महात्मा गांधी को 'राजनीति में बच्चा' कहने वाली ब्रितानी महिला कौन थीं?

एनी बेसेंट

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    • Author, पद्मा मीनाक्षी
    • पदनाम, बीबीसी तेलुगू सेवा

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में पुरुषों के साथ-साथ कई महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. इन तमाम महिलाओं में तीन ऐसी ब्रितानी महिलाएं भी शामिल हैं, जिन्होंने अपने मुल्क की सरकार के ख़िलाफ़ जाकर भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष किया.

इन तीन महिलाओं में सबसे पहला नाम एनी बेसेंट का आता है जो अपने आप में एक नास्तिक और समाजवादी महिला थीं. लेकिन बाद में वह थियोसोफिस्ट हो गईं.

इसके बाद मैडलिन स्लेड (मीरा बेन) और कैथरीन हेलमैन (सरला बेन) का नाम आता है जो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आंदोलन में शामिल हुईं.

प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब 'रेबल्स अगेंस्ट राज' में इन तीनों महिलाओं के बारे में विस्तार से लिखा है.

एनी बेसेंट एक छोटी सी ट्रिप पर भारत घूमने आई थीं. लेकिन उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उनकी ये छोटी सी यात्रा 40 वर्षों में बदल जाएगी.

कौन थीं एनी बेसेंट

आयरिश मूल की महिला एनी बेसेंट मेडम ब्लावात्स्की के संपर्क में आकर थियोसोफिज़्म की ओर गईं. उन्होंने बेहद ध्यान से हिंदू और बुद्ध साहित्य को पढ़ा.

धर्म और शाकाहार पर उन्होंने ऐसे व्याख्यान दिए जिनकी वजह से लंदन यूनिवर्सिटी ने उन्हें डिग्री देने से मना कर दिया. इसी घटना ने भारतीय शिक्षा क्षेत्र में उनका प्रवेश कराया.

एनी बेसेंट ने साल 1904 में कश्मीर और बनारस के राजा की मदद से बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज और आवासीय हिंदू महिला स्कूल की स्थापना की.

आंध्र प्रदेश में सेंटर फॉर गांधियन स्टडीज़ के अध्यक्ष एवं नागार्जुन यूनिवर्सिटी के पूर्व उप-कुलपति बालमोहन दास कहते हैं कि उस दौर के सामाजिक एवं आर्थिक हालात के लिहाज से ये एक क्रांतिकारी क़दम था.

एनी बेसेंट ने आधुनिक शिक्षा को पारंपरिक भारतीय पद्धतियों से मिलाने पर ज़ोर दिया. वह लैंगिक समानता की पक्षधर थीं लेकिन उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पुरुषों का दर्जा महिलाओं से ऊंचा हो.

रामचंद्र गुहा की किताब

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महात्मा गांधी के प्रति द्वेष भरा भाव

इतिहासकार रामचंद्र गुहा कहते हैं कि वह महात्मा गांधी के प्रति द्वेष जैसा भाव रखती थीं लेकिन महात्मा गांधी ने हमेशा उन्हें श्रद्धा की नज़र से देखा.

दोनों के बीच इस ख़ास संबंध की झलक बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में हुए एक कार्यक्रम में मिलती है जहां एनी बेसेंट ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान महात्मा गांधी को भाषण देते हुए रोक दिया था.

गांधी ने अपने भाषण के दौरान यूनिवर्सिटी के संरक्षकों को आड़े हाथों लेते हुए कहा, "क्या इस कार्यक्रम के मौके पर इस तरह सज-धजकर आने की ज़रूरत थी? क्या हमारे राजा-सम्राट के प्रति सच्ची निष्ठा दिखाने के लिए आभूषणों के डिब्बे खाली करके सिर से लेकर पांव तक सजने-धजने की ज़रूरत थी? हमारे यहां स्वराज नहीं हो सकता?"

बेसेंट ब्रितानी हुकूमत की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहती थीं. उन्होंने महात्मा गांधी को उनके भाषण के बीच में ही रोक दिया. हालांकि, छात्रों ने महात्मा गांधी से अपना भाषण जारी रखने को कहा.

इसके बाद दरभंगा के राजा ने हस्तक्षेप करते हुए गांधी को तत्काल कार्यक्रम छोड़कर जाने को कहा.

मीरा बेन, सरला बेन, एनी बेसेंट

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एनी बेसेंट का राजनीतिक सफर

एनी बेसेंट को उनके भड़काऊ बयानों की वजह से ब्रितानी सरकार ने गिरफ़्तार किया था. लेकिन लोगों ने उनकी गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किए और 1917 में उन्हें जेल से रिहा किया गया.

इसके पश्चात एनी बेसेंट साल 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष के रूप में चुनी गयीं.

प्रोफेसर बलमोहन दास कहते हैं, "एनी बेसेंट ने ब्रितानी हुकूमत को स्पष्ट रूप से बता दिया था कि भारत आज़ाद होने के लिए दृढ़संकल्प है."

"उन्होंने स्वदेशी आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया और हिंदू कॉलेज के लड़कों से भी इस लोकप्रिय आंदोलन में हिस्सा नहीं लेने को कहा. वह हिंदू धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा रखने के साथ-साथ ब्रितानी साम्राज्य के प्रति समर्पण के भाव रखती थीं और इस बात को लेकर बेहद सावधान थीं कि वे उनके शिष्यों के बीच खुलकर अलगाववाद और आज़ादी के भाव न पनपाएं."

एनी बेसेंट

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महिलाओं के लिए मताधिकार

एनी बेसेंट भारत में महिलाओं को मताधिकार दिए जाने की पक्षधर थीं. इंग्लैंड में संसदीय समिति के समक्ष उन्होंने कहा था कि महिलाओं के मताधिकार का हनन भारत की महत्वाकांक्षाओं और उम्मीदों को नुकसान पहुंचाएगा.

उन्होंने ये भी कहा था कि भारतीय महिलाओं को अंग्रेज़ी महिलाओं की तुलना में मताधिकार की ज़्यादा आवश्यकता है. उनके इस रुख को लेकर मीडिया ने उनकी आलोचना भी की.

और गांधी के प्रति उनका द्वेष भरा भाव चलता रहा. उनमें ग्राम समिति से लेकर कांग्रेस प्रतिनिधियों और ख़ादी के इस्तेमाल को लेकर भी मतभेद रहे. उनका रुख गांधीवादी नीतियों के ख़िलाफ़ रहा करता था.

जे कृष्णमूर्ति के साथ एनी बेसेंट

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एक बार अपने दोस्त के साथ बात करते हुए उन्होंने कहा था कि "गांधी राजनीति में बच्चे हैं. वह एक ऐसी दुनिया में घूम रहे हैं जिसे वह समझ नहीं पा रहे हैं और उसी दुनिया में सपने देख रहे हैं.".

हालांकि, गांधी उनकी उम्र और अनुभव को देखते हुए हमेशा उनके प्रति सम्मान के भाव रखते थे. उन्होंने एक बार कहा था कि मैंने अपनी याचिकाएं उनके समक्ष इस तरह रखी हैं जैसे एक लड़का अपनी मां के समक्ष रखता है.

एनी बेसेंट ने साल 1933 की 20 सितंबर को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

उनकी मौत पर महात्मा गांधी ने लिखा था, "एनी बेसेंट ने जिस तरह इस देश की सेवा की है, उसका ज़िक्र भारत के इतिहास में तब तक रहेगा जब तक ये मुल्क रहेगा. उनकी यादें लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेंगी. उन्होंने इस देश को स्वीकार करके खुद को इसके प्रति समर्पित कर दिया."

एनी बेसेंट

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मीरा बेन यानी मैडलिन स्लेड

इंग्लैंड के एक अभिजात्य परिवार में जन्म लेने वालीं मैडलिन स्लेड की रुचि घुड़सवारी और बीथोवन के संगीत में थी.

लेकिन उन्होंने अपने परिवार का विलासभरा जीवन छोड़कर भारत को अपना घर बना लिया. गांधी ने उन्हें अपनी बेटी की तरह गोद लेकर उनका नाम बदलकर मीरा बेन रख दिया.

मीरा बेन को महात्मा गांधी के बारे में फ्रांसीसी लेखक रोम्यां रोलां से पता चला. इसके बाद वह भारत से जुड़ी गांधीवादी नीतियों और साहित्य पढ़ने लगीं.

उन्होंने जिस पल भारत आने का फ़ैसला किया, उसी वक़्त मांसाहारी भोजन खाना और शराब पीना बंद कर दिया. वह ज़मीन पर पालथी मारकर बैठने लगीं और हिंदी सीखने लगीं.

उन्होंने गांधी को पत्र लिखकर भारत आने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की और 20 पाउंड का चेक भेजा. लेकिन गांधी ने उन्हें तुरंत भारत आने का न्योता नहीं दिया.

गांधी ने उनके पत्र का जवाब देते हुए लिखा, "अब से एक साल बाद भी तुम्हें भारत आने का दिल करे तो वह तुम्हारे लिए भारत आने का सही वक़्त होगा."

इसके बाद मीरा बेन 1925 में भारत आईं जब वह लगभग 33 वर्ष की थीं.

मीरा बेन

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दिन में 3-4 बार लिखा करती थीं पत्र

महात्मा गांधी जब यात्रा के सिलसिले में बाहर हुआ करते थे तो मीरा बेन को उनकी कमी बहुत खला करती थी. वह दिन में लगभग 3-4 बार महात्मा गांधी को पत्र लिखा करती थीं. वह गांधी की किताबों की प्रूफ़ रीडिंग किया करती थीं.

उन्होंने साड़ी पहनना शुरू करने के साथ ही ब्रह्मचर्य का पालन करने की कसम खाई और अपना सिर मुंडवा लिया.

लेकिन जब वह अपने चालीसवें वर्ष में पहुंची तो आश्रम आने वाले एक क्रांतिकारी पृथ्वी सिंह के प्रति आकर्षित हो गयीं.

गांधी जी ने मीरा बेन से कहा कि अगर वह चाहें तो पृथ्वी सिंह से विवाह कर लें. लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं हुईं.

महात्मा गांधी की सेहत का ध्यान रखते हुए मीरा बेन उन्हें फल और बकरी का दूध देने के साथ-साथ उनका बीपी चेक किया करती थीं. इसके साथ ही वह उनके चरखे का भी ध्यान रखती थीं.

बालमोहन दास कहते हैं, "वह एक पल के लिए भी बापू को अकेला नहीं छोड़ती थीं और उन पर हक़ जताया करती थीं. दोनों के बीच एक तरह का निष्काम संबंध था."

गांधी ने मीराबेन का अपने प्रति हक़पूर्ण व्यवहार देखते हुए उन्हें खादी के प्रचार-प्रसार के लिए पूरे देश की यात्रा करने के लिए भेज दिया. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान वह जेल भी गयीं.

मीरा बेन ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि गांधी के तर्क विचारधारा पर नहीं बल्कि तर्क पर आधारित हैं. उन्होंने कहा था, "वह कोई महात्मा नहीं थे."

उनके और गांधी के बीच विवाहित जोड़ों के बीच ब्रह्मचर्य के पालन को लेकर भी काफ़ी चर्चाएं हुईं.

गांधी के सबसे विवादित विचारों में से एक विचार ये था कि आश्रम में रहते हुए विवाहित जोड़े भी ब्रह्मचर्य का पालन करें हालांकि बच्चे पैदा करने की इजाज़त थी. महात्मा गांधी सालों से इसका पालन कर रहे थे.

मीरा बेन

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नेहरू को लिखे भ्रष्टाचार बढ़ने के पत्र

ब्रितानी ये बात हज़म नहीं कर पा रहे थे कि एक ब्रितानी महिला गांधी का अनुसरण कर रही थी और उन्हें जेल भेजा गया है.

हालांकि, वह गांधी की मौत के बाद भारत में नहीं रह सकीं. उन्होंने नेहरू को पत्र लिखकर भारत में भ्रष्टाचार बढ़ने के बारे में भी बताया था. और 1959 में वह वियना चली गयीं.

भारत सरकार ने उन्हें साल 1982 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया. इसी साल उनकी मौत हो गयी.

ऑल इंडिया रेडियो के पूर्व स्टेशन निदेशक नागासुरी वेणुगोपाल उन्हें भारत की पहली ईको फेमिनिस्ट बताते हैं.

सरला बेन

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सरला बेन यानी कैथरीन मैरी हैलमैन

सरला बेन ने एक बार कहा था कि "मानवता के लिए कोई रंग, नस्ल और राजनीति नहीं है. अगर सरकार सही उद्देश्यों के लिए संघर्ष करने वालों को सज़ा देना चाहती है तो मुझे कुछ नहीं कहना है. वो लोग जो कठिन दौर में विरोध प्रदर्शन करते हैं, उन्हें इसके परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. जब मेरे आसपास लोग बीमारी और ग़रीबी से जूझ रहे हैं तो मैं आश्रम में नहीं बैठ सकती. मैं ब्रितानी सरकार को सुनने की बजाए अपनी अंतरआत्मा को सुनूंगी."

ये बयान एक ब्रितानी महिला ने हुकूमत को दिया था जब वह ब्रितानी शासन के ख़िलाफ़ लड़ने वाले लोगों की सहायता कर रही थीं.

ये कैथरीन मैरी हैलमैन थीं जो कि सरला बेन के नाम से जानी गयीं. कैथरीन का जन्म 1901 में लंदन में हुआ था, उन्होंने इतिहास, भूगोल, फ्रेंच और जर्मन भाषा की पढ़ाई की थी.

सरला बेन ने गांधी के बारे में ब्रिटेन में काम करने वाले एक भारतीय अधिकारी मोहन सिंह मेहता से सुना था जिसके बाद वह भारत आ गईं. उन्होंने भी भारत को अपना घर बनाया और गांधी और उनकी नीतियों को समझा.

सरला बेन

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देश के अलग-अलग इलाकों की यात्रा करने के बाद वह वर्धा आश्रम पहुंचीं. और उनकी मुलाक़ात विनोभा भावे से हुई.

उन्होंने हिंदी भाषा सीखी और साल 1941 में चनौदा आश्रम पहुंचीं. खादी बुनना सीखने के साथ ही उन्होंने पहाड़ों में रहने का फ़ैसला किया.

गांधी ने साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ा था. इस दौर में ब्रितानी सरकार कांग्रेस से जुड़े हर शख़्स को गिरफ़्तार कर रही थी.

सरला बेन स्वतंत्रता आंदोलन में लगे लोगों की मदद किया करती थीं. वह खाने के साथ-साथ दवाइयां एवं संदेश पहुंचाने और कानूनी सलाह देने का काम किया करती थीं.

हालांकि, उनके ब्रितानी महिला होने की वजह से ब्रितानी सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया. लेकिन सरकार ने उन पर निगाह बनाए रखी. और सरकार के आदेश न मानने की वजह से उन्हें भी जेल भेजा गया.

वेणुगोपाल कहते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा ग्रामीण महिलाओं के कल्याण और पर्यावरण की रक्षा में लगा दी. उन्होंने लैंगिक भेदभाव मिटाने एवं भावे के भूदान आंदोलन में भी हिस्सा लिया.

वेणुगोपाल कहते हैं, "सरला बेन ने सुंदरलाल बहुगुणा, विमला बहुगुणा और राधा भट्ट जैसे लोगों की मदद करके उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता बनाया."

वह कहते हैं, "जब ये दुनिया पर्यावरण को लेकर जाग्रत नहीं थी तब गांधी और कुमारप्पा ने इसका प्रस्ताव रखा और सरला एवं मीना बेन ने अपने जीवन में इन आदर्शों का पालन करके दुनिया को दिखा दिया."

सरला बेन की मौत 6 जुलाई, 1982 को हुई.

लेखक पी कोंडाला राव अपनी किताब फॉरेन फ्रैंड्स ऑफ़ इंडियाज़ फ्रीडम में लिखते हैं, "भारतीयों पर अपने देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने का दायित्व था. लेकिन अमेरिकी और ब्रितानी लोगों को देश की आज़ादी के लिए काम करने की ज़रूरत नहीं थी. लेकिन ऐसे कई विदेशी लोग थे जिन्होंने भारत के लिए काम किया और भारतीय लोगों को उनके प्रति शुक्रगुज़ार होना चाहिए."

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