गांधी जहां मोहनदास से महात्मा बने, वहां उनके अपमान का सिलसिला जारी- ग्राउंड रिपोर्ट

महात्मा गांधी

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इमेज कैप्शन, चंपारण में गांधी प्रतिमा का यह हाल कर दिया गया है
    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, चंपारण से

बिहार के मोतिहारी के बाद अब पूर्वी चंपारण के तुरकौलिया में गांधी की मूर्ति के अपमान का मामला सामने आया है. तुरकौलिया से एक तस्वीर सामने आई है जिसमें गांधी की मूर्ति पर शराब के रैपर और नाक से माथे तक सिंदूर लगा दिया गया है.

गांधी ने जिस चंपारण से सत्याग्रह शुरू किया, वहां पहले पूर्वी चंपारण के मुख्यालय मोतिहारी शहर के चरखा पार्क में गांधी की आदमक़द मूर्ति को असामाजिक तत्वों ने तोड़ा था.

तुरकौलिया जहां नई घटना सामने आई है, वहां महात्मा गांधी चार अगस्त 1917 को आए थे. ये वही जगह है, जहां ब्रितानी हुकूमत के दौरान नील की खेती करने वाले किसानों को नीम के पेड़ से बांधकर पीटा जाता था.

स्थानीय पत्रकार अजय कुमार बीबीसी को बताते हैं, "ये घटना 15 फ़रवरी की शाम की है. ऐतिहासिक नीम के पेड़ के पास एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है, जिसके पास गांधी घाट है. यहीं गांधी जी की एक प्रतिमा लगी है जिस पर शराब के रैपर की माला पहनाई गई और सिंदूर लगा दिया गया. साफ़ है कि इस जगह पर लोग शराब पीते हैं."

तुरकौलिया से संबंधित घटना पर मोतिहारी के पुलिस अधीक्षक डॉक्टर कुमार आशीष ने बीबीसी से कहा, "इस मामले की सत्यता की जांच कई बिंदुओं पर चल रही है. एक दिन पहले इसकी सूचना मिली थी और वहां जांच टीम भेजी गई थी. वहां पर माला गांधी मूर्ति के पास पड़ी मिली थी. अब एक एसआईटी टीम बनाकर इसकी जांच की जा रही है."

चंपारण

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इमेज कैप्शन, नीम का सूखा पेड़ जिससे निलहे, रैय्यतों को बांध कर पीटा जाता था

क्या है पूरी घटना?

मोतिहारी में आदमक़द प्रतिमा के टूटने की घटना 14 फ़रवरी को सामने आई, जब इलाक़े के लोगों ने चरखा पार्क के पास लगी गांधी प्रतिमा को टूटी हुई स्थिति में देखा. मूर्ति जिस जगह लगी थी वहाँ सिर्फ़ गांधी जी के पाँव ही बचे थे. बाक़ी हिस्सा ज़मीन पर पड़ा था. जिसमें गांधी जी के दोनों हाथ भी टूटे हुए थे. स्थानीय लोगों ने ये जानकारी प्रशासन को दी.

इस मामले में मोतिहारी पुलिस ने एक विशेष टीम गठित करके राजकुमार मिश्रा नाम के व्यक्ति को गिरफ्तार किया है. मोतिहारी पुलिस के ट्वीट के मुताबिक़, "ये काम नशे की हालत में किया गया है. शुरुआती पूछताछ में राजकुमार मिश्रा ने अपना जुर्म क़बूल किया है."

मोतिहारी के एसपी डॉक्टर कुमार आशीष ने बीबीसी को बताया, "यह घटना 13 तारीख़ की रात की है. घटना को अंजाम देने वाले शख़्स का नाम राजकुमार मिश्रा है. ये 19-20 साल का एक लड़का है और वहीं पास के स्लम में रहता है. पेशे से मोटरसाइकिल मैकेनिक है. उसने नशे की हालत में यह तोड़फोड़ की है. उसने पेंचर बनाने वाला सॉल्यूशन पी रखा था. उसी के नशे की हालत में वो पार्क में गया. वहां उसे एक चश्मदीद ने देखा और रोकने की कोशिश भी की लेकिन नशे में धुत वो नहीं रुका और चबूतरे पर चढ़ कर मूर्ति को धक्का देकर तोड़ दिया. हमने 12 घंटे के भीतर उस शख़्स को पकड़ लिया और आगे की कार्रवाई की जा रही है."

उन्होंने बताया कि मूर्ति की क्वालिटी को लेकर मंगलवार को यहां गांधीवादी लोगों ने धरना भी दिया है.

जब हमने डॉक्टर आशीष से ये पूछा कि क्या इस युवक का किसी राजनीतिक संगठन से कोई संबंध था तो उन्होंने कहा, "बिल्कुल नहीं. किसी भी राजनीतिक संगठन या दल से कोई संबंध नहीं है. ये ग़रीब परिवार से ताल्लुक रखता है और इसके पिताजी पेशे से बिजली मिस्त्री हैं."

दरअसल, ये आदमक़द प्रतिमा जहां लगी थी वो चरखा पार्क से सटा हुआ एक नया विकसित हिस्सा है. इस हिस्से का निर्माण पॉवर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पोंसबिलिटी (सीएसआर) के तहत किया था. इसका उद्घाटन सितंबर 2020 में इलाक़े के सांसद राधामोहन सिंह और बिहार सरकार में तत्कालीन कला संस्कृति मंत्री प्रमोद कुमार ने किया था.

ज़िलाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक के मुताबिक़, "सीएसआर एक्टिविटी के तहत मूर्ति लगाई गई थी. इस जगह को औपचारिक तौर पर प्रशासन को नहीं सौपा गया था."

इस घटना के बाद प्रशासन ने चरख़ा पार्क की समुचित सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरा लगाने, नाइट गार्ड और रोशनी की व्यवस्था करने का निर्देश दिया है.

महात्मा गांधी

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इमेज कैप्शन, गांधी प्रतिमा के पास होमगार्ड की तैनाती

'ये बनावटी गिरफ़्तारी है'

मोतिहारी स्थित गांधी संग्रहालय के प्रभारी और गांधीवादी ब्रज किशोर सिंह कहते हैं, "ये बनावटी गिरफ़्तारी है. इसमें असल बात कोई और है. षड्यंत्र है जिसका हम लोग पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं."

बीबीसी से बातचीत में स्थानीय लोगों ने बताया कि ये पार्क नशा करने वालों का अड्डा बना हुआ है. पार्क के पास रहने वाले डॉ आशुतोष शरण बताते हैं, "पार्क इन दिनों नशे में धुत लोगों का अड्डा बन गया है. शाम होते ही यहाँ असामाजिक तत्वों का जमावड़ा होने लगता है. जिसके कारण स्थानीय लोगों का जीवन मुश्किल हो गया है. पार्क तो बना दिए गए हैं लेकिन यहां कोई सिक्योरिटी गार्ड नहीं रखा गया."

बीबीसी ने भी 16 फ़रवरी की सुबह पार्क को देखा तो यहाँ सुरक्षा के कोई इंतज़ाम नहीं थे. चरखा पार्क के मुख्य हिस्से में बैठने के लिए लगाई गई स्टील की कुर्सियां टूटी पड़ी थीं. साथ ही, कुछ युवा यहां सेल्फ़ी लेने पहुँचे थे. उन युवाओं में से एक, अनिल ने कहा, "मुझे घटना की कोई जानकारी नहीं है. हम तो यहां बिहार बोर्ड की परीक्षा के लिए मोतिहारी आए हैं."

महात्मा गांधी की आदमक़द मूर्ति के पाँव ही वहां बचे हैं जबकि बाकी हिस्से को कंबल में लपेटकर प्रशासन ने उसे नगर थाने में रख दिया है. हालांकि गांधी की मूर्ति के टूटे हुए दोनों हाथों का हिस्सा और छड़ी अभी भी पार्क में ही कंबल में लपेटकर रखे हुए हैं. ये जहाँ रखा हुआ है उसकी बांउड्री की ऊंचाई बहुत कम है इसलिए कोई भी इसे आसानी से पार कर सकता है.

महात्मा गांधी की टूटी प्रतिमा

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गांधी और चंपारण का रिश्ता

महात्मा गांधी ने भारत में अपना पहला सत्याग्रह चंपारण के मोतिहारी से ही शुरू किया था. सत्याग्रह के सौ साल गुज़र जाने के बाद भी दीवारों पर गांधी के चित्र आपको मोतिहारी शहर में आसानी से दिख जाते हैं. यहां के कई संस्थान, निजी दुकानों के नाम गांधी के नाम पर है, जिससे उनके प्रभाव को इस इलाक़े में समझा जा सकता है.

साल 2017 में चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी समारोह के बाद मोतिहारी में महात्मा गांधी से जुड़े कई स्मारकों का निर्माण किया. चरखा पार्क उन्हीं में से एक है. मोतिहारी शहर से सटा चन्द्रहिया गांव जहाँ गांधी अपनी यात्रा के शुरू में पहुँचे थे, वहां पर भी आपको गांधी जी का प्रभाव साफ़ दिखता है.

गांधी और चंपारण सत्याग्रह पर कई किताबें लिखने वाले रिसर्चर भैरव लाल दास कहते हैं, "गांधी के प्रति बहुत लगाव है इस इलाक़े में. गांधी चंपारण में आठ महीने रहे और आज भी ग्रामीण अपनी पीढ़ियों को ये बताते हैं कि गांधी के कारण ही उन्हें आज़ादी मिली. ऐसे में इस इलाक़े में अगर कोई ऐसी घटना घटती है तो ये किसी सनकी प्रवृत्ति के ही आदमी का काम है."

मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग में सहायक प्राध्यापक अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी कहते हैं, "भारत में महान व्यक्तियों की प्रतिमाओं को खंडित करने का इतिहास पुराना है. ईश्वरचंद्र विद्यासागर और विवेकानंद जैसे समाज सुधारकों की प्रतिमाएं तोड़ी गई हैं. अभी गांधी की मूर्ति के साथ जो कुछ हुआ वो निंदनीय है और राज्य सत्ता को ऐसे लोगों से सख़्ती से निपटने की ज़रूरत है."

बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल ने बीबीसी से कहा, " ये बहुत निंदनीय है. बाकी बिहार में सरकार लगातार शराबबंदी के खिलाफ अभियान चला रही है. लेकिन जागरुकता की कमी के चलते अभी भी इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं."

तुरकौलिया

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जॉर्ज ऑरवेल की भी प्रतिमा टूट चुकी

अंग्रेजी साहित्य के विश्वविख्यात उपन्यासकार जॉर्ज ऑरवेल का जन्म मोतिहारी में साल 1903 में हुआ था. 1984 और एनिमल फार्म जैसी विश्वप्रसिध्द कृतियों के लेखक जॉर्ज आरवेल की मूर्ति भी साल 2021 में असामाजिक तत्वों ने तोड़ दी थी. इससे पहले बी आर अंबेडकर की मूर्ति भी मोतिहारी में तोड़ी गई थी.

'गांधी का चंपारण' नाम की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने वाले बिश्वजीत मुखर्जी बताते हैं, "साल 2015 से ही मोतिहारी में एक तरह का एजेंडा सेट करने की कोशिश हो रही है जिसमें केंद्र गांधी वर्सेज ऑरवेल को बनाया जा रहा है. जबकि देखें तो गांधी जहां अपने कर्मों के जरिए साम्राज्यवाद से लड़ रहे थे वहीं ऑरवेल अपने लेखनी से साम्राज्यवाद और अधिनायकवाद के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे. एक साल बीत जाने के बाद भी अब तक ऑरवेल की मूर्ति फिर से नहीं लग सकी है."

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