सोवियत भव्यता की भूमिगत दुनिया

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इमेज स्रोत, Taylor weidman

    • Author, टेलर वीडमैन
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

दंग करने वाला वैभव

सोवियत काल में यदि किसी शहर की आबादी दस लाख से ज़्यादा हो जाती थी तो वह शहर मेट्रो सेवा के योग्य मान लिया जाता था.

कम्युनिस्ट पार्टी के योजनाकार चाहते थे कि सोवियत नागरिकों की रोजमर्रा की ज़िंदगी शानदार हो. मेट्रो को वे इसका ज़रिया समझते थे, जिनमें हर रोज़ लाखों मुसाफिर यात्रा करते थे.

1977 में उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद सोवियत संघ का सातवां ऐसा शहर बना जिनके पास अपनी मेट्रो थी.

उज़्बेकिस्तान और सोवियत संघ के इतिहास को जीवंत करने के लिए भव्य थीम चुने गए. कला और स्थापत्य निर्धारित करने के बाद डिजाइनरों को काम सौंपा गया.

ताशकंद मेट्रो के स्टेशन अलग-अलग विषयों को प्रतिबिंबित करते हैं. कुछ स्टेशनों की गुंबदाकार छत और चित्रकारी की हुई टाइलें उज़्बेकिस्तान की सिल्क रोड मस्जिदों की याद दिलाती हैं.

अन्य स्टेशनों को झूमर और संगरमरमर से सजाया गया है जिससे यूरोपियन बॉलरूम का आभास होता है. लोनली प्लैनेट (ट्रैवेल गाइड बुक) ने इसे सबसे ख़ूबसूरत सोवियत मेट्रो प्रणालियों में से एक कहा है.

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सिल्क रोड का इतिहास

अलीशेर नवोई स्टेशन का नाम उज़्बेकिस्तान के मशहूर लेखक और कवि के नाम पर रखा गया है. यह ताशकंद मेट्रो का सबसे मशहूर स्टेशन है.

धनुषाकार गुंबद और नीली टाइलें मेट्रो के मुसाफिरों को उज़्बेकिस्तान की प्राचीन मस्जिदों और मदरसों के साथ सिल्क रोड के इतिहास की याद दिलाती हैं.

यह स्टेशन ताशकंद के सबसे व्यस्त स्टेशनों में से एक है. रोज़ाना की सवारियों के साथ-साथ इसमें बड़ी संख्या में सैलानी और स्थानीय लोग भी होते हैं, जो फोटोग्राफी में व्यस्त होते है. यहां हाल तक फोटो खींचने की मनाही थी.

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छिपा हुआ ऐश्वर्य

जब ताशकंद मेट्रो को बनाया गया तब इसके स्टेशनों पर फोटो खींचने की मनाही थी, क्योंकि इन स्टेशनों को सोवियत संघ के एटम बम रखने के लिए भी तैयार किया गया था.

सोवियत समय में जासूसी की आशंका के कारण सूचनाओं पर कड़ा नियंत्रण था और फोटोग्राफी पर बिल्कुल भरोसा नहीं किया जाता था.

ख़ास तौर पर जहां सेना के बुनियादी ढांचे थे और जहां बम रखे जाते थे उसके आसपास तस्वीरें उतारना प्रतिबंधित था.

1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद उज़्बेकिस्तान के पूर्व सोवियत पार्टी लीडर इस्लाम करीमोव ने सत्ता संभाली और उसी नीति को जारी रखा.

करीमोव के उत्तराधिकारी शावकत मिर्ज़ियोयेव ने निवेशकों और सैलानियों को आकर्षित करने के लिए सुधार की शुरुआत की और अर्थव्यवस्था को खोला.

सैलानियों को लुभाने में मेट्रो की क्षमता को महसूस करके सरकार ने 2018 में सैन्य ठिकाने होने का इनका टैग हटा दिया.

इस तरह फोटोग्राफी पर 41 साल से चली आ रही पाबंदियों का अंत हो गया.

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स्टेशन की सजावट

ताशकंद मेट्रो के स्टेशनों को विलक्षण तरीके से संगमरमर, ग्रेनाइट, कांच, सिरेमिक और एलाबास्टर से सजाया गया है. कई स्टेशनों के नाम से ही उनकी ख़ासियत का पता चल जाता है.

मिसाल के लिए, ओज़बेकिस्टन लाइन का कोस्मोनवट्लर स्टेशन सोवियत अंतरिक्ष यात्रियों को समर्पित है. यहां सोवियत अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास को जगह दी गई है.

इसी तरह, चिलोनज़ोर लाइन के पुश्किन स्टेशन पर रूस के मशहूर लेखक और कवि को सम्मान दिया गया है.

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अंतरिक्ष की होड़

कोस्मोनवट्लर स्टेशन की दीवार पर संसार के पहले अंतरिक्ष यात्री यूरी गागरिन का पोट्रेट सजा हुआ है.

गागरिन और शुरुआत के अंतरिक्ष यात्री सोवियत संघ के सबसे प्रमुख नायकों में से थे.

अंतरिक्ष को लेकर मची होड़ के दौरान वे सोवियत शक्ति और श्रेष्ठता के प्रतीक थे और रूसी प्रचार में उनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता था.

मेट्रो स्टेशन की दीवार पर गागरिन के साथ प्रमुख अंतरिक्ष यात्रियों के पोट्रेट लगाए गए हैं.

वे नीले और काले रंग की आभासी डिजाइन के बीच अंतरिक्ष में तैरते हुए से दिखते हैं. अंतरिक्षयात्री जब धरती के वातावरण से बाहर निकलते हैं तो उनको यही दो रंग नज़र आते हैं.

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सर्वहारा रुझान

ताशकंद मेट्रो में सोवियत संघ के मूल चरित्र का सम्मान करते हुए सर्वहारा वर्ग के काम को भी सराहा गया है.

पाख्ताकोर (जिसका शाब्दिक अर्थ है कपास चुनने वाला) स्टेशन की दीवार पर बड़े मोजाइक पर कपास की तस्वीरें उकेरी गई हैं.

सोवियत संघ ने उज़्बेकिस्तान को विशाल कपास उत्पादक देश के तौर पर विकसित किया था.

इसकी कृषि अर्थव्यवस्था में बदलाव किए गए थे और जलमार्गों को मोड़कर पानी पहुंचाया गया था. आख़िरकार यहां रूस की ज़रूरत का करीब 70 फीसदी कपास का उत्पादन होने लगा था.

इससे एक बार पर्यावरण संकट भी खड़ा हो गया था जब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी ताज़े पानी की झील अरल सागर सूखने लगी थी.

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सोवियत ट्रेनें

स्टेशनों पर इस ऐश्वर्य के नीचे मेट्रो का मूल चरित्र पूरी तरह सोवियत उपयोगितावादी है.

कई ट्रेनों में आज भी 81-717/714 क्लास की बोगियां लगी हैं जिनको 1970 के दशक में डिजाइन किया गया था. समूचे सोवियत संघ के मेट्रो में यही बोगियां आम हैं.

हर मेट्रो ट्रेन में 4 बोगियां लगी होती हैं और प्लेटफॉर्म की लंबाई अमूमन 100 मीटर होती है.

2013 तक नीले रंग में रंगी सोवियत काल की ऐसी 168 ट्रेनें चल रही थीं, लेकिन अब धीरे-धीरे नये मॉडल की ट्रेनें उनकी जगह ले रही हैं.

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सस्ती और लोकप्रिय

मेट्रो में सवारी की लागत मामूली है. एक बार यात्रा का ख़र्च करीब 1,200 उज़्बेक सोम (लगभग 0.10 पाउंड या 9 रुपये) आता है.

उज़्बेकिस्तान का गरीब तबका, जिसकी न्यूनतम मजदूरी 5,27,000 सोम (करीब 43.50 पाउंड) प्रति महीना है, भी इसमें सफर कर सकता है.

मेट्रो का विस्तार भी हो रहा है. 1984 में दूसरी लाइन खोली गई थी और 2001 में तीसरी लाइन चालू हो गई थी. अब उत्तरी जिलों को दक्षिण के हवाई अड्डे से जोड़ने की योजना है.

(मूल लेख आप यहां देख सकते हैं. बीबीसी ट्रैवलके दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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