रूस को भारत के क्वॉड में शामिल होने से दिक़्क़त क्या है?

ट्रंप और पुतिन

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत और रूस की दोस्ती के चर्चे एक बार फिर से सुर्ख़ियों में है.

इससे पहले भारत-चीन सीमा तनाव के बीच जब रूस में दोनों देश के विदेश मंत्रियों की मुलाक़ात हुई थी, उस वक़्त भी रूस के साथ भारत की दोस्ती चर्चा में थी.

लेकिन इस बार चर्चा चीन की वजह से नहीं. भारत और अमेरिका की नज़दीकीयों की वजह से है.

भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने एक साथ क्वॉड समूह बनाया और इस समूह को औपचारिक कर दिया.

हालांकि ये समूह 2007 से अस्तित्व में था लेकिन तब ये अनौपचारिक समूह माना जाता था.

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वैसे दुनिया क्वॉड को चीन के ख़िलाफ़ एक समूह के तौर पर देखती है. पर अब रूस इस समूह में भारत की एंट्री से थोड़ा असहज है.

सार्वजनिक तौर पर इसके बारे में रूस ने खुल कर कभी कुछ नहीं कहा, पर जानकार मानते हैं कि रूस ने भारत को साफ़ और कड़े शब्दों में अपनी आपत्ति दर्ज करा दी है.

रूस और भारत के बीच वार्षिक सम्मेलन पिछले 20 सालों से लगातार हो रहा है. पर इस बार ये सम्मेलन नहीं हो रहा है. भारत और रूस ने इस सम्मेलन के ना होने के पीछे कोरोना महामारी को वजह बताया है.

लेकिन विपक्ष के नेता राहुल गांधी को इसके पीछे क्वॉड समूह को कारण बता रहे हैं. बुधवार को उन्होंने ऐसा ही एक आर्टिकल ट्विटर पर शेयर किया.

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क्वॉड समूह

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रूस को क्वॉड से दिक़्क़त क्या है?

भले ही विदेश मंत्रालय और राहुल गांधी के बयान रूस और भारत के बीच वार्षिक शिखर सम्मेलन ना होने के कारणों को लेकर हो, लेकिन ये बात सच है कि क्वॉड समूह को लेकर रूस थोड़ा असहज ज़रूर है.

8 दिसंबर को सरकारी थिंक टैंक रशियन इंटरनेशनल अफ़ेयर्स काउंसिल को वीडियो कॉन्फ़्रेसिंग से संबोधित करते हुए रूसी विदेश मंत्री ने कहा था कि पश्चिमी देश भारत के साथ उसके क़रीबी रिश्तों को कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं.

उनका इशारा क्वॉड समूह की ओर ही था.

उसके बाद भारत में रूस के राजदूत निकोल कुदशेव ने भी हाल ही में हिंद महासागर में यूरेशियन साझेदारी की पेशकश की थी.

इसलिए ये समझना ज़रूरी है कि भला रूस को इस समूह से दिक़्क़त क्या हो सकती है?

क्वॉड समूह

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मॉस्को में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार विनय शुक्ल बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "ये बात सच है कि कोरोना की वजह से ही वार्षिक शिखर सम्मेलन इस साल नहीं हो रहा है. ये बात भी सही है कि रूस इस समूह को लेकर थोड़ा असहज है."

रूस क्वॉड से क्यों असहज है, इसके लिए विनय शुक्ल दो मुख्य कारण गिनाते हैं.

"पहला ये कि रूस के हिसाब से भारत का इस समूह में शामिल होना थोड़ा अनैतिक है. दूसरा ये कि रूस को लगता है कि आगे चल कर क्वॉड रूस के लिए भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ख़तरा साबित हो सकता है.''

अमेरिका और रूस एक दूसरे के धुर विरोधी हैं. अमेरिका क्वॉड में शामिल है. भले ही क्वॉड को चीन के ख़िलाफ़ माना जा रहा हो, लेकिन रूस को लगता है कि इस समूह का नियत्रंण अमेरिका के हाथ में होगा. इस तरह से भारत 'एंटी-रसिया' ख़ेमे का हिस्सा बन जाएगा. इंडो-पैसेफ़िक में जो रूसी फ्लीट है उसके लिए ख़तरा पैदा हो सकता है."

हालांकि जेएनयू के सेंटर फ़ॉर रशिन स्टडी में प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, "रूस भले ही अपने रशियन फ्लीट की सुरक्षा को लेकर आशंकित हो, लेकिन मुझे नहीं लगता कि भारत कभी भी रूस विरोधी गतिविधि में शामिल होने के लिए तैयार होगा. क्वॉड पूर्णत: चीन से निपटने के लिए बनाया गया है. भारत क्वॉड को इसी रूप में देखता है लेकिन खुल कर कभी इस बात को नहीं कहता"

रूस ने निभाई मध्यस् की भूमिका

इस साल मई के महीने से ही लद्दाख सीमा में भारत-चीन के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है. बात ज़्यादा बिगड़ी तो रूस में ही भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीन के रक्षा मंत्री से मुलाक़ात की.

कई जानकारों का मानना है कि भारत के कहने पर ही रूस दोनों देशों में तनाव के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. डोकलाम विवाद के समय पर भी रूस इस तरह की भूमिका निभा चुका है.

ऐसे में जानकार मानते हैं कि जब भारत-चीन सीमा पर तनाव चल ही रहा हो और रूस की मध्यस्थता की भूमिका बरक़रार भी हो, तो भारत का एक 'एंटी-चीन' समूह का हिस्सा बनना अनैतिक है.

ग़ौरतलब है कि दुनिया की नज़र में क्वॉड भले ही चार समान विचारधारा वाले देशों का एक समूह हो. लेकिन इसे 'एंटी-चाइना' समूह के तौर पर ही देखा जा रहा है.

अमरीकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर और विदेश मंत्री माइक पोम्पियो, भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर

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'बेका समझौते' से आशंकित रूस

वैसे क्वॉड समूह का प्रस्ताव साल 2007 में जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने पहली बार रखा था जिसे भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने समर्थन दिया था. उस वक़्त साउथ चाइना समुद्र में चीन ने अपनी प्रभुता दिखानी शुरू की तो सबको चिंता होने लगी कि दुनिया के नियमों को ताक पर रख चीन अपनी मर्ज़ी चलाने लगेगा. भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया का कारोबार इस रास्ते से होता है. उस वक़्त क्वॉड कोई आक्रामक रवैया नहीं था.

पिछले साल इन चारों देश के प्रतिनिधियों की मुलाक़ात न्यूयॉर्क में हुई थी. इस साल की बैठक टोक्यो में हुई. जिसके बाद ये औपचारिक समूह बन गया है.

जेएनयू में संजय पांडे सेंटर फ़ॉर रशियन स्टडी में प्रोफ़ेसर हैं. भारत रूस के संबंधों पर उनकी अच्छी पकड़ है.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "रूस को लगता है कि क्वॉड समूह में शामिल होने से ये औपचारिक हो गया है कि भारत और अमेरिका के सामरिक और सैन्य रिश्ते हैं. क्वॉड भले ही सैन्य संधि ना हो. लेकिन इस समूह के कुछ प्रावधान ऐसे हैं जो आंशिक रूप से सैनिक संधि जैसे प्रतीत होते हैं. इसलिए रूस क्वॉड में भारत के होने से चिंतित है"

दरअसल अक्टूबर में क्वॉड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद भारत-अमेरिका के बीच 'बेका समझौता' हुआ है.

भारत - अमेरिका 2+2 बैठक

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बेका यानी बेसिक एक्‍सचेंज ऐंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (BECA). इस समझौते के तहत भारत और अमेरिका एक-दूसरे के साथ अत्याधुनिक सैन्य प्रौद्योगिकी, साज़ो-सामान और भू-स्थानिक मानचित्र साझा करेंगे.

इस समझौते के बाद अमेरिकी रक्षा मंत्री माइक एस्पर ने कहा था, "दोनों देशों के बीच रक्षा समझौते हमारे साझा मूल्यों और हितों पर आधारित हैं. सब के लिए खुला और स्वतंत्र इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र हो इसके लिए हम कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े हैं, ख़ासकर चीन की बढ़ती आक्रामकता और अस्थिर करने वाली गतिविधियों के मद्देनज़र."

रूस की चिंता का एक आधार ये बेका समझौता है.

प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, "अभी तक अमेरिका ने ऐसा सैन्य समझौता ब्रिटेन, नेटो, ऑस्ट्रेलिया और इसराइल जैसे देशों के साथ ही किया था. इन देशों के बाद भारत पहला देश है जिसके साथ अमेरिका ने ऐसा समझौता किया है."

भारत अमेरिका की नज़दीकी को देखते हुए रूस भारत को लेकर थोड़ा आशंकित रहता है. इस समझौते को लेकर पाकिस्तान और चीन की तरफ़ से तीखी प्रतिक्रिया आई थी.

हालांकि भारत के लिए रूस बड़ा सहयोगी है और अमेरिका भी है.

पुतिन और मोदी

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क्या भारत की विदेश नीति को डिक्टेट कर रहा है रूस?

लेकिन रूस और भारत के बीच वार्षिक शिखर सम्मेलन ना होने की वजह से कई जानकार सोशल मीडिया पर सवाल पूछ रहे हैं कि रूस भारत की विदेश नीति को डिक्टेट करने की कोशिश तो नहीं कर रहा?

गज़ाला वहाब 'फ़ोर्स' मैग़जीन की कार्यकारी संपादक हैं. बीबीसी से बातचीत में गज़ाला कहती हैं कि रूस भारत की विदेश नीति को डिक्टेट कर रहा है ये कहना बिल्कुल ग़लत होगा.

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"भारत-चीन तनाव के बीच रूस को मध्यस्थ की भूमिका में आने के लिए भारत ने कहा था. भारत को लगता है कि चीन पर रूस का प्रभाव है. चीन रूस की बात सुन लेगा. मनमोहन सिंह सरकार में एक वक़्त ऐसा आया था जब चीन और भारत के बीच तनाव में रूस ने ऐसी भूमिका निभाई थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब वुहान गए थे उस वक़्त भी सीमा पर दोनों देशों में तनाव था. रूस ने उस दौरे में भी अहम भूमिका निभाई थी. चीन और भारत के बीच तनाव की परिस्थिति में भारत हमेशा रूस के पास जाता रहा है.

भारत ने रूस को मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए एक स्पेस दिया है. अमेरिका रूस जैसी भूमिका भारत-पाकिस्तान संदर्भ में निभाए, भारत ने वो ओहदा अमेरिका को कभी नहीं दिया. जबकि राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार अपनी तरफ़ से इसकी पेशकश भी की है.

पुतिन और मोदी

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इससे ये बात साफ़ है कि रूस भारत की विदेश नीति को डिक्टेट नहीं कर रहा.

हाँ, इतना ज़रूर है कि रूस अब भारत को बता रहा है कि भारत एक साथ दो घोड़ों पर सवारी नहीं कर सकता. भारत को फ़ैसला करना है कि भारत को किसके साथ रहना है. "

प्रोफ़ेसर संजय पांडे भी ग़जाला की इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. उनके मुताबिक़ रूस खुल कर ये नहीं कहता कि भारत, रूस अमेरिका में से एक को चुने. लेकिन कहीं ना कहीं उसका तात्पर्य यही होता है.

भारत इस समय 'मल्टीपल पार्टनरशिप' की नीति पर चल रहा है. जिसमें बहुत सारे महत्वपूर्ण पार्टनर होंगे. जिसमें रूस और अमेरिका दोनों निश्चित तौर पर सबसे आगे होंगे.

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