पहले विश्वयुद्ध में लड़ने वाले पंजाब के लाखों सैनिकों के बारे में अब आप जान पाएंगे

प्रथम विश्वयुद्ध में लड़ने गए ब्रिटिश भारतीय सेना के पंजाब के सैनिक मिस्र के गिज़ा में स्फ़िंक्स के सामने

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इमेज कैप्शन, प्रथम विश्वयुद्ध में लड़ने गए ब्रिटिश भारतीय सेना के पंजाब के सैनिक मिस्र के गीज़ा में स्फ़िंक्स के सामने
    • Author, गगन सभरवाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लंदन

ब्रिटेन के बर्मिंघम की 22 साल की जैस्मीन अटवाल पिछले साल हुए लॉकडाउन के दौरान 'यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन' के साथ काम कर रही थीं. वहां उन्हें ग़लती से ऐसे रिकॉर्ड मिले, जिनसे पता चला कि पंजाब के जालंधर के मंगोवाल गांव से संबंध रखने वाले उनके परनाना कृपा सिंह और उनके भाई गुरदयाल सिंह प्रथम विश्वयुद्ध में लड़े थे.

जैस्मीन अटवाल ने इस बारे में बीबीसी को बताया, "शुरू में मैं थोड़ा हैरान रह गई. मैंने कहा कि मेरे लिए यह बहुत ही अच्छी जानकारी है. मुझे भरोसा ही नहीं हो रहा था कि मैंने इन रिकॉर्डों को देखा है. मुझे गर्व भी हुआ कि मेरा भी प्रथम विश्वयुद्ध से कोई सीधा संबंध था. वो क्षण मेरे लिए बहुत भावुक करने वाला था."

जैस्मीन के परनाना और उनके भाई अविभाजित पंजाब के उन 3.2 लाख सैनिकों में से दो हैं, जो प्रथम विश्वयुद्ध में लड़े थे. उनके रिकॉर्ड अब पहली बार सार्वजनिक तौर पर मुहैया कराए गए हैं.

इन रिकॉर्ड के रजिस्टरों को 'पंजाब रिकॉर्ड्स' नाम दिया गया है. इनमें पंजाब के 20 ज़िलों के सैनिकों के सर्विस रिकॉर्ड हैं. और ये पाकिस्तान के लाहौर के एक म्यूज़ियम में पिछले क़रीब एक सदी से पड़े हुए थे. इन रजिस्टरों को 1918 में प्रथम विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद पंजाब सरकार ने संकलित किया था.

जैस्मीन अठवाल

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'मुझे भरोसा नहीं हो रहा कि ऐसा हो गया'

इन रिकॉर्डों के ज़रिए जैस्मीन और उनके परिवार को पता चला कि उनके परनाना कृपा सिंह आर्टिलरी के एक सैनिक थे. वे मेसोपोटामिया (इराक़) की एक पहाड़ी टुकड़ी का हिस्सा थे. प्रथम विश्वयुद्ध में उनका काम बंदूकें रखना, उनका संचालन करना और जहां ज़रूरत हो वहां उसे पहुंचाना था.

बर्मिंघम के एक हेरिटेज कंसल्टेंट राजपाल ने भी इन रिकॉर्डों को देखा और वो इनके ज़रिए जान पाए कि पाकिस्तान के गुजरात जिले में रहने वाले उनके दादा और चाचा, दोनों ने पहले विश्वयुद्ध में लड़ाई की थी.

ब्रिटेन में सांसद तनमनजीत सिंह ढेसी को मालूम हुआ कि उनके गांव के चार लोगों ने प्रथम विश्वयुद्ध की लड़ाई में भाग लिया था.

पूर्वोत्तर पंजाब के होशियारपुर ज़िले से आने वाले उनके परदादा मिहान सिंह मेसोपोटामिया में सिपाही के रूप में लड़ाई की थी. इन रजिस्टरों ने उनके परिवार में प्रचलित उस कहानी की पुष्टि की कि मिहान सिंह प्रथम विश्वयुद्ध में घायल हो गए थे.

पंजाबी और हिंदी फ़िल्मों के एक्टर और गायक दिलजीत दोसांझ ने भी ऑनलाइन रिकॉर्ड के ज़रिए पता किया कि जालंधर के पास के उनके गांव से 51 सैनिकों ने युद्ध में भाग लिया था. उन्हें ये भी पता चला कि उनमें से एक सैनिक की मौत लड़ाई के दौरान पश्चिमी मोर्चे पर हो गई थी.

सैनिकों के रिकॉर्ड- गुरुदासपुर रजिस्टर.

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लेकिन ये रजिस्टर पाकिस्तान पहुंचे कैसे?

लाहौर म्यूज़ियम रिसर्च एंड रेफ़रेंस लाइब्रेरी के प्रमुख बशीर भट्टी ने बीबीसी के सैयद अली काज़मी को बताया कि वे इस बारे में नहीं जानते कि आख़िर ये रजिस्टर लाहौर म्यूज़ियम में पहुंचे कैसे.

इन रजिस्टरों को लाइब्रेरी में आधिकारिक तौर पर 1977 में शामिल किया गया. उसके बाद रसायनिक उपचार (फ्यूमिगेशन) करने के बाद इन रजिस्टरों को डिजिटाइज़ किया गया. इन रजिस्टरों को डिजिटाइज़ करने का मक़सद ये था कि ऐसा करने के बाद किसी भी रिकॉर्ड को कहीं से और आसानी से ढ़ूंढ़ा जा सकता है. साथ ही ऐसे दुर्लभ और अहम दस्तावेज़ आने वाली पीढ़ी के लिए भी डिजिटल रूप में सुरक्षित हो जाएंगे.

लाहौर पहुंची बीबीसी की टीम से बात करते हुए बशीर भट्टी ने कहा, "इन रिकॉर्डों को बड़ा महत्व है. वो इसलिए कि हर व्यक्ति अपने उन पूर्वजों के बारे में अधिक से अधिक जानना चाहता है, जो प्रथम विश्वयुद्ध में लड़े. लोग ये पता लगाना चाहते हैं कि उनके पूर्वजों ने सेना की किस इकाई में काम किया और कहां तैनात थे. लोग ये भी जानना चाहते हैं कि उन्होंने कहां लड़ाई की और और क्या उसमें वे शहीद या घायल हुए. लोग जब रिकॉर्ड बुक में संबंधित जान​कारियों को देखते हैं, तो बहुत ख़ुश होते हैं."

लंदन में 1919 में हुए विजय परेड में शामिल होते पंजाब के सैनिक

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इमेज कैप्शन, लंदन में 1919 में हुए विजय परेड में शामिल होते पंजाब के सैनिक

लाहौर म्यूज़ियम में ऐसे 34 रजिस्टर रखे गए हैं. इनमें पंजाब के 20 जिलों से प्रथम विश्वयुद्ध में लड़ने वाले सैनिकों के सर्विस रिकॉर्ड्स हैं. इन ज़िलों में से 10 ज़िले आज भारत में हैं तो बाक़ी 10 पाकिस्तान के हिस्से में.

26,000 पन्नों के हाथ से लिखे इन रजिस्टरों में अविभाजित पंजाब के सैनिकों के बारे में कई तरह की जानकारियां दर्ज़ हैं. ये सारी सूचनाएं गांव के हिसाब से लिखी गई हैं.

रजिस्टर में युद्ध करने वाले सैनिकों के अलावा रिटायर लोगों की सूचनाएं भी हैं. इसमें किसी से जुड़ी तमाम जानकारियां, जैसे कि सैनिक का नाम, उनकी रैंक, उनका रेजिमेंट, उनका सर्विस नंबर, उनका पता, उनके परिवार की जानकारी आदि दर्ज़ हैं.

इस र​जिस्टर में ये भी बताया गया है कि युद्ध में कोई सैनिक घायल हुआ या शहीद हो गया. साथ ही इन रजिस्टरों से क़रीब 100 साल पहले के ब्रिटेन की भारतीय सेना की भर्ती प्रक्रिया के बारे में भी विस्तृत जानकारी मिलती है.

अमनदीप सिंह मादरा

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इमेज कैप्शन, यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन (यूकेपीएचए) के सह-संस्थापक और अध्यक्ष अमनदीप सिंह मादरा

कैसे हासिल हु ये दस्तावेज़?

ये दस्तावेज़ आगे भी ऐसे ही छिपे रहते और इन पर कोई रिसर्च नहीं होता. लेकिन इतिहास पर काम करने वाली ब्रिटेन की प्रमुख समाजसेवी संस्था 'यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन (यूकेपीएचए) ने इन दस्तावेज़ों में छिपी जानकारी हासिल करने के लिए सालों तक अथक मेहनत की.

यूकेपीएचए के सह-संस्थापक और अध्यक्ष अमनदीप सिंह मादरा को इन रजिस्टरों तक पहुंचने के लिए काफ़ी इंतज़ार करना पड़ा. उन्हें लाहौर म्यूज़ियम के साथ पत्राचार करने और अच्छे संबंध बनाने में सात साल लग गए.

अमनदीप मादरा ने इन फ़ाइलों को देखने के लिए पहली बार 2014 में लाहौर म्यूज़ियम से संपर्क किया था. मादरा को इन दस्तावेज़ों के बारे में भारत के सैन्य इतिहासकारों ने बताया था. वे इतिहासकार ये जानते थे कि म्यूज़ियम में ऐसे दस्तावेज़ हैं. हालांकि वे ख़ुद कभी ये दस्तावेज़ हासिल नहीं कर पाए.

इस प्रोजेक्ट के लिए धन मुहैया कराने वाली ग्रीनविच यूनिवर्सिटी ने इन रिकॉर्ड को ट्रांसक्रिप्ट करने में मदद की. बाद में ट्रांसक्रिप्टेड दस्तावेज़ों के डिज़िटल रूप में यूकेपीएचए की वेबसाइट पर 'पंजाब एंड वर्ल्ड वार वन' टाइटल से अपलोड कर दिया गया.

अमनदीप सिंह मादरा

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इस बारे में अमनदीप सिंह मादरा ने बीबीसी से बातचीत की. उन्होंने बताया, "प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान पंजाब भारतीय सेना की बहाली की मुख्य जगह थी. पंजाब के तीनों धर्मों के लोग भारतीय सेना में शामिल हुए."

वे कहते हैं, "इसका नतीज़ा ये हुआ कि ब्रिटेन की भारतीय सेना में एक तिहाई सैनिक पंजाब से ही थे. वहीं ब्रिटिश साम्राज्य के कुल विदेशी सैनिकों में छठा हिस्सा पंजाब के लोगों का हो गया. इसके बाद भी पंजाब के लोगों का प्रथम विश्वयुद्ध में योगदान बहुत हद तक अज्ञात रहा है. अधिकांश मामलों में तो हम उनके नाम तक नहीं जानते."

मादरा बताते हैं, "इन दस्तावेज़ों को डिजिटाइज़ करने में हम पूरी दुनिया में बसे पंजाबी लोगों के साथ दुनिया भर के शोध करनेवालों और शिक्षाविदों से सहयोग ले रहे हैं. हम उन्हें सैनिकों से जुड़ी सूचनाओं के विशाल भंडार मुहैया करा रहे हैं."

मादरा ने बताया, "2014 में मेरे पिता ने मुझसे कहा कि उनके अपने चाचा ने प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया था. ये एक ऐसा क़िस्सा था, जिसे मैंने पहले कभी नहीं सुना था. मैंने इसके बारे में किताबें लिखी थीं, लेकिन ये क़िस्सा नहीं पता था. मेरे पिता को अपने चाचा की पेंशन के लिए उन्हें उनके पुश्तैनी शहर रोपड़ ले जाने की धुंधली यादें थीं."

वो कहते हैं, "मेरे पिता को ये भी याद था कि उनके चाचा की आंखें बसरा की लड़ाई के दौरान रेत के तूफ़ान में घिर जाने से ख़राब हो गई थीं. हमें ये भी मालूम था कि उनका नाम बिशन सिंह था और वो रोपड़ ज़िले के मधपार गांव के रहने वाले थे."

भारतीय पंजाब के होशियारपुर ज़िले के पंजौर गांव में बना ग्रेट वार मेमोरियल

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इमेज कैप्शन, भारतीय पंजाब के होशियारपुर ज़िले के पंजौर गांव में बना ग्रेट वार मेमोरियल

मादरा इस कहानी को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, "जब मुझे उनके बारे में पता चला तो तो इन रजिस्टरों ने बिशन सिंह की कहानी एक झटके में उजागर कर दी. मुझे तुरंत समझ में आ गया कि इन दस्तावेज़ों का सामने आना बहुत बड़ी बात हो गई है. अब इसके ज़रिए मेरे जैसे इंसान को उस शख़्स के इतिहास को जानने में मदद मिलेगी."

"इसलिए उनके बारे में जानकारी को इंटरनेट पर डालकर उन्हें सबके लिए स्वतंत्र रूप से मुहैया कराने का एक मक़सद है. मैं चाहता हूं कि और लोग भी हमारी तरह अपने पूर्वजों के बारे में जान पाएं. उन्हें मालूम हो कि उनके पूर्वज किस रेजिमेंट के लिए और कहां लड़े थे. लोग उनके बारे में और जानने के लिए उन पर रिसर्च करें."

वो कहते हैं, "इतने बड़े दस्तावेज़ों को डिजिटाइज़ करने के लिए लाहौर म्यूज़ियम के साथ काम करना बेहद थकाऊ था. ये दस्तावेज़ क़रीब 26 हज़ार पन्नों के थे. इसलिए उनके साथ मिलकर इन सारे दस्तावेज़ों को साफ़-सुथरा और डिज़िटल रूप देने में हमें क़रीब चार साल लग गए. और फिर हमें हर लाइन को ट्रांसक्रिप्ट करने में क़रीब एक साल लग गया. 20वीं सदी की शुरुआती लिपि हाथ से लिखे होने के ​चलते कई बार सूचनाओं को पढ़ना काफ़ी कठिन होता है.''

दोनों पंजाब के 20 ज़िलों में से केवल 3 ज़िलों- भारत के जालंधर, लुधियाना और पाकिस्तान के सियालकोट, से ही क़रीब 44 हज़ार सैनिकों के सर्विस रिकॉर्ड ऑनलाइन प्रकाशित हो चुके हैं.

मादरा को उम्मीद है कि इस परियोजना के ज़रिए प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों के वंशज वर्तमान अंतरालों को दूर कर सकते हैं. ऐसा करके वे पंजाब के योगदान की एक शानदार छवि बनाने में उनकी टीम की मदद कर सकते हैं.

उन्हें ये भी उम्मीद है कि उनके इस प्रोजेक्ट से पंजाब के सैनिकों की सामूहिक सेवा को न्याय दिलाने में मदद मिलेगी. साथ ही इससे 'पंजाब और प्रथम विश्वयुद्ध' पर जानकारियों का एक उचित संग्रह बनाने में मदद हो पाएगी.

प्रथम विश्वयुद्ध में पंजाब का योगदान

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प्रथम विश्वयुद्ध में पंजाब का योगदान

प्रथम विश्वयुद्ध 28 जुलाई, 1914 से लेकर 11 नवंबर, 1918 के बीच लड़ा गया था. इसमें यूरोप के ज़्यादातर देशों के साथ-साथ रूस, अमेरिका और तुर्की ने भी भाग लिया था. यह लड़ाई ज़्यादातर मध्यपूर्व, अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्सों में लड़ी गई.

इस लड़ाई में भारत से क़रीब 13 लाख सैनिकों ने भाग लिया था. इनमें से 74 ​हज़ार से अधिक सैनिकों ने अपनी जान गंवाई और हज़ारों घायल हुए. भारत के कुल सैनिकों के क़रीब एक तिहाई उस समय के पंजाब प्रांत के थे.

अब तक पहले विश्वयुद्ध में लड़ने वाले भारतीय सैनिकों के बारे में ऐसा कोई डेटा मौजूद नहीं था. हालांकि ब्रिटेन और आयरलैंड के सैनिकों के मामले में ऐसा नहीं है. उनके वंशज या इतिहासकर उन सैनिकों के सर्विस रिकॉर्ड के सार्वजनिक किए हुए डेटाबेस को देख सकते हैं.

डॉ. गेविन रैंड

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ग्रीनविच यूनिवर्सिटी में इतिहास के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. गेविन रैंड ने इस बारे में बीबीसी से बातचीत की. उन्होंने कहा, "ये रिकॉर्ड ब्रितानी राज के सैनिकों में पंजाब के योगदान का एक अनूठा और विस्तृत दस्तावेज़ मुहैया कराते हैं. प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश उपनिवेश के लिए लड़ने वाले सैनिकों के बारे में इससे काफ़ी उपयोगी जानकारी मिलती है."

रैंड कहते हैं, "ब्रिटेन में पंजाबी मूल के क़रीब 10 लाख सिख, मुसलमान और हिंदू ब्रितानी नागरिकों के होने का अनुमान है. पूरी दुनिया में ये तादाद 10.2 करोड़ हो सकती है. इनमें से कई उन इलाक़ों से हैं, जहां से काफ़ी सैनिक बहाल हुए थे."

वे बताते हैं, "इस प्रोजेक्ट ने रजिस्टरों में दर्ज़ कई अनूठी जानकारियों को पहली बार सबके सामने लाया है. इससे ब्रिटेन या उसके बाहर रहने वाले पंजाबी लोग बड़े पैमाने पर इन रिकॉर्ड को देख सकते हैं. इससे उन्हें अपने पूर्वजों और विभाजन के पहले के पंजाब के गांवों के बारे में काफ़ी कुछ जानने का मौक़ा मिलेगा."

वहीं नॉटिंघम यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. अरुण कुमार ने भी इस प्रोजेक्ट का स्वागत करते हुए कहा, "लंबे समय तक प्रथम विश्वयुद्ध को यूरोप या पश्चिम के युद्ध के रूप में बताया गया. पश्चिमी मीडिया में ये छवि काफ़ी भरमाने वाली और अनैतिक है. इससे उस युद्ध में भारत और अन्य उपनिवेशों के सैनिकों के योगदान को भी पहचान नहीं मिल पाती."

डॉ. अरुण कुमार

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उन्होंने ये भी बताया कि उन्हें जो बात सबसे दिलचस्प और रोमांचक लगी, वो ये थी कि कारीगर जातियों (जैसे बुनकर, सुनार, बढ़ई) और दलित बिरादरी के सैनिकों ने भी प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया था.

लंदन में भारत के पत्रकार और 'स्पाई प्रिंसेस: द लाइफ़ ऑफ नूर इनायत ख़ान' और 'विक्टोरिया एंड अब्दुल: द ट्रू स्टोरी ऑफ़ द क्वीन्स क्लोजेस्ट कॉन्फिडंट' सहित कई किताबों की लेखिका श्रावणी बसु ने इस बारे में बीबीसी से बातचीत की.

श्रावणी बसु

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श्रावणी बसु ने बताया, "ये स्कूलों, विश्वविद्यालयों और अकादमिक जगत के लोगों के लिए भी काफ़ी अहम ​रिसोर्स है. इससे पता चलता है कि पंजाब के सैनिकों ने प्रथम विश्वयुद्ध में किस हद तक अपनी मर्ज़ी से योगदान दिया."

लेकिन क्या प्रथम विश्वयुद्ध में लड़ने वाले भारत के सैनिकों के योगदान को अब भुला दिया गया?

इस पर डॉ. गेविन रैंड ने बीबीसी से कहा, "ब्रिटेन में हमने इस युद्ध को ग़लत समझा. हमने इसे फ्रांस और बेल्जियम से ज़्यादा जोड़कर देखा. हम बहुत पहले से न केवल दक्षिण एशिया बल्कि ब्रिटेन के उपनिवेशों के सैनिकों के योगदान को भूल से गए."

दूसरी ओर डॉ. अरुण कुमार इसके लिए उपनिवेशवाद को ज़िम्मेदार मानते हैं.

इस प्रोजेक्ट के पहले चरण के सफल होने के बाद, कुछ और ज़िलों के सैनिकों के सर्विस रिकॉर्ड वेबसाइट पर अपलोड करने की योजना बनाई जा रही है. ऐसा होने पर और अधिक लोग अपने परिवार के इतिहास और प्रथम विश्वयुद्ध में अपने पूर्वजों के योगदान के बारे में जान पाएंगे.

वीडियो कैप्शन, दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर की सेना से कैसे टकराए लैटिन अमरीकी सैनिक

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