किमोनो से कैसे खुली अमेरिका में बसे जापानियों के उत्पीड़न की कहानी

इमेज स्रोत, BBC
- Author, इलीन चोंग
- पदनाम, बीबीसी मुंडो
2013 में शेन 'शैशै' कोनो के दादा का जब निधन हुआ, तो उनके सामान की हिफ़ाज़त करने के लिए परिवार के लोग उनके घर गए. उनके बाग़ में लगा शेड सामान से इतना भरा हुआ था कि लोग एक-एक करके ही वहां घुस पाए.
किशोर उम्र के होने के चलते कोनो को ही भारी सामान परिवार के सदस्यों को देने का काम सौंपा गया. उस दौरान उनकी नज़र अलमीरा के भीतर रखे कार्डबोर्ड के एक सूटकेस पर पड़ी.
उस सूटकेस पर एक स्टिकर चिपका था, जिस पर लिखा था- 'यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन.'
कोनो ने जब वो सूटकेस खोलकर देखा तो उसके भीतर कुछ कपड़े पड़े थे. उसे देखकर कोनो ने सोचा, 'क्या बात है, फैंसी मेज़पोश!'

इमेज स्रोत, Konno Family
उसके बाद जब उन्होंने उस रेशमी कपड़े को अपने परिजनों को दिखाया तो पता चला कि वो 'किमोनो' है. जापान के समाज में किमोनो का काफ़ी महत्व है. हर पारंपरिक और अहम मौक़ों पर जापान के लोग इसे पहनते हैं.
उनके सभी परिजन चमकीले बैंगनी रंग के उस कपड़े को देख चकित थे. उस कपड़े पर हाथों से चांदी के धागे से जो कशीदाकारी की गई थी, वो अनूठी थी.
कोनो ने बीबीसी को बताया, "मैंने अपने जीवन में कभी किमोनो नहीं देखा, केवल इसे ही देख पाया था."
उनके दादा के उस सूटकेस में एक-एक करके कुल सात रेशमी किमोनो रखे मिले. उस समय तक उनके परिवार के किसी भी सदस्य को इसकी भनक तक नहीं थी. इसका ये मतलब हुआ कि उस 'क़ीमती खज़ाने' को गुप्त रखने के लिए उसे सूटकेस में रखा गया था.
उसके बाद कोनो ने जब उस सूटकेस की और बारीक़ी से जांच की, तो 'यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन' लिखे उस स्टिकर पर कुछ और लिखा मिला. उस पर सफ़ेद रंग से एक अज्ञात नाम और पांच अंकों का एक नंबर लिखा था- 'सदामे तोमिता' और '07314.'
हालांकि देखकर ऐसा लगा जैसे किसी ने उस नाम और नंबर को जानबूझकर स्टिकर से ढक दिया था. पूछने पर कोनो को उनके चाचा ने बताया, "ये तुम्हारी दादी का जापानी नाम था. और यह नंबर कैंप में उनके परिवार का रजिस्ट्रेशन नंबर था."

इमेज स्रोत, Konno Family
निसेई या जापान से अमेरिका आकर बसने वालों के बच्चे
कोनो अपनी दादी के बारे में नहीं जानते थे, क्योंकि वो कोनो के पैदा होने के पहले ही गुज़र गई थीं. उनकी दादी 'निसेई' थीं, जिनकी किशोरावस्था बंदी शिविरों में बीती थी.
असल में जापान से अमेरिका आकर बसने वाले पहली पीढ़ी के लोगों को 'इसेई' कहा जाता है. वहीं इन लोगों यानी इसेई के अमेरिका में पैदा होने वाले बच्चों यानी दूसरी पीढ़ी को 'निसेई' कहकर बुलाया गया.
इसेई की तीसरी पीढ़ी को 'सनसेई' नाम दिया गया, जबकि जापानी मूल के अमेरिकी नागरिकों की चौथी पीढ़ी 'योनसेई' कहलाई.
हालांकि दूसरा विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद कोनो की दादी को पश्चिमी नाम 'हेलेन' से जाना गया.
कोनो के दादा के घर से मिला सूटकेस, उनके पूर्वजों के जेल में बिताए गए दिनों की यादें थीं. कोनो को पता चला कि बंदी शिविर में केवल उस सूटकेस को ही भीतर ले जाने की इजाज़त मिली थी.
कोनो के दादा भी तब किशोर उम्र के ही थे, जब उन्हें कोलोराडो के 'कैंप अमाचे रिलोकेशन सेंटर' में क़ैद किया गया था. उनके दादा और दादी की मुलाक़ात दूसरे विश्वयुद्ध के ख़त्म होने के बाद हुई थी.
कोनो उन दिनों के बारे में और जानना चाहते थे, लेकिन उनके परिजन फिर से अतीत के उन काले दिनों को नहीं जीना चाहते थे.
उनका सवाल है, "मेरी दादी ने अपने बच्चों से भी उन बातों को छिपाकर रखा. आख़िर उन्होंने अपना असली नाम क्यों छिपाया? उन्होंने अपने किमोनो क्यों छिपाए?"
कोनो जैसे जापान में बसे कई अमेरिकी भी ऐसे ही सवाल पूछ रहे हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
'शिकता गा नई'
जापानी शब्द 'शिकता गा नई' का अर्थ 'बीती हुई बातें बदली नहीं जा सकती' होता है.
अमेरिका में पिछले साल एशियाई मूल के लोगों पर बढ़े हुए हमले का विरोध करने के लिए जब 'स्टॉप एशियन हेट' आंदोलन शुरू हुआ, तब कोनो ने देखा कि उस आंदोलन में जापान में बसे कई अमेरिकी भी शामिल थे. वे अमेरिका से कई मांग कर रहे थे.
कोनो बताते हैं, "पहला सवाल हमने पूछा कि आपके परिवार किस शिविर में थे? दूसरा सवाल था कि आपके परिजनों ने आपको इस बारे में कितना बताया?''
कोनो कहते हैं, "मेरे दादाजी जब ज़िंदा थे, तब मुझे कभी उनके अनुभवों के बारे में बात करने का मौक़ा नहीं मिला. यदि मैं अपनी चाची से पूछता हूं, तो वो विषय ही बदल देती हैं. मेरे पिता और चाचा सोचते हैं कि अतीत को खोदने से वास्तव में कुछ भी नहीं बदलेगा. परिवार का आदर करते हुए मैं उन्हें जवाब देने को मजबूर नहीं करता."
ऐसे ही कई इसेई और निसेई ने बंदी शिविरों के अनुभव अपने बच्चों से साझा नहीं किए. वे नहीं चाहते थे कि उनकी अगली पीढ़ी उन दर्दनाक यादों को यादकर जीए.
कोनो कहते हैं, "पिताजी की पीढ़ी के लिए बहुत अधिक सवाल न करना समझ में आता है, क्योंकि उस आघात से उनके माता-पिता दो-चार हो चुके थे. उस पीढ़ी के लिए, यह ऐसी कहानी नहीं थी, जिसे वे पढ़ सकते थे."
इसलिए, कोनो कहते हैं कि उस विरासत को ज़िंदा रखना अब योनसेई यानी चौथी पीढ़ी पर निर्भर है. कोनो कहते हैं कि वो उस पीढ़ी से हैं, जिसने उस अन्याय को भोगा नहीं है. इसलिए उनकी यादों में पहली की पीढ़ी जैसी कड़वाहट नहीं है.

इमेज स्रोत, Getty Images
बंदी शिविरों से क़ैदियों की मुक्ति
पर्ल हार्बर पर हमले के दो महीने बाद 19 फरवरी, 1942 को अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने 'कार्यकारी आदेश 9066' के ज़रिए जापान में बसे अमेरिकियों की रिहाई का आदेश जारी कर दिया.
असल में जापान में रह रहे अमेरिकी लोगों की गिरफ़्तारी जासूसी रोकने के मक़सद से की गई थी. वास्तव में, इससे संबधित अमेरिकी क़ानून नस्लवाद, युद्ध के उन्माद और भय से प्रेरित थे.
इसका प्रमाण यह भी था कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान राजद्रोह या जासूसी के गंभीर अपराध करने के लिए किसी भी जापानी अमेरिकी को कभी भी दोषी नहीं ठहराया गया.
अमेरिका के अलावा कनाडा, मैक्सिको और दक्षिण अमेरिका के कई देशों में भी इसी तरह के उपाय किए गए थे.
अमेरिका में 1942 से 1946 के बीच क़रीब 1.20 लाख अमेरिका में बसे जापानियों को उनके घरों से ज़बरन हटाकर सरकारी बंदी शिविरों में भेज दिया गया. बंदी शिविरों में डाले गए लोगों में हज़ारों बच्चे और बुज़ुर्ग थे. कई क़ैदियों को तो गार्डों ने गोली भी मार दी.
अमेरिका में रह रहे जापान के इन लोगों में आधे से अधिक अमेरिकी नागरिक थे.
क़ानून बनाया गया कि 1/16 से ज़्यादा जापानी वंश वाले किसी भी व्यक्ति को नज़रबंद रखा जा सकता था. इसका अर्थ ये हुआ कि यदि किसी के परदादा, दादा या दादी भी जापानी रहे हों, तो ऐसे लोगों को हिरासत में लिया जा सकता था और फिर उन्हें मीलों दूर स्थित किसी बंदी शिविर में रहने भेजा जा सकता था.

इमेज स्रोत, Getty Images
क्या था बंदी शिविर का हाल?
अमेरिका में रह रहे जापानियों को हिरासत में ले लिए जाने के फ़ैसले के कुछ ही महीनों में कैलिफ़ोर्निया, अरिज़ोना, व्योमिंग, कोलोराडो, यूटा और अर्कान्सस में 10 बंदी शिविर बनाए गए.
जब वे बन रहे थे तो हिरासत में लिए गए परिवारों को अस्थाई 'एसेंबली सेंटर' में रखा गया. इन सेंटर को घोड़े के अस्तबल के पास के रेसट्रैक पर अस्थाई इंतज़ाम के रूप में बनाया गया था.
कोनो की दादी को सैन मेटो रेसट्रैक में भेजा गया था. कोनो को बाद में इस बारे में पता चला.
वो बताते हैं, "घोड़ों को वहां से एक दिन पहले ही ले जाया गया था. इसलिए वहां की तेज़ गंध भयानक थी."

इमेज स्रोत, Konno family
राष्ट्रपति रीगन ने मांगी माफ़ी
उस वाक़ए के लगभग 50 साल बाद 1988 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने सरकार के व्यवहार के लिए अमेरिका में रह रहे जापानियों से माफ़ी मांगी. साथ ही 80 हज़ार से अधिक अमेरिका में रह रहे जापानियों को 20 हज़ार डॉलर (आज के लिहाज़ से क़रीब 40 हज़ार डॉलर) का मुआवज़ा भी दिया गया.
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में ऐसे बंदी शिविरों का इतिहास पढ़ाने वाले ब्रायन निया ने बताया कि उस समय जापानी-अमेरिकी समुदाय सरकार के माफ़ी मांगने से ख़ुश था.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "वो काफ़ी लंबा वक़्त था... लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि वे अपने जीवन में ऐसा होते हुए कभी देखेंगे."
हालांकि बंदी शिविरों की जटिल दास्तान का मतलब ये है कि अभी भी इस बारे में बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है.
ब्रायन निया कहती हैं, "कई लोगों को अभी भी उन शिविरों का इतिहास नहीं पता, लेकिन इसमें धीरे-धीरे प्रगति हो रही है."

इमेज स्रोत, Getty Images
नई पीढ़ी को बताया जा रहा उनका इतिहास
हाल में कैलिफ़ोर्निया में एक क़ानून पारित किया गया है. इससे अब वहां के हाई स्कूलों में इस घटना के इतिहास के बारे में पढ़ाया जाएगा.
अतीत के उस पन्ने को क्लास में पढ़ाने के लिए ख़ास तौर पर किताबें लिखी जा रही हैं. वहां लोगों और उस घटना को याद करने के लिए स्मारक बनाया जा रहा है. साथ ही ख़ास मौक़ों पर उन शिविरों के बारे में बताने वाली फ़िल्में भी दिखाई जा रही हैं.
निया कहती हैं, "हमें उम्मीद है कि घटना के 100वीं वर्षगांठ पूरी होते होते सभी अमेरिकियों को उन शिविरों के बारे में पता चल जाएगा."
कोनो ने अब उन कहानियों को जानने का फ़ैसला किया. एक किताब से उन्हें पता चला कि विदेशी समझे जाने के भय से जापान से अमेरिका आए कई लोगों ने जापान से जुड़ा अपना सामान जला दिया था.
उन्हें ये भी पता चला कि उनके परदादा ने पारिवारिक फोटो, जापानी भाषा में लिखे पत्रों और दस्तावेज़ों को नष्ट करने को लेकर कई लोगों को समझाया भी था.
एक बहुत बड़े जापानी शब्दकोश को जलने में तो एक सप्ताह से भी अधिक का वक़्त लगा था. साशिमी चाकू और अन्य उपकरण भी आग में फेंक दिए गए थे. लोगों को डर था कि अमेरिकी अधिकारी उन्हें जापानी हथियार मान लेंगे.
अमेरिका में हुए बर्ताव के बाद जापान से आए लोगों की जापानी संस्कृति को बड़ा धक्का लगा. कोनो के दादा-दादी जापानी भाषा बोलते थे, लेकिन बंदी शिविरों के बुरे अनुभव के बाद उन्होंने अपने बच्चों को जापानी न सिखाने का फ़ैसला किया.
कोनो अब पीढ़ियों के खोए ज्ञान को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. वो कहते हें, "मैं अपने दादा-दादी के फ़ैसलों को समझ सकता हूं. उन्होंने वही किया जो उनकी सुरक्षा के लिए उचित था."

इमेज स्रोत, Getty Images
मंज़ानार शिविर का दौरा
2019 में कोनो ने अपने एक दोस्त से एक ख़ास जगह चलने को कहा. उनके दोस्त के पास कार थी. उन्होंने कहा कि अब वो मंज़ानार जाना चाहते हैं.
फ़िलहाल मंज़ानार के नेशनल पार्क सर्विस के नियंत्रण में म्यूज़ियम के रूप में काम कर रहा वहां का बंदी शिविर अमेरिका का ऐसा पहला बंदी शिविर था.
यह शिविर कैलिफ़ोर्निया के सिएरा नेवादा पहाड़ों की तलहटी में मौजूद है. वहां रहने वाले ज़्यादातर लोग वहां से क़रीब 370 किलोमीटर दूर लॉस एंजिल्स से आए थे.
हालांकि कोनो ने तस्वीरों में उस जगह को देखा था, लेकिन वो उन हालातों को देखकर दंग रहे गए थे, जिनमें जापान से जुड़े लोगों को वहां रखा गया था. असल में इतिहास के बारे में लोगों को बताने के लिए उस शिविर को पहले जैसा बनाने की कोशिश की गई थी.
वहां रहने वाले परिवार लकड़ी के लंबे बैरक में रहते थे. कपड़े या किसी और चीज़ के शीट से कमरों को बांटा गया था. ऐसे में लकड़ी की दीवारों से हवा और धूल भीतर तक पहुंचती थी. रूम को साफ़ रखने के लिए उन्हें दिन में दो बार झाड़ू लगाना होता था.
बाहर से उस शिविर को आठ फ़ीट ऊंचे कांटेदार तारों की बाड़ से घेरा गया था. ऐसे में उन तारों से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था.

इमेज स्रोत, Getty Images
'गमन' की सीख
बंदी शिविर में कोनो की दादी अपनी दो छोटी बहनों के साथ क़ैद थीं. उस समय तीनों बहनों की उम्र 15 से 18 साल के बीच थी. वहां तीनों बहनें अपने माता-पिता के साथ एक ही कमरे में रहती थीं.
बाथरूम सभी के लिए कॉमन थे और खुले हुए थे. शौचालयों में कोई दीवार नहीं थी, जिससे उनकी निजता की सुरक्षा असंभव थी. बाथरूम के बाहर महिलाएं क़तार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतज़ार करती थीं.
कोनो ने जब क़ैदियों के बैरक के बाहर देखा तो उन्हें जापान के ज़ेन बगीचों के अवशेष दिखे. कोनो का मानना है कि वहां के क़ैदी बंदी शिविर के माहौल को सुंदर बनाने की कोशिश कर रहे थे.
कोनो जापानी शब्द 'गमन' का ज़िक्र करते हैं. असल में इस जापानी शब्द का मतलब 'अपनी इज़्ज़त बचाते हुए असहनीय लगने वाले दुखों को सहना' होता है.
कोनो ने बताया कि उन बंदी शिविरों में अमेरिका में बसे जापानियों को कमतर इंसान मानते थे. वो कहते हैं कि वैसे भयानक हालात में भी उन लोगों ने 'गमन' की सीख का पालन करते हुए उस भयानक जगह में एकदूसरे की मदद करने की कोशिश की.
कोनो को नहीं पता था कि कई साल पहले उनके पिता ने भी मंज़ानार का दौरा किया था. लेकिन कोनो बताते हैं कि उन्होंने सारी जानकारी अपने पास रख ली थी और हम लोगों से कुछ भी साझा नहीं किया.

इमेज स्रोत, Konno family
'उस घटना को याद रखना पूर्वजों का सम्मान करना है'
अपने सवालों के जवाब ढूंढ़ना शुरू करने के बाद कोनो के पिता और चाचा दोनों 'मर्सिड एसेंबली सेंटर' देखने गए. ये वही जगह थी जहां उनके पिता के परिजनों को बंदी शिविर भेजने से पहले कुछ वक़्त के लिए क़ैद किया गया था.
हालांकि बंदी शिविरों को बहुत पहले ख़त्म कर दिया गया था, लेकिन वहां सूटकेस के ढेर पर एक लड़की की मूर्ति लगी थी. और वो मूर्ति वहां क़ैद रहने वालों के परिजनों के लिए एक स्मारक का काम करती है.
उस मूर्ति के पीछे वाली दीवार पर उस शिविर में पैदा होने वाले बच्चों सहित अमेरिका में बसे 1,600 जापानियों के नाम पत्थरों में खुदे हुए हैं.
उन नामों को देखकर कोनो के पिता और चाचा वहां रुक गए और अपना सरनेम ढूंढ़ने लगे. कोनो को दिखाने के लिए उन्होंने वहां अपने सरनेम की तस्वीरें लीं.
कोनो जब इस पूरी क़वायद को पीछे मुड़कर देखते हैं, तो उन्हें समझ आता है कि क्यों इस मामले की पड़ताल करने में इतना समय लगा. वो कहते हैं कि उनके परिजनों को लगता था कि उनके अनुभवों को उनके बच्चे या कोई और सही ढंग से समझ नहीं पाएंगे.
लेकिन लगता है कि उनके माता-पिता की पीढ़ी की भी वही ख़्वाहिश है कि मामले को जाना जाए.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















