कोरोना से जूझ रहा भारत, उधर चीन 'मास्क डिप्लोमैसी' से हुआ श्रीलंका के करीब

चीन और श्रीलंका

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    • Author, सुरंजना तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

लगभग दो अरब की आबादी वाला दक्षिण एशिया हाल के दौर के सबसे भीषण स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है.

भारत और इसके पड़ोसी देशों में कोरोना संक्रमण के मामलों में बड़ा उछाल देखने को मिल रहा है. आशंका है कि यह संकट छोटे देशों, ख़ासकर श्रीलंका में काफ़ी गंभीर रूप ले सकता है.

हालांकि चीन ने इन देशों में राहत कार्य में जो तेज़ी लाई है, उसे देखते हुए कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे इन देशों पर चीन का प्रभाव बढ़ सकता है.

संक्रमण रोकने के लिए लगाई बंदिशों के कारण पिछले शुक्रवार से श्रीलंका के शहरों और क़स्बों की सड़कें शांत हैं. 25 मई तक लोग सिर्फ ज़रूरी चीज़ों के लिए ही घर से बाहर निकल सकते हैं.

अपने पड़ोसी देशों की ही तरह श्रीलंका में भी पिछले साल आई संक्रमण की पहली लहर थोड़ी हल्की थी. लेकिन अब कोरोना के मामलों में आई तेज़ी से यहां स्वास्थ्य तंत्र के चरमराने का ख़तरा पैदा हो गया है.

अब यहां रोज़ाना औसतन 3,000 नए मामले सामने आ रहे हैं. एक महीने पहले की तुलना में यह 1000% का उछाल है.

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ढह सकती है अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था

श्रीलंका की स्वास्थ्य व्यवस्था को दक्षिण एशिया की बेहतरीन व्यवस्थाओं में माना जाता है. यहां स्वास्थ्य सुविधाएं सुलभ और मुफ़्त हैं. फिर भी दो करोड़ 10 लाख की आबादी वाले इस द्वीप के अस्पताल लड़खड़ाने लगे हैं.

जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ शशिका बंडारा ने बीबीसी को बताया, "संक्रमण मामलों में आए इस उछाल को काबू करने की हमारी क्षमता सीमित है. बेशक़ हमारा हेल्थकेयर सिस्टम अच्छा है मगर तभी तक, जब तक महामारी और न फैले, सिस्टम पर और बोझ न पड़े."

इधर, श्रीलंका की सरकार की इस बात के लिए आलोचना हो रही है कि वह संक्रमण को रोकने के लिए ज़रूरी कोशिशें नहीं कर रही है.

यहां नए मामलों की पर्याप्त जीनोम सीक्वेंसिंग नहीं की गई है जबकि माना जा रहा है कि देश में तेज़ी से फैल रहे संक्रमण के पीछे कोरोना वायरस का यूके वैरिएंट है.

श्रीलंका के इंस्टीट्यूट फ़ॉर हेल्थ पॉलिसी के कार्यकारी निदेश डॉक्टर रवि रणन-एलिया जैसे विशेषज्ञ कहते हैं इस बात की बहुत ज्यादा (50 फ़ीसदी से अधिक) आशंका है कि B.1.617.2 (भारत में पाया मिला वैरिएंट) भी यहाँ अप्रैल महीने से मौजूद है.

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सरकार से नाराज़ लोग

भारत में जब संक्रमण मामलों में उछाल देखने को मिल रहा था, तब भी दोनों देशों के बीच मई की शुरुआत तक 'ट्रैवल बबल' बनाकर रखा गया था. यानी दोनों देशों के लोगों का आना-जाना लगा हुआ था.

यहां की सरकार आवागमन पर रोक लगाने के लिए कई हफ़्तों तक झिझकती रही जबकि स्वास्थ्य अधिकारियों ने चेताया था कि श्रीलंका में भी जल्द 'भारत जैसे हालात' बन सकते हैं.

अप्रैल में जब श्रीलंका पारंपरिक नववर्ष का जश्न मना रहा था, तब कई लोग बिना रोक-टोक आते-जाते रहे. श्रीलंका की जनता में इसे लेकर भी काफ़ी चिंता थी.

संक्रमण रोकने के लिए किए जा रहे टीकाकरण को लेकर भी यहां नई अड़चनें पैदा हो गई हैं.

श्रीलंका में टीकाकरण अभियान शुरू हो गया था मगर एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन के लिए वह भारत से आने वाली सप्लाई पर निर्भर था. लेकिन भारत में ख़राब होते हालात और सामान की ढुलाई रुकने के कारण वैक्सीनेशन रुक गया.

19 मई तक यहां मात्र छह फ़ीसदी आबादी को ही वैक्सीन की एक डोज़ लग पाई थी. अभी तक इस बात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है कि कब एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन आएगी और कब इन लोगों को दूसरी डोज़ लगेगी.

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भारत पिछड़ा, चीन आगे आया

एशियाई महाशक्ति चीन का पहले से ही भारत के पड़ोसी देशों पर अच्छा प्रभाव मौजूद है और श्रीलंका भी इसमें शामिल है. चीन संकट के इस दौर में श्रीलंका की बढ़-चढ़कर मदद कर रहा है.

श्रीलंका को चीन अपने यहां विकसित वैक्सीन, पीपीई, फ़ेस मास्क और टेस्टिंग किट डोनेट कर रहा है. उसके इन प्रयासों को 'फ़ेस मास्क डिप्लोमैसी' का नाम दिया जा रहा है.

भारत अभी श्रीलंका में वैक्सीन की मांग पूरी नहीं कर पा रहा है मगर चीन ने रूस के साथ मिलकर इस कमी को दूर करने की कोशिश शुरू की है.

चीन ने श्रीलंका को 11 लाख सीनोफ़ार्म वैक्सीन डोनेट की हैं जिससे उससे टीकाकरण अभियान फिर से शुरू करने में मदद मिली है. श्रीलंकाई सरकार ने भी एलान किया है वह सीनोफ़ार्म और रूस की स्पुतनिक वैक्सीन खरीदेगी.

विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रामक रोगों की वैक्सीन लगाने में श्रीलंका का रिकॉर्ड अच्छा रहा है और एशिया के बाक़ी देशों की तुलना में यहां पर कोविड-19 की वैक्सीन को लेकर झिझक भी बहुत कम है.

पहले यहां चीनी और रूसी टीकों को लेकर चिंता थी मगर केस बढ़ने के बाद अब लोग टीका लगवाने के लिए बड़ी संख्या में जुट रहे हैं.

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चीन के 'शिकंजे' को लेकर चिंता

महामारी के कारण लड़खड़ाई श्रीलंका की अर्थव्यवस्था की मदद के लिए चीन पहले से ही आर्थिक सहायता दे रहा है.

कुछ जानकारों का मानना है कि इससे श्रीलंका पर चीन का प्रभाव और बढ़ जाएगा या आलोचकों के शब्दों में कहें तो चीन का 'शिकंजा' और कस जाएगा.

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संकट के इस दौर में चीन सिर्फ़ श्रीलंका की ही मदद नहीं कर रहा. नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश को भी वह सहायता दे रहा है. ये देश उसके महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना में शामिल हैं.

श्रीलंका में तो चीन पिछले कई सालों से इन्फ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करने और दूसरे विकास कार्यों के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है. लेकिन इससे श्रीलंका के कुछ लोगों में ऐसी भावना भी बनी है कि उनके देश को 'चीन को बेचा' जा रहा है.

इससे पहले चीनी कंपनियों ने हंबनटोटा में चीनी फ़ंड से बंदरगाह को विकसित किया था लेकिन श्रीलंका जब इसका क़र्ज़ नहीं चुका पाया तो यह पोर्ट उसे चीन को सौंपना पड़ा. इससे स्थानीय लोगों में ग़ुस्सा है.

चीन अब कोलंबो के तट के पास समंदर के पानी को हटाकर नया शहर बसाने की भी योजना बना रहा है.

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'श्रीलंका को चीनी मदद की ज़रूरत'

चीन अपनी तथाकथित 'स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स' या 'मोतियों की माला' रणनीति के तहत दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है.

चीन की इस विवादित नीति को उसका चिर-प्रतिद्वंद्वी भारत संदेह की नज़र से देखता है. मगर इस समय भारत महामारी से निपटने में उलझा हुआ है और वह इस मामले में कुछ ख़ास करने की स्थिति में नहीं हैं.

राजनीतिक विश्लेषक असंग अबेगुनासेकरा बीबीसी से कहते हैं, "चीन की वैक्सीन डिप्लोमैसी से श्रीलंका में पहले से मौजूद उसकी इन्फ्रास्ट्रक्चर डिप्लोमैसी में एक और कड़ी जुड़ जाएगी. इससे श्रीलंका पर मौजूद चीन के प्रभाव का दायरा और बढ़ जाएगा."

वहीं, डॉक्टर रवि रणन-एलिया का मानना है कि श्रीलंका जैसे देशों को अभी चीन की ज़रूरत है क्योंकि यही ऐसा देश है जो महामारी पर काबू पाने के बाद इस समय कोविड से निपटने के लिए ज़रूरी साजो-सामान बड़े पैमाने पर तैयार कर रहा है.

चीन की लॉकडाउन, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, टेस्टिंग और बॉर्डर बंद करने की रणनीति का हवाला देते हुए वह कहते हैं, "बड़ी ग़लती यह हुई कि हमने चीन से कुछ नहीं सीखा. हम ब्रिटेन की नकल करते रहे लेकिन अगर आप न्यूज़ीलैंड जैसे देशों को देखें तो उन्होंने भी चीन के नक़्श-ए-क़दम पर चलते हुए वायरस पर क़ाबू पाया है."

वीडियो कैप्शन, श्रीलंका में भारत को लगा झटका क्या चीन की वजह से है?

(बीबीसी सिंहला संवाददाता रंगा सिरीलाल के इनपुट्स के साथ)

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