क्या सऊदी अरब के रास्ते पर है श्रीलंका, वित्त मंत्री की नियुक्ति पर उठे सवाल

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत या पाकिस्तान में रहने वालों को अगर उनके देशों में परिवारवाद, राजनीतिक परिवारों का दबदबा बहुत ज़्यादा लगता है तो उन्हें श्रीलंका से आ रही इस ख़बर को पढ़ना चाहिए.
श्रीलंका में पूर्व मंत्री 70 साल के बासिल राजपक्षे को देश को नया वित्त मंत्री बनाया गया है. उनके एक भाई गोटाबाया राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति हैं. दूसरे भाई महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री.
एक अन्य भाई चमल राजपक्षे सिंचाई विभाग और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के बेटे नमल राजपक्षे युवा और खेल मामलों के कैबिनेट मंत्री हैं.
चमल राजपक्षे के बेटे शशिंद्र "धान और अनाज, जैविक आहार और आधुनिक तकनीक खेती" के राज्य मंत्री हैं.
बासिल राजपक्षे के पास अमेरिका की भी नागरिकता है इसलिए संविधान में बदलाव करके उनके संसद सदस्य और वित्त मंत्री बनने में आने वाली कानूनी अड़चनों को हटा दिया गया. उन्हें मंत्री बनाए जाने के बाद कई लोगों को 'श्रीलंका और सऊदी अरब में समानता' दिखने लगी है.
पिछले दो दशकों से राजपक्षे परिवार सत्ता में रहा है. महिंदा राजपक्षे साल 2005 से 2015 तक श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे. उनके कार्यकाल में ही सालों चले युद्ध में तमिल चरमपंथी संगठन एलटीटीई को खत्म किया गया.
राजपक्षे उसके बाद देश के प्रधानमंत्री भी रहे यानी कुल मिलाकर किसी न किसी रूप में वे सत्ता में बने रहे.
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बासिल राजपक्षे को देश का वित्तमंत्री ऐसे वक्त बनाया गया है जब कई देशों की तरह कोविड की वजह से श्रीलंका की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है और भारी तादाद में लोगों की नौकरियां गई हैं.
कोलंबो में राजनीतिक टीकाकार जयदेव उयानगोडा कहते हैं, "श्रीलंका में पहले भी सेनानायके, जयवर्धने और भंडारनायके जैसे राजनीतिक परिवारों का दबदबा रहा है लेकिन राजपक्षे परिवार ने परिवारवाद की नई उंचाइयों को छुआ है."
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाओं में राजनीतिक परिवारों की कमी नहीं है.
जयदेव उयानगोडा कहते हैं, "पहले राजनीतिक परिवार सिर्फ़ सरकार को नियंत्रित करना चाहते थे लेकिन ये परिवार पूरी व्यवस्था को नियंत्रित करना चाहता है. इतने सारे मंत्रालय, महकमे इस परिवार के पास हैं. ये तो व्यवस्था पर कब्ज़ा करने जैसा है."
इनमें रक्षा, गृह, शहरी विकास, आर्थिक नीति, धार्मिक और संस्कृति जैसे मंत्रालय भी शामिल हैं.

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प्रतिक्रिया
राजपक्षे परिवार के समर्थकों ने जहां बासिल राजपक्षे को वित्त मंत्री बनाए जाने का स्वागत किया है, विपक्ष ने इसकी तीखी आलोचना की है.
जयदेव उयानगोडा के मुताबिक ऐसे में ज़्यादातर लोगों में बैचेनी है और कई लोग इस पूरी स्थिति पर व्यंगात्मक टिप्पणियाँ कर रहे हैं.
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एक ट्वीट में इस व्यवस्था को पारिवारिक बिज़नेस बताया गया.
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एक ट्वीट में कहा गया, अगर बासिल स्थिति को नहीं संभाल सके तो अगली संभावित उम्मीदवार महिंदा राजपक्षे की पत्नी होंगी.
जयदेव उयानगोडा कहते हैं, "लोगों में बहुत गुस्सा है, खासकर किसानों में. लोगों की नौकरियां गई हैं. आर्थिक परेशानियों से अभूतपूर्व सामाजिक संकट बढ़ रहा है, ऐसे में सरकार का रवैया मनमाना है."
बासिल राजपक्षे पूर्व में आर्थिक विकास के मंत्री रह चुके हैं और अपने भाइयों की राजनीतिक सफ़लता में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.
ऐसे में जब अर्थव्यवस्था की हालत खराब है, उनसे बहुत उम्मीदे हैं.
वेबसाइट 'द आइलैंड ऑनलाइन' में एक विश्लेषक ने कहा, "कलंकित सऊदी राजपरिवार वाली व्यवस्था की एक लंबी परंपरा रही है. श्रीलंका में ऐसी व्यवस्था नहीं है. और आप संवैधानिक हेराफेरी से इसे पैदा नहीं कर सकते."
राजन फ़िलिप्स अपनी तीखी टिप्पणी में लिखते हैं, "सत्ता है लेकिन सरकार नहीं है. मंत्री तो हैं लेकिन क्षमता नहीं है. समर्थक हैं, लेकिन संतुष्टि नहीं है. लेकिन आम लोग हैं, और वो पीड़ित हैं."

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क्या नए वित्त मंत्री से अर्थव्यवस्था संभलेगी?
कोरोना महामारी के पहले ही श्रीलंका की अर्थव्यव्था की अच्छी स्थिति नहीं है. साल 2019 की ईस्टर डे चरमपंथी हमले के बाद पर्यटकों की श्रीलंका आवाजाही पर असर पड़ा लेकिन महामारी के दौरान इसकी हालत और ख़राब हुई है, बजट घाटा बढ़ा है जबकि सरकार की आमदनी कम हुई है.
श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में थिंकटैंक वेराइट रिसर्च में अर्थशास्त्री डेशाल डि मेल के मुताबिक श्रीलंका के सामने सबसे बड़ी समस्या कर्ज़ का बढ़ता बोझ है.
वे कहते हैं, "इसी के साथ हमारा विदेशी मुद्रा भंडार चार बिलियन डॉलर तक सिमट गया है जो कि तीन महीने से कम के आयात के लिए ही काफ़ी है."

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ऐसे में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के भाई का वित्त मंत्री बनना बाज़ार, विदेशी निवेशकों को कितना विश्वास देगा?
डेशाल डि मेल के मुताबिक सकारात्मक बात ये है कि अब श्रीलंका के पास एक अलग विदेश मंत्री है क्योंकि पहले सालों तक ये ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के पास होती थी.
डिमेल के मुताबिक ऐसा नहीं है कि बासिल राजपक्षे के पास महत्वपूर्ण फ़ैसले लेने का अनुभव नहीं है, जबकि उयानगोडा उन्हें डीलमेकर बताते हैं जिनके पास अर्थव्यवस्था चलाने की समझ नहीं है.
वे कहते हैं कि सरकार का रवैया "हमें किसी की परवाह नहीं" वाला ही दिख रहा है.
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