस क़बायली की क्षमताओं को पहचान नहीं सके थे.
हालांकि, उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि उनका सफ़विद साम्राज्य तेज़ी से अपने पतन की तरफ़ बढ़ रहा था और उनके सामने मौजूद क़बायली नादिर शाह पहले उनके साम्राज्य का आख़िरी सहारा और फिर जल्द ही उनके बादशाह के तौर पर सामने आने वाला था.

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सफ़विद साम्राज्य का अंत और ईरान पर अफ़ग़ानों का क़ब्ज़ा
ईरान के 200 साल पुराने सफ़विद साम्राज्य को पूर्व से ग़लज़ई अफ़ग़ानों ने चुनौती दी और बात यहां तक पहुंच गई कि सफ़विद वंश का बादशाह इस्फ़ाहान में "हथियार डालने के लिए 23 अक्टूबर सन 1722 को अफ़ग़ानियों से मांगे हुए घोड़े पर सवार हो कर अफ़ग़ान महमूद ग़लज़ई के ख़ैमे (तम्बू) तक पहुंचा."
उस समय तक नादिर शाह ने मशहद के निकट कलात को अपना गढ़ बना लिया था. साल 1382 में यह शहर अमीर तैमूर का गढ़ हुआ करता था.
इस क़ब्ज़े ने क्षेत्र के अन्य सरदारों पर नादिर की स्थिति को मज़बूत कर दिया था.
साल 1725-26 में, अब पूर्व सफ़विद साम्राज्य के "निर्वासित स्वयंभू बादशाह" तहमास्प क़ली ख़ान, ईरानी साम्राज्य के शतरंज की बिसात पर एक छोटा सा मोहरा थे. इस्फ़ाहान के अफ़ग़ानों के हाथों में जाने के कुछ ही समय बाद उन्होंने अपनी बादशाहत की घोषणा कर दी.
लेकिन तब तक सैकड़ों साल पुराने इस साम्राज्य के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों पर रूस और ऑटोमन साम्राज्य का क़ब्ज़ा हो चुका था. ईरानी क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा करने की होड़ में, इन दोनों महान साम्राज्यों के बीच युद्ध का ख़तरा भी पैदा हो चुका था.
ऑटोमन के दुश्मन
इस अफ़रातफ़री में नादिर शाह का दबदबा बढ़ता जा रहा था और उन्होंने तहमास्प से दोस्ती का संदेश स्वीकार कर लिया.
19 सितंबर, 1726 को, नादिर शाह ने अपनी अधीनता की घोषणा के साथ, एक भव्य समारोह में तहमास्प का स्वागत किया. यह वह दिन था जब नादिर शाह एक क्षेत्रीय व्यक्ति से एक राष्ट्रीय स्तर के सरदार बन चुके थे.
नादिर शाह ने जल्द ही एक युद्ध में तहमास्प के एक बड़े प्रतिद्वंद्वी को हराकर अपना क़द और बढ़ा लिया और अब वह ईरानी साम्राज्य के निर्वासित बादशाह के कमांडर-इन-चीफ़ थे.
नादिर शाह को तहमास्प क़ली ख़ान (तहमास्प का ग़ुलाम) की उपाधि दी गई. बादशाह का नाम मिलना बड़े सम्मान की बात मानी जाती थी. नादिर शाह ने उसी साल पतझड़ के मौसम में, बादशाह को मशहद का पवित्र शहर भी जीत कर दिया.
तहमास्प की ताक़त बढ़ती जा रही थी और इसी दौरान रूसियों ने भी अपने संपर्क बढ़ाने शुरू कर दिए. रूसी ऑटोमन की तरफ़ से ईरानी साम्राज्य पर कार्रवाई करने से ख़ुश नहीं थे.
उन्होंने शाह तहमास्प और नादिर शाह के राज्य को वापस लेने के प्रयासों में हस्तक्षेप न करने की घोषणा की. वो उन दोनों को ऑटोमन के दुश्मन के रूप में देख रहे थे.

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इमाम रज़ा के मज़ार पर नादिर शाह की भिखारियों से बातचीत
नादिर शाह मशहद पर क़ब्ज़ा पूरा होते ही इमाम रज़ा के मज़ार पर हाज़िरी देने के लिए गए और ज़मीन चूम कर अपनी सफलता के लिए उन्हें धन्यवाद दिया. बाद में उन्होंने उसके गुंबद की सजावट में भी इज़ाफ़ा किया और एक नई मीनार का निर्माण भी कराया जो आज भी क़ायम है. भक्ति की इस अभिव्यक्ति से नादिर शाह के सैन्य और धार्मिक हलके ज़रूर ख़ुश हुए होंगे.
उस समय नादिर शाह का एक किस्सा भी मशहूर हुआ था. उन्होंने मज़ार के बाहर अंधे होने का नाटक करने वाले एक भिखारी से पूछा, कि वह अपनी आंखों के ठीक होने के लिए कब से मज़ार पर दुआ मांग रहा था. उसने कहा कि दो साल से. नादिर शाह ने उससे कहा कि अगर दो साल तक दुआ मांगने के बाद भी इसकी आंखें ठीक नहीं हो रही है, तो इसका मतलब है कि इसका ईमान (विश्वास) बहुत कमज़ोर है.
नादिर शाह ने भिखारी से कहा कि अगर उनके मज़ार से बाहर आने तक उसकी आंखें ठीक नहीं हुई तो, तो वह समझेंगे कि उसका ईमान ठीक नहीं था और वे उसका सिर काट देंगे.
इतिहासकार लिखते हैं कि जब नादिर शाह थोड़ी देर बाद वापस आये तो उस फ़क़ीर ने आगे बढ़ कर कहा, कि "चमत्कार हो गया, चमत्कार हो गया" आंखें ठीक हो गई हैं. नादिर शाह ने मुस्कुराते हुए कहा कि विश्वास ही सब कुछ होता है और वहां से चले गए.
इतिहासकार लिखते हैं कि साल 1726 के अंत तक कुछ ही हफ्तों के भीतर, नादिर शाह एक सामान्य क़बायली सरदार से उठकर सफ़विद साम्राज्य की बहाली के लिए एक चमकती उम्मीद बन गए थे.
शाह तहमास्पी की हार
साल 1726 में मशहद की विजय के बाद, नादिर और शाह तहमास्प के बीच दूरियां पैदा होनी शुरू हो गईं. दरबारियों ने तहमास्प के कान भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी. और फरवरी 1727 में, वे चुपचाप मशहद छोड़ कर चले गए और एक कुर्द शहर पहुंच कर, नादिर शाह को गद्दार घोषित कर दिया और पूरे राज्य में नादिर शाह के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए सैन्य मदद मांगी.
नादिर ने भी, बिना समय बर्बाद किए, मशहद में तहमास्प और उसके मंत्रियों की सारी संपत्ति ज़ब्त कर ली, और अपने भाई इब्राहिम ख़ान को इंचार्ज बना कर, कुर्द शहर खुभूषण में पहुंच कर उसका घेराव कर लिया. संक्षेप में ये कि तहमास्प ने हार को देखते हुए समझौते का फ़ैसला किया और 21 मार्च को नवरोज़ के दिन ज़बरदस्त उत्सव और जश्न के बीच वापस मशहद आ गए, दो सप्ताह तक चलने वाले इस उत्सव के दौरान, नादिर शाह ने एक कुर्द सरदार की बेटी से शादी भी की.
हालांकि, इतिहासकार का कहना है कि न तो तहमास्प का हार स्वीकार करना और न ही नादिर की शादी उनके मतभेद को समाप्त कर सकी. नादिर का कहना था, कि सफ़विद साम्राज्य की राजधानी इस्फ़ाहान की ओर बढ़ने से पहले हेरात के अब्दाली अफ़ग़ानों से निपटना ज़रूरी है, जबकि तहमास्प सफ़विद राजवंश की बादशाहत को बहाल करने के लिए उत्सुक थे.
यह आख़िरी बार नहीं था जब एक पूर्व साम्राज्य का उत्तराधिकारी और भविष्य का यह बादशाह आमने-सामने आए थे. 23 अक्टूबर, 1727 को, तहमास्प को एक बार फिर नादिर के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा. वह बहुत ही ज़्यादा निराश हो चुके थे. एक अभियान के दौरान, शाह तहमास्प रात में हाथ धोने के बहाने तंबू से निकले और भागने की असफल कोशिश की. वे तंबू से लगभग एक मील दूर ही गए होंगे, कि नादिर शाह उन तक पहुंच गए.
उसने अपना गला काटने की कोशिश की लेकिन नादिर ने तेज़ी से आगे बढ़ कर उनका ख़ंजर छीन लिया. इस घटना के बाद तहमास्प ने नादिर शाह से अलग होने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया.
नादिर शाह की सेना असली हथियारों से अभ्यास करती थी: यूनानी व्यापारी का आँखों देखा हाल
नादिर शाह ने आख़िर इतनी शक्तिशाली सेना का निर्माण कैसे किया? साल 1729 में, नादिर शाह ने मार्च में नवरोज़ के अवसर पर हेरात पर हमला करने का अंतिम निर्णय लिया. "यह एक महत्वपूर्ण अभियान था जिसमें उनकी छोटी सी सेना का सामना उनके अब तक के सबसे शक्तिशाली दुश्मन से होना था."
लेकिन उससे पहले, नवरोज़ का उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया गया, जैसा कि उन्होंने बाद में भी हमेशा किया. उन्होंने अपने अधिकारियों की अच्छी तरह देखभाल की और घोड़ों और हथियारों सहित बहुमूल्य उपहार बांटे.
इसके अलावा, इस युद्ध की तैयारी के लिए, नादिर शाह ने बड़े पैमाने पर अभ्यास शुरू कराये, जिसका एक यूनानी व्यापारी ने इतिहास के लिए आँखों देखा हाल बताया है.
अभ्यास में लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वालों को सौ या एक सौ पचास सैनिकों का कमांडर नियुक्त किया जाता था, भले ही वह कोई साधारण सैनिक ही क्यों न हों. इतिहासकारों का कहना है कि वह अच्छे अधिकारियों का चयन सुनिश्चित करते थे और पदोन्नति केवल योग्यता के आधार पर होती थी.
वह लिखते हैं कि अभ्यास में "सैनिक एक-दूसरे पर अलग-अलग पोज़िशन से हमला करते थे, सर्कल और काउंटर सर्कल बनाते... हमला करते, बिखरते और फिर दोबारा उसी पोज़िशन पर इकट्ठा होते."
इन अभ्यासों में असली हथियारों का इस्तेमाल किया जाता था और इस बात का ध्यान रखा जाता था कि कोई ज़ख़्मी न हो. घोड़े पर सवार हो कर विभिन्न तकनीकों का अभ्यास किया जाता था. प्रत्येक घुड़सवार अलग-अलग हथियारों के साथ भी अलग-अलग अभ्यास करता था."
नियंत्रण और अनुशासन का यह हाल था कि बार-बार अभ्यास करने के बाद, युद्ध में नादिर शाह और उसके अधिकारियों के बीच ऐसा सामंजस्य होता था, जैसे कि वे नादिर शाह के दिमाग से चल रहे हों. यूनानी व्यापारी ने लिखा है कि अभ्यास के दौरान नादिर शाह स्वयं हर क्रिया का हिस्सा बनते थे और युद्ध में भी उनका यही उसूल था.
नादिर शाह और तहमास्प मई में हेरात पर हमले के लिए रवाना हुए. अब्दाली अफ़ग़ान भी स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, अपने मतभेदों को भूल कर अल्लाह यार ख़ान के नेतृत्व में एकजुट हो गए. दोनों सेनाओं का हेरात के बाहर पचास किलोमीटर दूर आमना सामना हुआ .

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सफ़विद साम्राज्य की राजधानी इस्फ़ाहान से अफ़ग़ानों की वापसी
नादिर शाह को इस युद्ध में सफलता मिली. बहुत से अफ़ग़ान सरदारों ने आगे आ कर अधीनता की घोषणा कर दी. तहमास्प शाह और उनके दरबारी ख़ुश नहीं थे लेकिन नादिर शाह ने इन सरदारों का स्वागत किया और भविष्य में अब्दाली अफ़ग़ान नादिर शाह के बहुत विश्वसनीय सहयोगी और सेना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा साबित हुए.
इस अभियान ने ईरानियों में विश्वास पैदा कर दिया था और वे अब अपने साम्राज्य की वापसी के लिए ग़लज़ई अफ़ग़ानों का सामना करने के लिए तैयार थे.
29 सितंबर, 1729 को दोनों सेनाओं का आमना-सामना हुआ. अफ़ग़ान पराजित हुए. अंत में, 9 दिसंबर, 1729 को, नादिर शाह ने इस्फ़ाहान के बाहर एक भव्य समारोह में तहमास्प शाह का स्वागत किया. यानी नादिर शाह और तहमास्प शाह ने अफ़ग़ानों से सफ़विद राजधानी वापस ले ली.
एक्सॉर्डी लिखते हैं कि उस समय यूरोप के युद्धों की तुलना में एशिया और मध्य पूर्व के युद्धों के बारे में आधिकारिक स्रोत कम हैं. नादिर शाह के अभियानों के बारे में लिखने वालों में से अधिकांश गैर-सैन्य थे, और उनके अनुसार, एक संभावना यह थी कि नादिर शाह ख़ुद ऐसा चाहते थे, ताकि उनके युद्ध के तरीक़े के बारे में सब को पता न चले.
नादिर शाह की सैन्य क्रांति और उसकी क़ीमत
नादिर शाह के अभ्यास और बारूदी हथिरयारों पर निर्भरता और स्थायी आधार पर सैनिकों की भर्ती की एक क़ीमत थी. इसका मतलब था कि सैनिकों के अभ्यास के लिए हर समय उपलब्ध होने और विभिन्न तरीक़ों से प्रोत्साहित करने की आवश्यकता थी. नई तकनीक और हथियारों का फ़ायदा उठाने के लिए उनका सेना के साथ साथ रहना ज़रूरी था.
ऐसा नहीं था कि उन्हें नया हथियार दे कर घर भेज दिया जाये और वो वापस ही न आएं. उन्हें अच्छा और समय पर वेतन देना ज़रूरी था. और ऐसे में उनके कपड़े, रहने और खाने की व्यवस्था करना भी जरूरी था. ख़राब होने वाले हथियारों की जगह नया हथियार उपलब्ध कराना ज़रूरी था. अच्छे घोड़ों की ज़रूरत थी जो सवार और हथियारों का बोझ उठा सके. और बारूदी हथियारों का फ़ायदा उठाने के लिए बड़ी संख्या में बंदूकचियों की आवश्यकता थी.
नादिर शाह की सेना हर समय बढ़ रही थी. संक्षेप में, उसकी सेना विनाशकारी हद तक महंगी थी. इस सेना को बनाए रखने के लिए नादिर हमेशा आय के नए स्रोतों के बारे में सोचते रहते थे. और इसके लिए उनके नियंत्रण वाले क्षेत्रों के लोगों पर भारी टैक्स और जबरन भुगतान का लगातार बोझ था.
"सेना में वृद्धि, अभ्यास और बारूदी हथियार पर नई निर्भरता ... ख़र्च में भारी वृद्धि, यह सब यूरोप में उस समय से 150 साल पहले हुए परिवर्तनों की तरह था."
एक्सॉर्डी का कहना है कि यूरोप में ये सभी परिवर्तन और नई युद्ध आवश्यकताएं वहां की शासन प्रणाली में सुधार और आर्थिक संसाधनों में वृद्धि की वजह बनी. लेकिन नादिर शाह की सैन्य क्रांति इतनी देर तक नहीं रही कि यूरोप जैसे परिवर्तनों की वजह बनती.

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नादिर शाह और उनके बेटे की सफ़विद शहज़ादियों से शादी
तहमास्प शाह चाहते थे कि नादिर शाह पराजित होने वाले अफ़ग़ान शासक अशरफ़ ग़लज़ई का पीछा करे और उनसे उन शहज़ादियों को भी बरामद करे जिन्हें वह हार के बाद फ़रार होते हुए अपने साथ ले गए थे.
इतिहासकारों का कहना है कि नादिर शाह ने ख़ूब सौदे बाज़ी के बाद सफ़विद शहज़ादियों को बरामदगी के लिए ग़लज़ई सुल्तान अशरफ़ का पीछा करने का फ़ैसला किया, लेकिन बदले में उन्होंने ख़ुरासान, करमान और कुछ अन्य क्षेत्रों के अलावा पूरे राज्य में टैक्स इकठ्ठा करने का अधिकार भी हासिल किया, ताकि सेना के ख़र्च को पूरा किया जा सके.
शाह तहमास्प के साथ इस समझौते को मज़बूत करने के लिए यह भी तय किया गया था कि तहमास्प की दो बहनों से उनकी और उनके बेटे रज़ा क़ली शाह की शादी होगी. नादिर शाह की शादी उनमें से एक रज़िया बेगम से हुई. इस तरह, नादिर शाह ईरानी साम्राज्य के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों के वास्तविक शासक बन गए थे और उनकी धन और क़ानूनी स्थिति की दो ज़रूरतें भी पूरी हो गई.
नादिर शाह हमेशा आर्थिक मामलों पर कड़ी नज़र रखते थे. आने वाले वर्षों में, उन्होंने टैक्स के मामलों के लिए अधिकारियों, इंस्पेक्टरों और जासूसों का जाल बिछाया, और सफ़विद साम्राज्य की व्यवस्था को और मज़बूत किया. नादिर शाह की ज़रूरतें बहुत ज़्यादा थीं और कई बार बिना किसी चेतावनी के दुगुने टैक्स की मांग भी की गई और भुगतान न करने पर सख़्त सज़ाएं दी जाती थीं.
अपनी मांग स्वीकार किए जाने के बाद, नादिर शाह 24 दिसंबर, 1729 को बीस से पच्चीस हज़ार सैनिकों की सेना ले कर इस्फहान से अशरफ़ का पीछा करने के लिए निकले. शिराज के पास उनका आमना सामना हुआ. एक बार अफ़ग़ानों ने पूरे ज़ोर से हमला किया, लेकिन वे नादिर शाह की सेना के अनुशासन और बारूदी हथियारों का सामना नहीं कर सके. अशरफ़ वहां से फ़रार हो गए, लेकिन फिर एक जगह से दूसरी जगह भागते हुए अपने पुराने दुश्मनों के हाथों मारे गए.

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ईरानी साम्राज्य की पश्चिमी सीमाओं की बहाली
नादिर की पहली प्राथमिकता ऑटोमन पर हमला करके ईरान की पश्चिमी सीमाओं को बहाल करना था. इसके बाद आगे बढ़ते हुए, उन्होंने साल 1735 में यरवान में ऑटोमन सेना को हरा दिया, और उन्हें शांति समझौता करने पर मजबूर किया, जिसके तहत ईरान की पुरानी सीमाओं को बहाल कर दिया गया और ऑटोमन सेना पीछे हट गई.
इस युद्ध में, रूस ने ऑटोमन के ख़िलाफ़ नादिर का साथ दिया और वह ख़ुद भी कैस्पियन सागर के ईरानी क्षेत्रों से पीछे हट गया, जिनपर उसने सफ़विद साम्राज्य पर अफ़ग़ान आक्रमण का फ़ायदा उठाते हुए क़ब्ज़ा कर लिया था.
साल 1735 तक, कंधार के अलावा, नादिर शाह ने सफ़विद साम्राज्य का नियंत्रण उसके सभी पुराने क्षेत्रों पर बहाल कर दिया था. और फिर, सभी दरबारियों, क़बायली सरदारों और ईरान के उच्च अधिकारियों की सहमति से, मोघन में एक सभा में ख़ुद को नया बादशाह स्वीकार करा लिया. उनका कोई विरोध नहीं हुआ था. निजी सभा में सफ़विद राजशाही को बनाए रखने के पक्ष में बोलने के जुर्म में एक मुल्ला की हत्या करा दी गई थी."
"ग़ौरतलब है कि आख़िरी समय में अत्याचारी शासक के रूप में प्रसिद्ध होने के बावजूद और उस एक मुल्ला के उदाहरण के अलावा, उन्होंने अपने बाद और पहले आने वालों के विपरीत राजनीतिक आधार पर लगभग अहिंसक रूप से सत्ता हासिल की."
"वह हत्या के ज़रिये नहीं, बल्कि रणनीति, प्रोपेगंडा, होशियारी, मजबूत सैन्य समर्थन और सबसे बढ़कर जंगी सफलताओं के आधार पर तहमास्प को सत्ता से हटा कर ख़ुद बादशाह बने."

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नादिर शाह ने दिल्ली की ओर रुख़ किया
नादिर शाह के सिंहासन पर बैठने से साम्राज्य की पश्चिमी सीमा सुरक्षित थीं और ईरान पर उनका पूरा नियंत्रण था. इस स्थिति में, उन्होंने पूर्व की ओर कंधार का रुख़ किया. इस अभियान के ख़र्च की साम्राज्य के भीतर लोगों ने भारी क़ीमत अदा की और देश के कई हिस्सों में अर्थव्यवस्था का पहिया रुक गया.
कंधार में सफलता के बाद, उन्होंने इस बहाने दिल्ली की ओर रुख़ किया कि मुगल साम्राज्य ने उन अफ़ग़ानों को पनाह दी थी, जो उसके यहां वांटेड थे. उन्होंने ईरानी और मुगल साम्राज्यों के बीच पुरानी सीमा को पार किया, काबुल पर विजय प्राप्त की और उनकी अगली मंज़िल दिल्ली थी.
दिल्ली के उत्तर में करनाल में मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह की सेना को हराकर मार्च 1739 में दिल्ली पहुंचे. इस दौरान कुछ दंगे हुए जिनमें कुछ ईरानी सैनिक मारे गए. एक्सॉर्डी लिखते हैं, कि "अपने घर से दूर, मुग़ल साम्राज्य की संपत्ति के इतने क़रीब वह स्थिति पर नियंत्रण नहीं खो सकते थे." नादिर शाह ने "नरसंहार का आदेश दिया जिसमें एक अंदाज़े के अनुसार 30 हज़ार लोग मारे गए, जिनमें से अधिकांश निर्दोष नागरिक थे."
"इससे पहले मैदान-ए-जंग के अलावा नादिर शाह ने अपने सारे लक्ष्य ग़ैर-ज़रूरी ख़ून ख़राबे के बग़ैर हासिल किये थे. लेकिन दिल्ली के बाद उन्होंने शायद यह फ़ैसला किया कि उनके पहले वाले सिद्धांत अब ग़ैर ज़रूरी हो गए थे.

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नादिर शाह ने दिल्ली से बड़ी मात्रा में आभूषण, सोना और चांदी के साथ सिंधु नदी के पश्चिम के सभी मुग़ल क्षेत्र भी तोहफ़े में हासिल किये. हासिल की गई पूरी संपत्ति की कुल क़ीमत लगभग सात सौ मिलियन रूपये थी. अनुमान के मुताबिक़ यह पैसा फ्रांस की सरकार का साल 1756 से 1763 तक चलने वाले युद्ध पर होने वाले ख़र्च से भी अधिक था, जिसमें ऑस्ट्रिया को दी जाने वाली सब्सिडी और समुद्री और ज़मीनी युद्ध शामिल थे."
नादिर शाह को मिलने वाले सबसे मशहूर गहनों में कोहिनूर, दरिया-ए-नूर और ताज माह नामक हीरे थे, जिनका आने वाले दशकों में अपना एक ख़ूनी इतिहास था. उनका दिल्ली पर हमला करने का उद्देश्य ईरान के पश्चिम में सैन्य अभियानों के लिए आवश्यक नकदी प्राप्त करना था, जो उनके सिंहासन तक ईरान के पास नहीं था.
नादिर शाह ने मुग़ल बादशाह को सिंहासन से नहीं हटाया और वापस लौटने से पहले उन्हें कई उपहार भेंट किए और अपने हाथों से उनके ताज़ में क़ीमती ज़ेवर सजाया, जिसका उद्देश्य उनकी पूर्ण संप्रभुता की पुष्टि करना था. जवाब में, मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह ने उन्हें तिब्बत और कश्मीर से लेकर समुद्र तक सिंध के सभी पश्चिमी हिस्से उन्हें पेश कर दिए. "यह सौदा निश्चित तौर पर पहले से तय थी."
यूरोप और रूस के शाही दरबार में नादिर शाह की गूंज
मुग़ल साम्राज्य के ख़िलाफ़ जीत ने नादिर शाह की 'विश्व प्रसिद्धि को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया.' "भारत में लगभग दो महीने की कहानी व्यवसायी और कारोबारियों के ज़रिये दुनिया के कोने कोने में में फ़ैल गई. भारत में यूरोपीय कंपनियों के प्रतिनिधियों और पादरियों से नादिर शाह के बारे में रिपोर्ट मांगी गई."
एक्सॉर्डी लिखते हैं कि नादिर शाह की कार्रवाइयां लंदन के अख़बारों की शोभा बन गईं. "ऑटोमन और रूसी शाही दरबारों में कुछ ही समय बाद हाथियों और गहनों सहित नादि रशाह की तरफ़ से भिजवाये गए उपहार प्राप्त हुए," एक्सॉर्डी लिखते हैं रूस को भिजवाए गए गहने आज भी सेंटपीटर्ज़बर्ग के म्यूज़ियम में सुरक्षित हैं.
बात यहीं नहीं रुकी, कुछ महीनों में, नादिर शाह के बारे में विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में किताबें प्रकाशित होने लगीं, और लगभग एक पीढ़ी के बाद तक भी, हर कोई नहीं तो, कम से कम शिक्षित वर्ग, उनका नाम जानता था.
"दिल्ली नादिर शाह के जीवन की बुलंदी थी." लगभग दो महीने रुकने के बाद, वह 16 मई, 1739 को दिल्ली से रवाना हो गए.
लेकिन दिल्ली के बाद नादिर शाह टूट-फूट का शिकार हो गए. वह बीमार हो गए, क्रूरता, क्रोध और लालच ही अब उनका व्यक्तित्व था और अंत में उनके ही अधिकारियों ने उनकी हत्या कर दी.
नादिर शाह: उदय के बाद पतन
भारत से वापस लौटने पर, नादिर शाह को पता चला कि उनके बेटे रज़ा क़ली ने, जिन्हें वह अपनी अनुपस्थिति में अपना उत्तराधिकारी बना कर गए थे, ने पूर्व सफ़विद बादशाहों तहमास्प और अब्बास को मरवा दिया था. इसके अलावा, नादिर शाह अपने बेटे के विशाल दरबार से भी नाख़ुश थे. नादिर शाह ने रज़ा क़ली से डिप्टी का पद छीन लिया. इसके बाद पिता-पुत्र के रिश्ते में दरार पड़नी शुरू हो गई और नादिर शाह के दिमाग़ में यह बात बैठ गई कि उनका बेटा उनके ख़िलाफ़ साज़िश कर रहा है.
भारत के बाद, नादिर शाह ने तुर्किस्तान के लिए एक सफल अभियान किया और दाग़िस्तान की ओर कूच किया, लेकिन वहां उन्हें असफलता मिली. उनकी सेना में भोजन की कमी हो गई थी. तब तक नादिर शाह का स्वास्थ्य भी ख़राब हो चुका था. उन्हें शायद "जिगर की बीमारी हो चुकी थी जो मलेरिया से शुरू हुई और ज़्यादा शराब पीने से और ज़्यादा बिगड़ गया."
एक्सॉर्डी लिखते हैं कि इसके साथ साथ उनके अंदर का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था और मानसिक समस्या भी शुरू हो गई थी. इसी बीच, साल 1742 में, उन्हें बताया गया कि उनके बेटे रज़ा क़ली ने उनकी हत्या करने की योजना बनाई है. रज़ा क़ली ने इन आरोपों का खंडन किया लेकिन नादिर शाह को विश्वास नहीं हुआ और नादिर शाह ने उनकी आँखें निकलवा दी, जिसके बाद उनके सिंहासन पर बैठने का सवाल हमेशा के लिए समाप्त हो गया.
"दाग़िस्तान में असफलता, उनकी बीमारी और सबसे बढ़कर, अपने बेटे की आँखें निकलवाने के पछतावे ने उनके जीवन में ऐसा संकट पैदा कर दिया कि इसने उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ दिया और वह फिर कभी इससे बाहर नहीं निकल सके."
एक्सॉर्डी लिखते हैं कि शायद बचपन में उन्होंने जो ग़रीबी और हीनता महसूस की थी, उसके कारण नादिर शाह का परिवार हमेशा उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था. उनका कहना है कि तब तक नादिर शाह के लिए उनके परिवार की आपसी वफ़ादारी एक अटल पहलू था और इसी विश्वास ने वह आधार प्रदान किया जिस की मदद से उन्होंने एक साम्राज्य की स्थापना की थी. "अब यह नींव हिल गई थी, और उनमे से पहले जैसी मज़बूती ख़त्म हो गई थी... और उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य तेज़ी से बिगड़ता गया.
दाग़िस्तान से असफल होने के बाद, कुछ रिपोर्टों के अनुसार, एक तय शुदा योजना के तहत ऑटोमन इराक़ में कार्रवाई के लिए नई सेना तैयार की गई जो "अपने समय में किसी भी देश की सबसे शक्तिशाली सेना थी."
काबुल से अचानक लड़काना जाना पड़ा
दिल्ली से ख़राब मौसम में कई नदियों को पार कर के नादिर शाह 2 दिसंबर, 1739 को काबुल पहुंचे. मंज़िल तो पश्चिम में उनका साम्राज्य था लेकिन उन्हें एक बार फिर भारत का रुख़ करना पड़ा. सिंध के गवर्नर ख़ुदा यार ख़ान ने उनकी अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.
शायद ख़ुदा यार ख़ान ने सोचा था कि अफ़ग़ानिस्तान के बर्फ़ीले पहाड़ों से सिंध के गर्म रेगिस्तान और मैदानी इलाक़ों का सफ़र बहुत मुश्किल होगा. लेकिन नादिर शाह उन लोगों में से नहीं थे जो इस तरह की बात को नज़रअंदाज़ करते.
नादिर शाह ने दो महीने में हज़ार मील की यात्रा करके सिंध पहुंचे और अंत में ख़ुदा यार ख़ान उमरकोट में गिरफ़्तार हो गए और उन्हें अपने ख़ज़ाने से भी हाथ धोना पड़ा. जिनमे "ईरान के सफ़विद साम्राज्य के अंतिम बादशाह शाह सुल्तान हुसैन का कुछ क़ीमती सामान भी शामिल था, जो ग़लज़ई अफ़ग़ानों के माध्यम से उन तक पहुंचा था.

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'दुनिया की सबसे बड़ी सेना'
नादिर शाह ने सैकड़ों नई तोपों के साथ अपने तोपख़ाने को सबसे आगे भेजा. उनकी सेना के वेतन का रिकॉर्ड रखने वाले एक अधिकारी के अनुसार, साल 1743 के इस अभियान की शुरुआत में, उनकी सेना में 3 लाख 75 हज़ार सैनिक थे, जिनमे शिया ईरानियों की एक बहुत छोटी संख्या थी. सेना में "60 हज़ार तुर्कमान और उज़बेक, 70 हज़ार अफ़ग़ान और भारतीय, 65 हज़ार ख़ुरासानी और पश्चिमी ईरान से 1 लाख 20 हज़ार और अज़रबैजान और क़ाफ़ पर्वत से 60 हज़ार सैनिक शामिल थे."
यह सेना यूरोप की दो बड़ी शक्तियों, ऑस्ट्रिया और प्रशिया दोनों को मिलकर भी उनसे बड़ी थी. लेकिन इसकी क़ीमत भी उतनी ही अधिक थी.
दिल्ली के अभियान के बाद, ईरान में तीन साल तक टैक्स की छूट और इससे पैदा होने वाली आर्थिक समृद्धि अब अतीत का हिस्सा बन चुकी थी.
एक्सॉर्डी लिखते हैं कि नादिर शाह जानते थे कि इतने बड़े नए अभियान के क्या प्रभाव होंगे, लेकिन अब उन्हें शायद इसकी परवाह नहीं थी. साल 1740 के दशक में बग़दाद के अभियान से पैदा हुई मुश्किलें और बढ़ती गईं. अर्थव्यवस्था रुक गई और टैक्स लेने वालों से बचने के लिए लोग अपने घरों को छोड़कर भागने और जंगलों में छिपने के लिए मजबूर हो गए. लोग बड़ी संख्या में बग़दाद, बसरा और पूर्व में भारत की तरफ़ प्रवास करने के लिए मजबूर हो गए.
विभिन्न अनुमानों के अनुसार, "साल 1722 से पहले की तुलना में व्यापार पांच गुना कम हो गया." साल 1736 में नादिर शाह के कंधार कूच करने के बाद से साम्राज्य में "अपेक्षाकृत शांति" थी, लेकिन टैक्सों, निराशा और समस्याओं ने नए विद्रोह को जन्म देना शुरू कर दिया.
"नादिर शाह की कहानी में सेना और उसके लिए टैक्स लागू करना एक स्थायी पहलू है."

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ऑटोमन साम्राज्य निशाने पर था लेकिन नादिर शाह ने सेना को पीछे हटने का आदेश दे दिया
नादिर शाह ने ऑटोमन साम्राज्य में बग़दाद, बसरा, सुमारा, नजफ़, कर्बला और शत अल-अरब के आसपास कार्रवाई का आदेश दिया. कारकुक और मोसुल की घेराबंदी का आदेश दिया गया.
युद्ध लंबा खिंच रहा था कि अचानक नादिर शाह को ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तान की तरफ़ से एक संदेश मिला कि अगर वह उनकी सीमा से पीछे हट जाए तो वह शांति के लिए बातचीत करने के लिए तैयार है. इतिहासकार इस संदेश से ज़्यादा इस बात पर हैरानी जताते हैं कि नादिर शाह ने इस संदेश के जवाब में 20 अक्टूबर, 1743 को अपनी सेना को मोसुल से पीछे हटने का आदेश दे दिया. बसरा की घेराबंदी अभी भी चल रही थी लेकिन इस्तांबुल में ख़ूब ख़ुशियां मनाई गई.
सभी हैरान थे, कि क्या यह वही नादिर शाह था जिसने कुछ आरसे पहले एक शिकायत मिलने पर काबुल से सिंध तक सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र किया था?
"ऑटोमन इराक़ में उनके पास इतनी बड़ी सेना थी जिसकी उन्होंने पहले कभी कमांड नहीं की थी. इसमें भारतीय अभियान के तज़ुर्बेकार सिपाही भी शामिल थे. अकेले मोसुल के बाहर, उनकी कमान में 2 लाख सैनिक थे."
"यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अपने आकार और क्षमता के मामले में उस समय शायद यह दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना थी." एक्सॉर्डी लिखते हैं कि यह तो ऑटोमन साम्राज्य के गले में फंदा डाल कर घुटने टेकने पर मजबूर करने का अभियान था जैसा इससे पहले बुख़ारा और दिल्ली में हो चुका था."
लेकिन नादिर शाह तो 40 दिनों की घेराबंदी के बाद ही पीछे हट गए.
इतिहासकार कठिन युद्ध परिस्थितियों और ऐसे कई स्पष्टीकरण देते हैं, लेकिन नादिर शाह के लिए यह सब कोई नई बात नहीं थी और उन्होंने ऐसी कठिनाइयों पर काबू पाकर ही अपनी जगह बनाई थी. उनकी बीमारियों का भी ज़िक्र किया जाता है लेकिन वो भी नई बात नहीं थी. यह भी कहा गया है कि घेराबंदी वाला युद्ध शायद उनकी ताक़त नहीं थी, उन्हें मैदान पर लड़ना और चाल चलना पसंद था.
लेकिन एक्सॉर्डी का मनना है, कि उनमे युद्ध करने की इच्छा समाप्त हो गई थी. उनमे अब इस विशाल सेना की कमान संभालने का फ़ोकस नहीं था.
"हो सकता है कि यह केवल एक संयोग न हो कि नादिर शाह ने मोसुल की घेराबंदी को ख़त्म करने का आदेश उन्हीं दिनों में दिया था जब ठीक एक साल पहले उन्होंने अपने बेटे रज़ा क़ली ख़ान की आंखें निकलवाई थी."
वे इसे नादिर शाह के जीवन का 'टर्निंग पॉइंट' कहते हैं. जब, व्यवहारिक तौर पर उनकी विजय का दौर "धमाके की बजाय ख़ामोशी से समाप्त हो गया."
"उनकी तलवार, उनकी सेना सब मौजूद थीं, उतनी ही सतर्क और भयानक और उनके इशारे पर कुछ भी करने और कहीं भी जाने के लिए तैयार... ज़्यादातर ऑटोमन इराक़ उनके नियंत्रण में था और इस्तांबुल की ओर बढ़ने की संभावना बहुत वास्तविक थी... इस्लामी दुनिया का नेतृत्व उनके निशाने पर था. लेकिन वो अपने उस बेटे को तबाह कर चुके थे जिसे वह हमेशा से ये महानता विरासत में देना चाहते थे."
एक दिन अचानक वह अपनी सेना और युद्ध अभियान को छोड़ कर अपने हरम की कुछ महिलाओं, घुड़सवार सेना के एक छोटे से सुरक्षा दस्ते के साथ शिया मज़ारों की ज़ियारत के लिए कर्बला और नजफ़ रवाना हो गए.
इन ज़ियारतों (तीर्थयात्राओं) के दौरान उनसे मिलने आए ऑटोमन साम्राज्य के एक अधिकारी ने एक रिकॉर्ड छोड़ा है कि 'हालांकि नादिर शाह अभी भी ख़ूबसूरत थे, लेकिन उनके चेहरे पर उम्र और मानसिक भ्रम के लक्षण दिखाई दे रहे थे, उनकी आंखें पीली थीं और उनके कई दांत निकल चुके थे. और वह अस्सी साल के लग रहे थे."
एक्सॉर्डी लिखते हैं कि उन्हीं दिनों एक फ्रांसीसी पादरी ने भी उनका इलाज किया था और कहा था कि शायद वह पीलिया से पीड़ित थे.
नादिर शाह के युद्ध अभियान यहीं समाप्त नहीं हुए. लेकिन अब उनकी कहानी में उनके नागरिकों की समस्याएं और उन पर पड़ने वाले बोझ और नादिर शाह की क्रूरता का पहलू भारी पड़ने लगा था.
नादिर शाह की आख़िरी रात
इतिहासकार हुमायूँ कोटज़ियन लिखते हैं कि साल 1746 में ऑटोमन साम्राज्य के साथ समझौते के बाद, दोनों साम्राज्यों ने साल 1639 की सीमाओं को स्वीकार कर लिया था. हालांकि, वे लिखते हैं कि इस बीच नादिर शाह का अत्याचार दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था.
उन्होंने लिखा, कि "एक विद्रोह को कुचलने के लिए सिस्तान जाते हुए, उनमें मानसिक असंतुलन के लक्षण दिखाई दिए." नादिर शाह का रवैया इतना अजीब हो गया कि उनके परिवार और क़रीबी सहयोगियों को अपना जीवन ख़तरे में दिखाई देने लगा.
और फिर एक दिन नादिर शाह ने अपने ईरानी कमांडरों से ख़तरा महसूस करते हुए अब्दाली अफ़ग़ानों को अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंप दी और ईरानी कमांडरों को क़त्ल करने का आदेश दे दिया.
यह 19 जून, 1747 की शाम थी. माइकल एक्सॉर्डी लिखते हैं कि नादिर शाह ने अपनी सेना में 4 हज़ार सैनिकों के 24 वर्षीय कमांडर अहमद ख़ान अब्दाली को बुलाया.
एक्सॉर्डी लिखते हैं कि जब नादिर शाह ने साल 1738 में कंधार पर विजय प्राप्त की, तो युवा अहमद ख़ान अब्दाली उनकी एक जेल में क़ैद थे. ईरानी सेना में अहमद ख़ान अब्दाली की वर्तमान स्थिति नादिर शाह के कारण थी.
नादिर शाह ने उन्हें बताया कि उसे संदेह है कि उसके ईरानी गार्ड उसे मारना चाहते हैं और उसने अहमद ख़ान अब्दाली को अगली सुबह उन गार्ड्स को गिरफ़्तार करने और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संभालने का आदेश दिया. लेकिन ये बातचीत शायद ईरानी गार्डों ने सुन ली थी.
नादिर शाह के ईरानी दस्ते ने फ़ैसला किया कि उनके पास केवल एक यही रात है. ऑपरेशन के लिए 70 भरोसेमंद दरबारियों और अधिकारियों का एक ग्रुप बनाया गया. नादिर शाह उस रात अपने सामान्य तंबू के बजाय अपनी पत्नी चकी के तंबू में सोने गए. इतिहासकारों का मानना है कि उस रात की घटनाओं का विवरण उन तक चकी की ही वजह से पहुंचा है.
नादिर शाह चकी से यह कह कर बिस्तर पर लेट गए कि अगर वह गहरी नींद सो जाए, तो उसे जगा दिया जाये. जब हमलावर हरम के दरवाज़े पर गए तो उनमें से ज़्यादातर ने आगे आने से इनकार कर दिया. केवल कुछ ही आगे बढ़े और विरोध करने वाले एक अश्वेत ट्रांसजेंडर को मार डाला. शोर से चकी की आंख खुली और उसने नादिर शाह को भी जगाया. नादिर शाह ने तुरंत लपक कर अपनी तलवार पकड़ ली, लेकिन उनका पैर किसी चीज में उलझ गया और वह गिर पड़े. और उसी स्थिति में, एक हमलावर सालार ख़ान ने उनकी गर्दन और कंधे के बीच वार किया और उनका हाथ काट दिया लेकिन फिर वह ख़ुद ही बदहवास हो गया.
"नादिर शाह ज़मीन पर पड़े हुए थे और ख़ून तेज़ी से बह रहा था. उन्होंने उठने का असफल प्रयास किया. उन्होंने हमलावरों से न मारने की अपील की. लेकिन एक अन्य हमलावर, मोहम्मद ख़ान क़जर ने, आगे बढ़ कर एक झटके में उनका सिर धड़ से अलग कर दिया."
इसके साथ ही "नादिर शाह की कहानी गुमनामी से शुरू हो कर त्रासदी की तस्वीर बनती हुई क्रूर षड्यंत्रों, सैन्य सफलताओं, शानो शौक़त, और दौलतमंदी, गलतियों, निराशाओं, अत्यधिक क्रूर कार्रवाइयों के बाद और मानसिक पीड़ा से गुज़रकर मौत के मुंह में चली गई."
नादिर शाह की मृत्यु के बाद के दशक 'हिंसा, अराजकता और विनाश' की कहानी है. एक्सॉर्डी लिखते हैं कि उनकी सेना, जिसमें वो विभिन्न कमांडरों और जातियों के बीच प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करते थे, उनके बाद एक न रह सके. सिकंदर महान की सेना की तरह, उनकी सेना भी विभिन्न जनरलों में विभाजित हो गई, जिनमें अहमद ख़ान अब्दाली भी शामिल था, जिन्होंने दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की थी.
एक्सॉर्डी लिखते हैं कि नादिर शाह के शासनकाल में पहली बार उनके अधिकांश सैनिकों को बारूदी हथियार दिए गए थे और ड्रिल और ट्रेनिंग पर बहुत ज़ोर दिया जाने लगा, जिसकी शुरुआत यूरोप में एक सदी पहले हो चुकी थी. जैसे-जैसे सेना का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे इसका ख़र्च भी बढ़ गया और उन्होंने साम्राज्य की राज्य संरचना को भी और अधिक सक्रीय बनाने के लिए बदलाव किए. ये सब वो चीजें थीं जिन्हें आमतौर पर यूरोप की पहचान माना जाता था.
"अगर नादिर शाह और कुछ समय तक सत्ता में रह जाते और समझदारी से शासन करते, और उनके बाद सत्ता किसी सक्षम उत्तराधिकारी को स्थानांतरित होती, तो उनकी सफल सेना के ख़र्च के लिए ईरानी प्रशासन में सुधार और अर्थव्यवस्था बिलकुल बदल जाती, जैसा कि यूरोप में हो चुका था."
इससे ईरान में "एक ऐसा आधुनिक राज्य स्थापित हो सकता था, जो अगली सदी में शुरू होने वाली साम्राज्यवादी शक्तियों के हमले का सामना करने में सक्षम होता."
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