जब भारत आने वाले पहले रूसी यात्री से धर्म बदलने को कहा गया था

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- Author, जान्हवी मुळे
- पदनाम, बीबीसी मराठी सेवा
अक्सर कहा जाता है कि भारत और रूस के बीच संबंध काफ़ी गहरे और दोस्ताना रहे हैं. लेकिन ये दोस्ती आख़िर कितनी पुरानी है और दोनों देशों के बीच लोगों के आने-जाने का सिलसिला कब शुरू हुआ? इस सवाल का जवाब इतिहास की किताबों में मिलता है.
ये उस दौर की कहानी है जब भारत में मुगल साम्राज्य की शुरुआत भी नहीं हुई थी. बाबर अभी पैदा भी नहीं हुए थे. दिल्ली पर लोदी वंश का शासन शुरू ही हुआ था और दक्कन में विजयनगर और बहमनी सल्तनत राज कर रहे थे.
वास्को डी गामा का जन्म कुछ समय पहले ही हुआ था और उनके भारत आने में तीन दशक बाकी थे.
ये साल था 1469, जब रूसी यात्री अफ़नासी निकितिन एक घोड़े और अपनी डायरी के साथ भारत आ पहुंचे.
इस दौर का भारत कैसा दिखता था? निकितिन ने न सिर्फ़ इस दौर के भारत को देखा बल्कि उसके बारे में विस्तार से लिखा भी.
दीव और गुजरात से होते हुए वह महाराष्ट्र के तटीय गाँव चौल में पहुंचे और दक्कन के ग्रामीण इलाकों से होते हुए वर्तमान के तेलंगाना पहुंचे.
निकितिन की कहानी एक बॉलीवुड फ़िल्म 'परदेसी' के ज़रिए भी बताई गई है जिसमें हिंदी सिनेमा के कई नामचीन अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने काम किया है.
इसके साथ ही चौल में उनकी याद में एक स्मारक बनाया गया है.
लेकिन सवाल ये उठता है कि निकितिन कौन थे और उनकी कहानी इतनी दिलचस्प क्यों है?

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वोल्गा से कुंडलिका तक का सफर
रूसी दस्तावेज़ों के मुताबिक़, अफ़नासी निकितिन एक रूसी यात्री और व्यापारी थे जिनका जन्म 1433 में रूसी शहर त्वेर में हुआ था.
उनके भारत आने से पहले की ज़िंदगी के बारे में बहुत कम बातें मालूम हैं. लेकिन कोई भी इस बात का अंदाज़ा लगा सकता है कि उन्होंने यात्रा करने का फ़ैसला क्यों किया.
इस दौर में त्वेर व्यापारियों का गढ़ माना जाता था. वोल्गा नदी के तट पर स्थित त्वेर शहर साहसी व्यापारियों के लिए चर्चित था जो यूरोप और मध्य एशिया की यात्राएं किया करते थे.
निकितिन ने भी ऐसी ही व्यापारिक यात्रा पर निकलने का फ़ैसला करके 1466 में त्वेर छोड़ दिया.
कहा जाता है कि उन्हें किसी ने बताया था कि भारत में घोड़ों की अच्छी नस्लों की कमी है. ऐसे में उन्होंने अपने साथ एक घोड़ा ले जाने का फ़ैसला किया.
निकितिन ने अपनी इस यात्रा के बारे में विस्तार से लिखा है जिससे मध्यकालीन भारत के व्यापारिक रास्तों के बारे में जानकारी मिलती है.
निकितिन ने बताया है कि उन्होंने कैसे वोल्गा नदी से कैस्पियन सागर की यात्रा की.

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इस सफर में उन्हें दो बार लूटा गया. इस यात्रा में उनके साथ कुछ अन्य लोग भी आ रहे थे जिन्होंने वापस जाने या जहां पहुंच गए थे वहीं रुकने का फ़ैसला किया.
लेकिन निकितिन आगे बढ़ते गए. इसके बाद वह पर्शिया (आज का ईरान) में घुसे, होरमुज़ पहुंचे और वहां से अरब सागर के रास्ते भारत पहुंचे.
निकितिन की नाव सबसे पहले दीव पहुंची जिसके बाद वह गुजरात में खंबात पहुंचे. बंदरगाह पहुंचकर उन्होंने इंडिगो यानी नील के बारे में लिखा है जो कि रूस में काफ़ी महंगी हुआ करती थी.
इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र की कुंडलिका नदी के मुहाने पर स्थित चौल बंदरगाह की ओर यात्रा शुरू की.
रूसी इतिहासकार मानते हैं कि अफ़नासी निकितिन ने भारतीय सरज़मीं पर पहली बार अपने पैर चौल में ही रखे थे.
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निकितिन ने दक्कन में क्या देखा
महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले के अलीबाग़ शहर के दक्षिण में मुंबई से 110 किलोमीटर दूर स्थित चौल एक सामान्य-सा गाँव है.
नारियल, पाम समेत तमाम अन्य उष्णकटिबंधीय जलवायु वाले पेड़ों से घिरा चौल किसी दूसरे तटवर्ती गाँव जैसा ही लगता है.
लेकिन ये सामान्य सा दिखने वाला तटवर्ती गाँव अपने आप में दो हज़ार साल का इतिहास समेटे हुए है.
कई ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और यात्रियों ने इस बंदरगाह का ज़िक्र अलग-अलग नामों जैसे चंपावती, चिउल और चिवली के रूप में किया है.
मध्यकालीन दौर में चौल एक बड़ा बंदरगाह शहर हुआ करता था जहां सुदूरवर्ती देशों से व्यापारी आया करते थे. वे कुंडलिका नदी से बंदरगाह में घुसते हुए एक स्थान पर आया करते थे जो कि अब रेवडंडा के पास स्थित गाँव में है.

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अफ़नासी निकितिन इन व्यापारियों में से एक थे. वह साल 1469 में किसी समय यहां पहुंचे और अपनी डायरी में उन्होंने यहां के लोगों के बारे में लिखा.
उन्होंने लिखा, "यहां सभी लोग नग्न रहते हैं. ये अपने सिर को नहीं ढकते. नंगे पैर चलते हैं. यहां महिलाएं अपने बालों को एक चोटी में बांधती हैं. समृद्ध लोग अपने सिर ढकते हैं. वे अपने कंधे पर एक कपड़ा रखते हैं और दूसरा कमर पर बांधते हैं.
महिलाएं कमर पर एक कपड़ा बांधती हैं और उनके स्तन ढके नहीं रहते हैं. यहां महिलाओं और पुरुषों की त्वचा का रंग गहरा होता है. मैं जहां भी जाता हूं, लोग मेरी गोरी त्वचा को देखकर मोहित नज़र आते हैं."
निकितिन की डायरी पढ़ते हुए कोई भी ये कल्पना कर सकता है कि एक रूसी के रूप में उन्हें ये सब देखना कितना दिलचस्प लगा होगा.
निकितिन चौल से पाली गए और वहां से जुन्नर पहुंचे. वह लिखते हैं कि "लगातार चार महीनों तक दिन-रात पानी बरसता रहा और हर जगह कीचड़ हो गया".
वह लिखते हैं कि इन दिनों में लोग कैसे अपने खेतों पर काम करते थे और खिचड़ी खाते थे.
जुन्नर में निकितिन के साथ कुछ ऐसा घटा जिसकी वजह से उनकी आस्था और धर्म को चुनौती मिली.
असद ख़ान नाम के एक स्थानीय नेता ने निकितिन का घोड़ा छीन लिया और आदेश दिया कि ईसाई धर्म को मानने वाले निकितिन को अपना घोड़ा लेने के लिए इस्लाम धर्म स्वीकार करना पड़ेगा या भारी जुर्माना देना पड़ेगा.
निकितिन के लिए ये एक भारी समस्या थी. लेकिन तुर्की मूल के एक मुसलमान मंत्री मोहम्मद खोरसन इस मामले में निकितिन की मदद के लिए आगे आए.
खोरसन ने असद ख़ान को डांटते हुए निकितिन पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव डालने से मना किया. इसके बाद उन्होंने निकितिन का घोड़ा वापस करवाया और दोनों अच्छे दोस्त बन गए.
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बहमनी और विजयनगर
इसके बाद निकितिन बहमनी सल्तनत की राजधानी बीदर पहुंचे जहां वह अपना घोड़ा बेचने में सफल हुए. इसके बदले में उन्हें अच्छी-ख़ासी रकम मिली और वह विजयनगर साम्राज्य की ओर बढ़े.
निकितिन ने इन दोनों शक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता के बारे में भी लिखा है. वह श्रीशैला की धार्मिक यात्रा पर भी गये जहां वह 'हाथी के सिर' और 'बंदर के चेहरे' वाले देवताओं की मूर्तियां देखकर चकित रह गए. उन्होंने मंदिर में होने वाले भंडारे के बारे में भी लिखा है.
निकितिन ने रमज़ान के दौरान व्रत भी रखा. वह गुलबर्गा भी पहुंचे और रायचूर और गोलकुंडा में हीरे की खान देखने पहुंचे.
इस वक़्त तक वह भारत में लगभग तीन साल का समय गुज़ार चुके थे और अब घर वापस जाने का वक़्त आ गया था.
चौल से 180 किलोमीटर दूर दाभौल बंदरगाह से उन्होंने वापसी की यात्रा शुरू की.
उन्होंने लिखा है कि मिस्र, अरब और तुर्की से घोड़ों समेत अन्य चीज़ों को यहां बेचने के लिए लाया जाता है.
दाभोल से निकितिन इथियोपिया गए और वहां से ईरान पहुंचे. इसके बाद उन्होंने क्राइमिया और कीएव (मौजूदा यूक्रेन) से सड़क मार्ग से अपनी यात्रा जारी रखी.
लेकिन 1472 में अपने शहर त्वेर पहुंचने से पहले ही रूस के स्मोलेंस्क में निकितिन की मौत हो गई.
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बॉलीवुड फ़िल्म और चौल में स्मारक
निकितिन की मौत के बाद से रूस में तमाम साम्राज्य और शासक आकर जा चुके हैं. लेकिन आज़ादी के बाद भारत में और सोवियत संघ में निकितिन को दोनों देशों के बीच दोस्ती के प्रतीक के रूप में देखा गया.
यही नहीं, भारत और रूसी फ़िल्म निर्माताओं ने उनके जीवन पर एक फ़िल्म 'परदेसी' भी बनाई जिसे साल 1957 में रिलीज़ किया गया.
ये फ़िल्म दो भाषाओं रूसी (रंगीन) और हिंदी (ब्लैक एंड व्हाइट) में रिलीज़ की गई थी.
इस फ़िल्म में नरगिस, पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, पद्मिनी जैसे बड़े कलाकारों ने काम किया और रूसी अभिनेता ओलेग स्ट्रीजेना मुख्य भूमिका में थे.
इस फ़िल्म में मन्ना डे के 'यार दसविदानिया' जैसे गाने और लता मंगेशकर और मीना कपूर की आवाज़ में गाने हैं.
साल 2002 में चौल में रूसी वाणिज्य दूतावास की मदद से एक स्मारक स्तंभ बनाया गया है. ये स्मारक एसआरटी हाई स्कूल के परिसर में मौजूद हैं जहां अक्सर रूसी लोग और इतिहासकार पहुंचते हैं.
इसके साथ ही क्राइमिया के फ़िओडोसिया और त्वेर में भी उनके स्मारक मौजूद हैं.
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निकितिन की डायरी अहम क्यों है?
निकितिन अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों तक डायरी लिखते रहे. उनकी मौत के कई साल बाद उनकी डायरी दुनिया की नज़रों में आई और फ़िलहाल एक मोनैस्ट्री में रखी गई है.
इस डायरी को "खोजेनिये ज़ा त्रि मोर्या" यानी 'तीन सागरों के पार यात्रा' के नाम से जाना जाता है. निकितिन ने तीन सागरों कैस्पियन सागर, अरब सागर और काला सागर पार किया था.
इस डायरी को रूसी भाषा में भारत के बारे में विस्तार से लिखा गया पहला दस्तावेज़ माना जाता है.
निकितिन 15वीं शताब्दी में भारत आने वाले इकलौते यूरोपीय यात्री नहीं थे. लेकिन उन्होंने जो देखा और लिखा, वह उन्हें अलग बनाता है.
ये कहना है कोल्हापुर की शिवाजी यूनिवर्सिटी के विदेशी भाषा विभाग में पढ़ाने वाली डॉक्टर मेघा पानसरे का.
मेघा बताती हैं, "ये शख़्स तमाम दुश्वारियां झेलते हुए भारत पहुंचा और सबसे ख़ास बात ये है कि इन्होंने ग्रामीण भारत पहुंचकर वहां के बारे में लिखा. उनकी यात्रा अलग थी, वह आम लोगों के साथ घुले-मिले और स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण जीवन को देखा और लिखा.
उन्होंने जो लिखा, वह रूसी नज़रिये से लिखा. वह जब महिलाओं के बारे में बात करते हैं तो लिखते हैं कि कैसे महिलाओं ने अपने बाल नहीं ढके हैं क्योंकि उनके देश रूस में महिलाएं हमेशा बाल ढककर रखती थीं."
निकितिन को अपने दौर के दूसरे यात्रियों की तरह शाही समर्थन हासिल नहीं था लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी. ये बताता है कि वह इस देश के प्रति कितने आकर्षित थे.
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निकितिन ने अपनी डायरी में तत्कालीन भारतीय समाज का भी वर्णन किया है. उन्होंने कई मुसलमानों और हिंदुओं से दोस्ती की, नारियल की ताड़ी पी, कटहल खाया और अपनी ज़िंदगी में पहली बार घी का स्वाद चखा.
वह लिखते हैं कि कैसे लोग गाय और बैलों को घोड़ों से ज़्यादा तरजीह दिया करते थे. इसके साथ ही उन्होंने समुदायों के बीच अमीरी और ग़रीबी की गहरी खाई का ज़िक्र किया. उन्होंने लिखा कि एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय में शादी और खाना नहीं खाते थे.
मेघा पानसरे कहती हैं, "हमारे पास इतिहास के सीमित स्रोत हैं और ये डायरी सबसे पुख़्ता स्रोतों में से एक है. मुझे लगता है कि उनकी डायरी एक स्वस्थ और सांस्कृतिक रूप से विविध विरासत के बारे में बताती है.
ये देखा जा सकता है कि इस दौर में कई मुस्लिम शासक थे जिनमें से कई काफ़ी अच्छे भी थे. निकितिन अलग-अलग धर्मों के लोगों के सह-अस्तित्व की बात करते हैं. आज के दौर में ये जानना काफ़ी अहम है."
वह बताती हैं कि "निकितिन ईसाई धर्म को मानने वाले थे और जब उनसे उनका धर्म बदलने को कहा गया तो वह परेशान हो गए. इसी मौके पर वह लिखते हैं, अगर आप यहां आना चाहते हैं तो अपनी आस्था और धर्म पीछे छोड़कर आएं. लेकिन तथ्य ये है कि वह यहां रहते हुए अपने धर्म का पालन कर सके."
डॉक्टर मेघा पानसरे जैसे विशेषज्ञ मौजूदा समय में निकितिन की कहानी जानने पर ज़ोर देते हैं.
वह कहती हैं, "हम भारत और रूस के बीच दोस्ताना संबंधों पर बात करते हैं कि इन संबंधों ने कैसे भारत के लिए यूक्रेन युद्ध पर एक रुख़ अख़्तियार करना मुश्किल कर दिया है. लेकिन अगर हम सच में इन दोनों देशों के बीच के समीकरण को समझना चाहते हैं तो हमें अफ़नासी निकितिन को समझना पड़ेगा. क्योंकि अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें तो हमें पता चलता है कि हमारे संबंध कितने गहरे हैं और हम एक-दूसरे से कैसे जुड़े हुए हैं."
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