वो तस्वीरें जिन्होंने दुनिया को गुमराह किया
- Author, डायना रस्क
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
2015 में कई तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए पर कुछ ग़लत कारणों से. पत्रकारों को भी अपना काफ़ी वक़्त फ़र्ज़ी तस्वीरों का पर्दाफ़ाश करने में ख़र्चना पड़ा.
कुछ झूठी तस्वीरें जानबूझकर जनता को गुमराह करने के लिए प्रकाशित की गईं. कई बार तो ऐन उस वक़्त जब ख़बरें ब्रेक हो रही थीं.
क्या आपको भी ऐसी झूठी तस्वीरों ने गुमराह किया?
नेपाल भूकंप के बाद की हृदय विदारक तस्वीर

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नेपाल भूकंप के बाद ये तस्वीर सोशल मीडिया पर सबसे ज़्यादा साझा की गई. ये तस्वीर झूठी नहीं पर गुमराह करने वाली ज़रूर है.
इसके साथ लिखा गया, "चार साल का भूकंप पीड़ित भाई अपनी दो साल की बहन को बचाते हुए."
असल में यह तस्वीर 2007 में वियतनाम के एक गांव में ली गई थी.
तस्वीर लेने वाले फ़ोटोग्राफ़र ना सन नियेन कहते हैं, "यह सबसे ज़्यादा साझा की गई तस्वीर है, लेकिन दुर्भाग्य से ग़लत संदर्भ में."
नेपाल भूकंप के दौरान वीडियो

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यूट्यूब और फ़ेसबुक पर भूकंप के बाद एक वीडियो भी शेयर हुआ, जिसे सुरक्षा कैमरे की फ़ुटेज बताया गया.
इसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी भूकंप का असर दिखाने के लिए इस्तेमाल किया. दरअसल यह पुराना वीडियो संभवत: 2010 में मैक्सिको के भूकंप का था.
कुछ लोगों ने इसे पहचान लिया. यूट्यूब पर एक यूज़र की टिप्पणी थी, "जब भी भूकंप आता है वो इस वीडियो को पोस्ट कर देते हैं."
इसी त्रासदी के दौरान कुछ और तस्वीरें भी पोस्ट की गईं, जिनमें एक मिस्र में धराशाई हुई इमारत की थी.
ऐसी तस्वीरों का प्रसार कितना व्यापक हो सकता है इसका अंदाज़ा आप इससे लगा सकते हैं कि इस वीडियो को फ़ेसबुक के ईयर इन रिव्यू वीडियो में भी शामिल किया गया है.
प्रवासी जिसने यूरोप के सफ़र को इंस्टाग्राम पर डाला

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इस साल गर्मियों में सेनेगल से स्पेन जाते एक प्रवासी की तस्वीरें इंस्टाग्राम पर ख़ूब शेयर की गईं.
डकार के अब्दू दियूफ़ की सेल्फ़ी इंटरनेट पर तुरंत हिट हो गई और हज़ारों लोग उन्हें फॉलो करने लगे. प्रोत्साहित करने वाली ख़ूब टिप्पणियां भी आईं.
लोगों ने तस्वीरों के साथ इस्तेमाल हो रहे इंस्टालवर्स और रिचकिड्सऑफ़इंस्टाग्राम जैसे हैशटैग पर संशय भी ज़ाहिर किया.
बाद में पता चला कि यह स्पेन में चल रही एक फ़ोटोग्राफ़ी प्रतियोगिता के मार्केटिंग अभियान का हिस्सा था.
इस्लामिक स्टेट लड़ाके के रूप में प्रवासी

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यूरोप में जब प्रवास चरम पर था, तब फ़ेसबुक पर गुमराह करने वाली तस्वीरें भी ख़ूब आईं.
एक व्यक्ति ने लिखा, "यह आदमी याद है? जो पिछले साल इस्लामिक स्टेट के लिए पोज़ कर रहा था. अब यह प्रवासी है."
तस्वीर में दिख रहे व्यक्ति की पहचान लैश अल सालेह के रूप में हुई, जो सीरिया में बशर अल असद के ख़िलाफ़ लड़ रहे विद्रोही गुट फ़्री सीरियन आर्मी के लड़ाके थे.
वे सीरिया से भागकर अगस्त 2015 में मेसेडोनिया पहुँचे थे. सच पता चलने के बाद तस्वीर साझा करने वाले व्यक्ति ने माफ़ी मांगी.
ईगल्स ऑफ़ डेथ मेटल का कंसर्ट

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जब नवंबर में पेरिस हमले की ख़बरें ब्रेक हो रही थीं, तभी अफ़वाहों और गुमराह करने वाली तस्वीरों से असमंजस भी फैल रहा था.
इस तस्वीर को हमलों से तुरंत पहले का बताया गया. मगर वास्तव में यह डबलिन के ओलंपिया थिएटर में दी गई बैंड की प्रस्तुति की थी, जिसे हमलों से एक दिन पहले बैंड के फ़ेसबुक पन्ने पर साझा किया गया था.
पेरिस की वीरान सड़कें

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हमलों के बाद पेरिस की खाली सड़कें दिखा रही इस तस्वीर को भी हज़ारों लोगों ने रिट्वीट किया.
वास्तव में यह तस्वीर एक फ़ोटोग्राफ़ी प्रोजेक्ट साइलेंट वर्ल्ड से थी, जिसमें फ़ोटोग्राफ़ी चालबाज़ियों के ज़रिए दुनिया के अंत के समय शहरों की कल्पना की गई थी.
एक पति का बदला

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एक तलाकशुदा जर्मन पति जिसने अपनी सभी चीज़ें आधी काटकर नीलामी के लिए ईबे पर डाल दिया था, उनकी कहानी भी दुनियाभर में साझा की गई.
कई मीडिया संस्थानों ने भी इसे जगह दी. ईबे की नीलामी सही थी, लेकिन कहानी झूठी.
दरअसल इस कहानी को जर्मन बार एसोसिएशन ने प्रचार के लिए गढ़ा था.
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