'वॉर ऐंड पीस' में ऐसा क्या लिखा है कि उसे घर में नहीं होना चाहिए

War and Peace, वॉर ऐंड पीस

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    • Author, राजेश प्रियदर्शी
    • पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी

भीमा कोरेगाँव मामले की एक अभियुक्त सुधा भारद्वाज के वकील युग चौधरी ने बीबीसी मराठी के संवाददाता मयूरेश कोन्नूर से कहा है कि कोर्ट में जिस किताब का ज़िक्र किया गया था वो विश्वजीत रॉय की किताब 'वॉर एंड पीस इन जंगलमहल: पीपल, स्टेट एंड माओइस्ट्स'' थी न कि टॉलस्टॉय की 'वॉर एंड पीस'. जस्टिस सारंग कोतवाल ने भी इस मामले में ग़लत रिपोर्टिंग को लेकर दुख जताया है.

नीचे का आलेख नई जानकारी आने से पहले प्रकाशित किया गया था. जब इसे प्रकाशित किया गया तब समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट का किसी ने खंडन नहीं किया था.

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न्यायमूर्ति कहे जाने वाले जजों से न सिर्फ़ इंसाफ़ की, बल्कि समझदारी की भी उम्मीद की जाती है, समझदारी के बग़ैर न्याय कैसे होगा?

पिछले कुछ समय में अदालतों में ऊँची कुर्सी पर बैठे माननीय न्यायाधीशों ने जैसे फ़ैसले सुनाए हैं, जैसी टिप्पणियां की हैं, वे हैरान करने वाली हैं.

कन्हैया कुमार पर राजद्रोह के मुक़दमे की सुनवाई करने वाली जज ने अपने फ़ैसले की शुरुआत हिंदी फ़िल्मी गाने 'मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती...' से की थी. जज प्रतिभा रानी ने कन्हैया कुमार को अंतरिम ज़मानत देते हुए मनोज कुमार से देशभक्ति की प्रेरणा लेने की नसीहत भी दी थी.

राजस्थान हाइकोर्ट के रिटायर्ड जज महेशचंद्र शर्मा ने मोरनी के गर्भवती होने के रहस्य से पर्दा उठाया था और यह भी कहा था कि उनके लिए "पुराण विज्ञान से ऊपर हैं." अब एक जज ने भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में वेरनॉन गोंज़ाल्वेस से पूछा है कि उनके घर में लियो टॉलस्टॉय का उपन्यास 'वॉर ऐंड पीस' क्यों रखा था?

Leo Tolstoy, लियो टॉलस्टॉय

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जब केंद्रीय मंत्री आईआईटी के इंजीनियरों को बता सकते हैं कि भारत के मुनियों ने अणु-परमाणु की खोज की थी. 'गाय ऑक्सीजन लेती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती' है जैसे गहन ज्ञान की बातें मंत्री पद सुशोभित करने वालों के मुंह से सुनाई देने लगे तो विश्व साहित्य के बारे में जानने-समझने जैसे तुच्छ कामों की उम्मीद ही क्यों की जाए.

गोंज़ाल्वेस और एल्गार परिषद के उनके कुछ और साथियों पर 31 दिसंबर 2017 को भड़काऊ भाषण देने का आरोप है, पुलिस का कहना है कि भाषण की वजह से भीमा कोरेगांव में हिंसा की घटना हुई.

कोरेगांव भीमा मामले के अभी काफ़ी तथ्य और दलीलें आनी बाकी हैं और न्यायिक प्रक्रिया अपने तरीके से अपना काम करेगी, उस पर टिप्पणी करना मकसद नहीं है लेकिन विश्व साहित्य की अमूल्य निधि को आपत्तिजनक माने को लेकर सोशल मीडिया पर सैकड़ों लोगों ने हैरत का इज़हार किया है.

वेरनॉन गोंज़ाल्वेस
इमेज कैप्शन, वेरनॉन गोंज़ाल्वेस (बीच में)

हाई कोर्ट के जज सारंग कोटवाल ने गोंज़ाल्वेस से पूछा, "आपने वॉर ऐंड पीस जैसी आपत्तिजनक किताब आपके घर में क्यों रखी थी, आपको कोर्ट को इसका जवाब देना होगा."

जज ने कुछ सीडी और दूसरी किताबों को भी आपत्तिजनक माना है, उन पर बहस की गुंजाइश हो सकती है, हालांकि 'अंडरस्टैंडिंग माओइस्ट्स' जैसी किताब पढ़ने का यह मतलब निकालना कितना दुरुस्त है कि उसे पढ़ने वाला व्यक्ति माओवादी है?

हिटलर की 'मीन कॉम्फ़' की प्रतियां आपको अक्सर बुकशेल्फ़ों पर सजी मिल जाएंगी, क्या इसका मतलब यह होगा कि उसे पढ़ने वाला यहूदियों की सामूहिक हत्या की योजना बना रहा है?

वॉर ऐंड पीस

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टॉलस्टॉय और उनकी किताब

दुनिया भर में किसी भी भाषा में लिखी गई महान साहित्यिक कृतियों की फ़ेहरिस्त, टॉलस्टॉय के दो उपन्यासों 'वार ऐंड पीस' और 'अन्ना कैरनिना' के बग़ैर पूरी नहीं मानी जाती लेकिन जस्टिस कोटवाल ने यह नहीं बताया कि वार ऐंड पीस को वे किस आधार पर आपत्तिजनक मान रहे हैं.

टॉल्सटॉय गांधी से उम्र में तकरीबन 40 साल बड़े थे, गौतम बुद्ध, श्री रायचंद्र के अलावा जिन लोगों को गांधी के आध्यात्मिक प्रेरणास्रोतों में गिना जाता है उनमें लियो टॉलस्टॉय भी शामिल है. गांधी ने कई जगह उनका ज़िक्र अहिंसा, प्रेम और शांति के महान संत के रूप में किया है.

टॉलस्टॉय ने यूरोपीय इतिहास का सबसे ख़ूनी दौर को अपनी आँखों से देखा था, वे एक बड़े ज़मींदार परिवार में पैदा हुए थे, उन्होंने अपनी सारी ज़मीन दान कर दी, वह ग़ुलामी का दौर था, उन्होंने अपने सारे ग़ुलामों को आज़ाद कर दिया, अपने जीवन के दूसरे हिस्से में संन्यासी की तरह रहने वाले टॉल्सटॉय ऐसे जीवन की कल्पना करते थे जिसमें नफ़रत को प्रेम से जीता जा सके.

'वॉर ऐंड पीस' नेपोलियन के दौर में रूस पर हुए फ़्रांसीसी हमले, देश की सामंती व्यवस्था, अन्याय-शोषण और दमन की वृहद गाथा है. इस उपन्यास को पहले किस्तों में छापा गया था और अंत में इसका एक उपन्यास के तौर पर प्रकाशन उसी साल हुआ जिस वर्ष महात्मा गांधी का जन्म हुआ, यानी 1869 में.

पांच सामंतवादी परिवारों के पात्रों की मदद से टॉल्सटॉय शोषण के ज़रिए कमाई गई दौलत और शान की व्यर्थता की एक मानवीय और गहरी कहानी कहते हैं, उनके इस विशाल उपन्यास का दुनिया की 100 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.

Mahatma Gandhi, महात्मा गांधी

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गांधी और टॉल्स्टॉय

गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को 'देशभक्त' बताने वाली सांसद साध्वी प्रज्ञा को प्रधानमंत्री ने 'दिल से माफ़ नहीं' किया है और वे अब विपक्ष की 'मारक शक्ति' पर गहरी चिंता प्रकट कर रही हैं. गोडसेवाद के इस दौर में गांधी और उनके अध्यात्मिक गुरु टॉल्स्टॉय का लिखा-बोला आपत्तिजनक लग ही सकता है.

टॉल्स्टॉय का निधन 1910 में हुआ जब गांधी एक नेता के रूप में उभर रहे थे, गांधी जब अपनी लोकप्रियता के शिखर को छू रहे थे तो 9 सितंबर, 1928 को टॉल्सटॉय की 100वीं जयंती पर उनके बारे में कहा, "उन्होंने जो सिखाया, वही जिया. उनकी सादगी असाधारण थी, वे बिना किसी समझौते के सत्य की राह पर चलते थे, वे अपने दौर में अहिंसा के सबसे बड़े पैरोकार थे. भारत में, या दुनिया में उस दौर में किसी ने आदर्शों का उस निष्ठा से पालन नहीं किया, जितना टॉल्सटॉय ने किया."

यह पहली बार नहीं है कि माओत्से तुंग की जीवनी, कार्ल मार्क्स की 'दास कैपिटल' या चे ग्वरा की 'मोटरसाइकिल डायरीज़' की बरामदगी को नक्सलवादी होने के सबूत के तौर पर पेश किया गया, इसी तरह क़ुरान, उर्दू के अख़बार या किसी धर्म प्रचारक की सीडी को इस्लामी आतंकवाद का पुख़्ता सबूत बता दिया गया.

'वॉर ऐंड पीस' को आपत्तिजनक माना ही जाना चाहिए क्योंकि वह अन्याय और शोषण का क्रूर चेहरा दिखाता है, युद्ध का उन्माद कितना घातक हो सकता है यह बताता है, नस्ली-जातीय घृणा और उस पर आधारित व्यवस्था को ईश्वर के प्रति अपराध बताता है.

टॉल्सटॉय एक उदार मानवतावादी विचारक और लेखक थे. यह उदारता, शांति और मानवता की बातें करने का दौर नहीं है, यह उग्रता, नस्ली-धार्मिक श्रेष्ठता के दंभ और हुंकार का दौर है.

वॉर ऐंड पीस

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लोग गांधी को प्रेरित करने वाले टॉल्स्टॉय को शक की नज़र से देख रहे हैं और गोडसे की किताब (गांधी वध और मैं) की बिक्री बढ़ती हुई बताई जा रही है, यह बता रहा है कि हम कैसे दौर में जी रहे हैं.

भगत सिंह, सावरकर और सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति एक साथ लगाने वाले वही लोग हैं जिन्हें इस बात से कोई मतलब ही नहीं है कि किस किताब में किसने क्या लिखा है. भगत सिंह कम्युनिस्ट थे और उनकी बुकलेट (मैं नास्तिक क्यों हूँ?) बरामद होने पर किसी को हिंदू विरोधी, राष्ट्रविरोधी, पाकिस्तानी कहा जाएगा या नहीं, इसका जवाब भी जल्दी ही मिल जाएगा शायद.

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