जब कुवैत से एक लाख सत्तर हज़ार लोगों को सुरक्षित भारत लाया गया: विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
2 अगस्त, 1990 को तत्कालीन विदेश मंत्री इंदर कुमार गुजराल फ़िलीपींस के विदेश मंत्री अमारकम मंगलदास के सम्मान में दिन का भोज दे रहे थे. तभी कुवैत में भारत के राजदूत एके बुद्धिराजा का फ़ोन आया कि इराक़ ने कुवैत पर हमला कर दिया है.
उसी दिन कुवैत के शासक शेख़ अल-ज़बर अल-सबाह ने भागकर सऊदी अरब में शरण ले ली. तुरंत ही सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई गई जहाँ अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने एक मत से इराक़ के इस हमले की निंदा की.
उस समय कुवैत में क़रीब 2 लाख भारतीय रह रहे थे. चूँकि उन लोगों से संपर्क टूट गया था, ऐसे में भारत में रहने वाले उनके परिजन बहुत परेशान हो गए.
तुरंत ही राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक बुलाई गई जहाँ विदेश मंत्री इंदर कुमार गुजराल ने सुझाव दिया कि वो तुरंत मॉस्को, वाशिंगटन, अम्मान और बग़दाद की यात्रा पर जाएं.
उस वक्त उनके पास दो विकल्प थे. नंबर एक, कि वो अमेरिका को मनाएं कि वो इराक़ी सेना को कुवैत से निकालने के लिए कुवैत पर हमला न करें ताकि वहाँ रह रहे भारतीय सुरक्षित रहें. दूसरा विकल्प ये था कि वो इराक़ को मनाएं कि वो कुवैत में रह रहे भारतीयों को सुरक्षित भारत लाने में मदद करे.
गुजराल का अमेरिका मिशन फ़ेल हो गया. अमेरिकियों ने गुजराल के अनुरोध को मानने से इनकार कर दिया.
मॉस्को, वॉशिंगटन और अम्मान होते हुए गुजराल 19 अगस्त की तड़के सुबह बग़दाद पहुंचे. वो सबसे पहले भारतीय दूतावास गए जहाँ कुवैत से भागकर आए क़रीब 100 भारतीय पहुंचे हुए थे.

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गुजराल की सद्दाम हुसैन से मुलाक़ात
इंदर कुमार गुजराल अपनी आत्मकथा 'मैटर्स ऑफ़ डिस्क्रेशन- एन ऑटोबायोग्राफ़ी' में लिखते हैं, "सद्दाम हुसैन ने ख़ाकी वर्दी पहनी हुई थी और उनकी कमर पर पिस्टल लटक रही थी. मुझे देखते ही उन्होंने मुझे गले लगा लिया. ये तस्वीर दुनियाभर के अख़बारों में छपी और इससे हमारी स्थिति थोड़ी विचित्र हो गई क्योंकि इससे संदेश गया कि जिस सद्दाम हुसैन की पूरी दुनिया में निंदा हो रही थी उसको भारत का विदेश मंत्री गले लगा रहे थे."
"बातचीत के दौरान सद्दाम हुसैन ने मुझे बताया कि अगर उनपर हमला किया गया तो वो उसका मुंहतोड़ जवाब देंगे. उनकी नज़र में सोवियत संघ में अब वो ताकत नहीं रह गई थी जो एक ज़माने में हुआ करती थी."
"थोड़ी देर बाद मैं वहां के विदेश मंत्री तारिक अज़ीज़ से मिला और हमने कुवैत और इराक़ से भारतीय लोगों को वापस लाने की योजना को अंतिम रूप दिया."21 अगस्त की सुबह गुजराल को इराक़ के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का संदेश मिला कि वो उनसे तुरंत मिलना चाहते हैं.

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भारत के लिए धर्मसंकट की स्थिति
बाद में उस समय के संयुक्त सचिव (खाड़ी देश) और फिर कई देशों में भारत के राजदूत बने केपी फ़ेबियन ने 'फ़ॉरेन अफ़ेयर्स जनरल' को दिए इंटरव्यू में यह कहकर गुजराल का बचाव किया कि "अगर किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष आपको गले लगाना चाहे तो आप 'डक' तो नहीं कर सकते (आप इससे मना नहीं कर सकते). गुजराल का सद्दाम के गले लगना ग़लत हो या सही लेकिन सद्दाम वहाँ फँसे भारतीयों को अपने देश भिजवाने में मदद करने के लिए राज़ी हो गए."
लेकिन भारत को इसके लिए बड़े धर्मसंकट से भी गुज़रना पड़ा. उसके अधिकतर अरब दोस्तों ने इस हमले की कड़ी निंदा की.
उस समय संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि चिन्मय गरेखान बताते हैं, "मैंने भी सरकार को सलाह दी कि पूरे विश्व की तरह हमें भी सद्दाम हुसैन के इस हमले की निंदा करनी चाहिए. लेकिन मेरी सलाह नहीं मानी गई. भारत ने सिर्फ़ इस हमले पर दुख प्रकट किया."
"मुझे याद है जब उस समय के विदेश मंत्री इंदर कुमार गुजराल न्यूयॉर्क आए तो उन्होंने कुवैत के निर्वासित विदेश मंत्री शेख़ सबाह अल-अहमद से कहा कि हम 101 फ़ीसदी कुवैत के साथ हैं. इस पर कुवैती विदेश मंत्री ने तंज़ किया, 'एक्सलेंसी, आपका 100 फीसदी समर्थन भी चलेगा लेकिन हम चाहते हैं कि भारत जैसा महान देश इस हमले की निंदा तो करे'."

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गुजराल अपने विमान में 150 भारतीयों को स्वेदश लाए
22 अगस्त की दोपहर गुजराल बग़दाद से कुवैत पहुंचे. जब वो भारतीय मिशन के पास पहुंचे तो वहाँ पहले से ही क़रीब एक हज़ार भारतीय जमा थे.
वहाँ पर कोई ऊँची जगह नहीं थी, इसलिए गुजराल ने अपनी कार की छत पर खड़े होकर उन्हें संबोधित किया.
जैसे ही लोगों को पता चला कि गुजराल उन्हें वापस भारत ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्होंने 'भारत माता की जय' के नारे लगाने शुरू कर दिए.
गुजराल 23 अगस्त को रात 9 बजे दिल्ली के लिए रवाना हुए. उनके विमान में क़रीब 150 लोग उनके साथ बैठकर आए जिनमें अधिकतर गर्भवती महिलाएं और बच्चे थे.
गुजराल अपने साथ पत्रों का एक बहुत बड़ा बैग भी लाए जो कुवैत में रहने वाले भारतीयों ने भारत में रहने वाले अपने रिश्तेदारों के लिए दिए थे.

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विमानों को इराक़ जाने की अनुमति नहीं मिली
मंत्रिमंडल ने पहले तय किया कि वो भारतीयों को वापस लाने के लिए इराक़ में एक समुद्री जहाज़ भेजेगा लेकिन इराक़ ने भारतीय जहाज़ 'टीपू सुल्तान' को वहाँ जाने की अनुमति नहीं दी.
जब ये तय हुआ कि भारतीयों को लाने के लिए भारतीय वायुसेना के विमान भेजे जाएंगे तो इराक़ ने उसकी भी अनुमति नहीं दी.
उसकी शर्त थी कि भारतीय विमानों को तभी इराक़ में घुसने दिया जाएगा जब वो अपने साथ खाद्य सामग्री भरकर इराक़ आएं. तब तक इराक़ पर पूरी दुनिया ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे, इसलिए वहाँ खाद्य सामग्री ले जाने का सवाल ही नहीं उठता था.
शुरू में लगा कि शायद लोगों को कुवैत से बाहर निकालने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. लेकिन धीरे-धीरे वहाँ हालात बिगड़ने लगे.
1980 से कुवैत में रह रहे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के क्षेत्रीय प्रबंधक एग्नेल रेबेलो ने बताया, "इराक़ी सैनिकों का हमारे प्रति व्यवहार अच्छा था लेकिन वहाँ रह रहे कुछ फ़लस्तीनियों ने लोगों के साथ लूटपाट शुरू कर दी. एक बार एक व्यक्ति ने मेरे सिर पर पिस्टल लगाकर मुझे अपनी कार देने के लिए कहा. सौभाग्य से मैंने कार के कुछ पुर्ज़े निकाल लिए थे जिसकी वजह से वो कार स्टार्ट ही नहीं कर पाया."
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लोगों को लाने के लिए लगाए गए एयर इंडिया के विमान
आख़िर में भारतीयों को कुवैत से निकालने के लिए एयर इंडिया के विमानों का सहारा लिया गया. लेकिन सवाल उठा कि इतने अधिक लोगों को लाने के लिए विमान कहाँ से लाए जाएं?
फ़रवरी, 1990 में एक ए-320 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिसकी वजह से नए खरीदे गए ए-320 विमानों का पूरा बेड़ा ग्राउंडेड कर दिया गया था यानी उन विमानों को उड़ने की इजाज़त नहीं दी गई थी. उस वक्त इन विमानों की खरीद पर एक बहुत बड़ा राजनीतिक विवाद भी खड़ा हो गया था.
एयर इंडिया ने इन खड़े हुए विमानों को भारतीयों को कुवैत से बाहर निकालने के काम में लगाया. इस पूरे मिशन के समन्वय की ज़िम्मेदारी दी गई थी विदेश मंत्रालय में खाड़ी देशों के संयुक्त सचिव केपी फ़ेबियन को.
बाद में उन्होंने इकॉनॉमिक टाइम्स में लिखा, "मेरे पास 2 अगस्त को कुवैत के सबसे अमीर भारतीय स्वर्गीय केटीबी मेनन का लंदन से फ़ोन आया. उन्होंने कहा कि वो हर भारतीय को कुवैत से बाहर निकालने का ख़र्चा देने के लिए तैयार हैं. मैंने उनका धन्यवाद किया लेकिन ये भी कहा कि अगर लोगों को वहाँ से निकालना ज़रूरी हुआ तो उसका ख़र्चा भारत सरकार उठाएगी. अगर हालात मुश्किल होते हैं तो हम आपकी पेशकश पर विचार करेंगे."
"हर दिन अम्मान में एयर इंडिया के मैनेजर मुझे फ़ोन करके बताते कि अगले दिन कितने लोगों को वहाँ से निकाला जाना है. मैं नागरिक उड्डयन सचिव एवी गणेशन को फ़ोन करता और ज़रूरत के हिसाब से एयर इंडिया के विमान अम्मान के लिए रवाना किए जाते."

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कुवैत में फंसे भारतीयों की मुसीबत बढ़ी
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आर्थिक प्रतिबंधों के कारण इराक़ और कुवैत में किसी भी असैनिक विमान के उतरने की इजाज़त नहीं थी, इसलिए लोगों को बसों में लादकर पहले इराक़ और फिर वहाँ से जॉर्डन की राजधानी अम्मान पहुंचाया गया. उनको अम्मान तक पहुंचाना आसान काम नहीं था.
अव्वल तो लोग अपनी ज़िंदगी भर की कमाई छोड़कर वापस भारत आने के लिए तैयार नहीं थे. दूसरे वहाँ रहने वाले बहुत से लोगों के पास वैध यात्रा कागज़ात नहीं थे. उन्होंने अपने पासपोर्ट अपने मालिकों के पास जमा कर रखे थे. उनमें से बहुत से लोग या तो ग़ायब थे या मर गए थे.
मशहूर पत्रकार सलिल त्रिपाठी ने इंडिया टुडे के 15 सितंबर, 1990 के अंक में लिखा, "क़रीब एक लाख पैंसठ हज़ार भारतीय अब भी कुवैत और इराक़ में फँसे हुए हैं, पूरी दुनिया से कटे हुए. उनकी ज़िंदगी भर की कमाई सिफ़र हो गई है क्योंकि इराक़ ने कुवैत के दीनार का बारह गुना अवमूल्यन कर उसे इराक़ के दीनार के बराबर कर दिया है.
उन्होंने कई दिनों से कुछ नहीं खाया है. उनके बालों में धूल जमी है. उनके गले सूखे हुए हैं, उनकी आवाज़ कर्कश हो चुकी है. रातों रात अम्मान में एक ख़ूबसूरत पहाड़ी पर स्थित भारतीय दूतावास एक रेलवे प्लेटफॉर्म जैसा बन गया है. भारतीय दूतावास के फ़र्स्ट सेक्रेटरी अरुण गोयल कहते हैं, ये कुंभ मेले का इंतज़ाम करने जैसा है वो भी बिना किसी संसाधन के."

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लोगों ने अम्मान के स्कूलों में शरण ली
एयर इंडिया का एक चालक दल कुवैत में फँसा हुआ था. वहाँ लैंड करने के बाद उन्हें वहाँ से वापस उड़ने नहीं दिया गया था. एयर इंडिया के पायलट और दूसरे कर्मचारी सरकार पर ज़ोर डाल रहे थे कि अगर उनके साथी सुरक्षित वापस नहीं आते हैं तो वो विमान नहीं उड़ाएंगे. बहुत से भारतीय लोगों ने अम्मान के कई स्कूलों और दूसरी इमारतों में शरण ले रखी थी.
ये बताना मुश्किल था कि इनमें से कितने लोग किस समय हवाई अड्डे पहुंचेंगे जिसकी वजह से कई फ़्लाइट्स के उड़ने में देरी हो रही थी. कुवैत में पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस के कर्मचारी भी फँसे हुए थे.
उन्होंने भारत सरकार से अनुरोध किया कि उन्हें मानवता के नाते भारतीय विमान से बाहर निकाला जाए. एयर इंडिया के विमान उन्हें भी सुरक्षित निकाल कर लाए.
कुवैत से अपने नागरिकों को एयरलिफ़्ट करने वाला भारत पहला देश था, पाकिस्तान और मिस्र से भी पहले एयर इंडिया के विमान वहाँ पहुंच चुके थे. भारत के विदेश मंत्री इंदर कुमार गुजराल पहले मंत्री थे जिन्हें कुवैत जाने की अनुमति दी गई थी.

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63 दिनों तक लोगों को लाने का अभियान चला
उस समय भारत में जनता दल के कमज़ोर गठबंधन का शासन था जिसका कम्युनिस्ट और भारतीय जनता पार्टी बाहर से समर्थन कर रहे थे.
भारत की आर्थिक स्थिति को मज़बूत नहीं कहा जा सकता था. एयर इंडिया का ये आपरेशन 14 अगस्त 1990 को शुरू हुआ और 11 अक्तूबर तक यानी 63 दिन चला.
इस बीच एयर इंडिया के विमानों ने रोज़ अम्मान के लिए चार उड़ानें भरीं और कुल एक लाख सत्तर हज़ार भारतीय लोगों को भारत पहुंचाया, बाद में 2016 में इस अभियान पर एक फ़िल्म 'एयरलिफ़्ट' भी बनी और इसे लोगों को हवाई रास्ते से सुरक्षित निकालने के सबसे बड़े अभियान के रूप में गिनीज़ बुक ऑफ़ रिकार्ड में दर्ज किया गया.
11 अक्तूबर को इस अभियान के समाप्त होने के एक महीने के अंदर वीपी सिंह की सरकार गिर गई.
आज कुवैत में करीब दस लाख भारतीय रहते हैं जो वहाँ की जनसंख्या का 20 प्रतिशत हैं.
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