अमेरिका की वो जगह जहां महात्मा गांधी की अस्थियां रखने का दावा किया जाता है

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- Author, सविता पटेल
- पदनाम, कैलिफ़ोर्निया से, बीबीसी के लिए
74 साल पहले आज ही के दिन भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी.
भारत के बाहर शायद कैलिफ़ोर्निया ही एकमात्र ऐसी जगह जहां के एक आध्यात्मिक स्थल के बारे में दावा किया जाता है कि महात्मा गांधी की अस्थियों की राख का एक हिस्सा उनके पास रखा गया है.
हॉलीवुड से कुछ ही मिनट की दूरी पर गांधी वर्ल्ड पीस मेमोरियल स्थित है. परमहंस योगानंद ने साल 1950 में इसे बनवाया था. यह समंदर के दृश्य के साथ हरे-भरे बगीचों और झरनों के बीच स्थित है.
और यहाँ चीन का एक प्राचीन पत्थर का ताबूत है जिसमें कथित तौर पर महात्मा गांधी की राख पीतल और चांदी के बॉक्स में है.
साल 1948 में महात्मा गांधी के अंतिम संस्कार के बाद, उनकी राख को 20 से अधिक हिस्सों में बांट दिया गया था और पूरे भारत में भेज दिया गया ताकि देशभर के लोग उनके निधन का शोक मना सकें. राख के कुछ हिस्से देश के बाहर भी भेजे गए थे.
बापू की अस्थियों की काफ़ी मांग थी- तुषार गांधी
महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी कहते हैं, "बापू की अस्थियों की काफ़ी मांग थी."
बता दें कि महात्मा गांधी को लोग प्यार से 'बापू' भी कहते हैं, अगस्त 1947 में भारत को आज़ादी मिलने के कुछ ही महीने बाद उनकी हत्या कर दी गई थी.
तुषार कहते हैं कि उन्होंने करीब 20 साल पहले ये सुना था कि महात्मा गांधी की राख को लेक श्राइन में रखा जा रहा था. तुषार ने उनसे संपर्क किया था, लेकिन कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.
तुषार कहते हैं, "उन्हें रखना बापू की इच्छा के विरुद्ध जाता है क्योंकि उन्होंने (महात्मा गांधी) एक बार कहा था कि जब वह नहीं रहे, तो उनकी राख को नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उसका निपटान कर देना चाहिए."
लेकिन अब इस लेक श्राइन को चलाने वाले साधुओं में से एक ऋतानंद कहते हैं, "हम अपने गुरु के द्वारा स्थापित चीज़ों को नहीं पलटेंगे."
वो आगे कहते हैं कि ये राख योगानंद के लिए एक उपहार थी और जो लोग अपने अस्तित्व से जुड़े सवालों के लेकर परेशान हैं, उन्हें इससे शांति मिलती है.
ऋतानंद का कहना है कि उन्हें ये पता है कि महात्मा गांधी के परिवार के लोगों ने पहले भी राख को वापस करने या निपटाने के लिए अनुरोध किया है.
उनका कहना है कि उन्होंने राख वाले बॉक्स को कभी नहीं देखा है लेकिन एक वीडियो याद है जिसमें योगानंद उसे ताबूत में रखते हैं.
इसके अलावा दूसरा कोई सबूत नहीं है कि महात्मा गांधी की राख श्राइन में एक बॉक्स में रखी है.
माना जाता है कि ये राख पुणे के रहने वाले पब्लिशर और पत्रकार साथ ही योगानंद के मित्र वीएम नौले की तरफ़ से आई है.

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परमंहस योगानंद और महात्मा गांधी
परमहंस योगानंद का शुरुआती नाम मुकुंद लाल घोष था जो उत्तर प्रदेश में पैदा हुए थे बाद में वो अमेरिका चले गए और यहाँ उन्होंने लेक श्राइन शुरू किया.
उनकी आत्मकथा में महाराष्ट्र के वर्धा में स्थित महात्मा गांधी के आश्रम का ज़िक्र है. ये संक्षिप्त यात्रा साल 1935 में की गई थी. इसमें कहा गया है कि वो नेता (महात्मा गांधी) से मिले और यहाँ तक कि उन्हें और वहाँ के दूसरे लोगों को आश्रम में योग करके दिखाया.
उन्होंने महात्मा गांधी को "100 पाउंड के छोटे से संत जिससे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य का विकीर्ण होता है'' के तौर पर वर्णित किया है.
लेकिन आत्मकथा यह नहीं बताती है कि कैसे वीएम नौले ने गांधी की राख का दावा किया था. योगानंद की आत्मकथा में वीएम नौले की तरफ़ से ये लिखा गया दिखता है, "गांधी की राख के बारे में, मैं कह सकता हूं कि वो सभी महत्वपूर्ण नदियों और समुद्र में विसर्जित कर दिए गए हैं, भारत के बाहर कुछ भी नहीं दिया गया है, सिर्फ़ उन अस्थियों की राख को छोड़कर जो मैंने आपको भेजे हैं.''
ये सच नहीं हो सकता- तुषार गांधी
तुषार गांधी कहते हैं कि ये सच नहीं हो सकता है.
वो आगे कहते हैं, ''बापू की कुछ अस्थियां 1948 में ही दक्षिण अफ़्रीका में विसर्जित की गई थीं. उन्हें वहाँ आधिकारिक तौर पर भेजा गया था या कोई उन्हें अपने साथ ले गया था, हम नहीं जानते.''

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तुषार का कहना है, "मुझे नहीं पता कि किसने परमहंस योगानंद के लिए राख इकट्ठा किया और भेजा. कैबिनेट सदस्यों और उस समय के प्रख्यात गांधीवादियों की एक समिति इसके लिए (राख वितरित करने के लिए) प्रभारी थी."
महात्मा गांधी के अंतिम संस्कार के बाद अधिकांश अस्थियों को इलाहाबाद में प्रवाहित कर दिया गया था. इलाहाबाद में पवित्र गंगा नदी हैं और संगम है. परिवार के कई सदस्यों ने गंगा में अस्थियों को बहाया, ऐसा माना जाता है कि पवित्र नदी में अस्थियां बहाने से आत्मा को मोक्ष मिलता है.
महात्मा गांधी एक धर्मनिष्ठ हिंदू थे वो चाहते थे कि उनकी अस्थियों को ऐसे ही प्रवाहित किया जाए.
लेकिन अस्थियों के सभी हिस्सों को प्रवाहित नहीं किया गया था. बाद में अस्थियों के हिस्सों को कई जगह ले जाया गया.
साल 2019 में भारत के मध्य प्रदेश में महात्मा गांधी के अस्थि अवशेष के चोरी होने की ख़बर सामने आई.
तुषार गांधी कहते हैं कि अस्थि अवशेष का कुछ हिस्सा करीब एक दशक पहले दक्षिण अफ़्रीका भी लाया गया था. ''मेरे रिश्तेदारों ने उन्हें डरबन में विसर्जित कर दिया.''
वो बताते हैं कि इससे पहले, गांधी परिवार को एक म्यूजियम में भी अस्थियों का कुछ हिस्सा प्राप्त हुए. एक भारतीय कारोबारी ने ये दिया था, जिनके पिता महात्मा गांधी को जानते थे. इन अस्थि अवशेषों को साल 2008 में मुंबई में विसर्जित किया गया था.

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तुषार गांधी को प्रेस रिपोर्ट के जरिए से ये पता चला था कि एक पूर्व नौकरशाह के नाम पर ओडिशा के एक बैंक लॉकर में महात्मा गांधी की अस्थियों से भरा कलश रखा गया था. इन अस्थि अवशेषों को साल 1997 में त्रिवेणी संगम में विसर्जित किया गया था.
आगा खां पैलेस में है महात्मा गांधी के अस्थि अवशेष
महात्मा गांधी के अस्थि अवशेष का आख़िरी हिस्सा, पुणे के आगा खां पैलेस में है. ये उनकी पत्नी कस्तूरबा की समाधि के बगल में एक संगमरमर की संरचना में रखा गया है. कस्तूरबा गांधी का अंतिम संस्कार महल परिसर में ही हुआ था.
तुषार गांधी का कहना है कि वो उन कारणों को समझते हैं जिसकी वजह से कुछ लोग अस्थि के अवशेष को रखने की इच्छा रखते हैं.
वो आगे कहते हैं, "जब मैंने राख को त्रिवेणी संगम (1997 में) में विसर्जित किया, तो पीतल के कलश को रखने की इच्छा थी. लेकिन फिर मैंने सोचा - मैं निश्चित तौर पर इसे ध्यान से रखूंगा, लेकिन अगर बाद में किसी वक्त में इसका सही से ध्यान नहीं रखा गया तो क्या होगा? इसलिए मैंने इसे दिल्ली में राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय को दान कर दिया."
महात्मा गांधी को सम्मान देने का अधिकार हर किसी को है और तुषार गांधी इसका सम्मान करते हैं. वो ये भी मानते हैं कि लेक श्राइन राख को संभाल कर रखता है. लेकिन वो कहते हैं कि अगर इसको कभी भी अपवित्र किया गया तो परिवार आहत होगा. वो आख़िर में कहते हैं- "इसलिए, मेरा अनुरोध है कि अस्थि अवशेष का सम्मान से निपटारा किया जाना चाहिए.''
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