अंतरराष्ट्रीय संधि की राह में हैं बड़े पेंच

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फ्रांस की राजधानी पेरिस में सोमवार से शुरू हो रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में दुनियाभर के 195 देशों के प्रतिनिधि शिरकत कर रहे हैं. भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सम्मेलन में भाग ले रहे हैं.

30 नवंबर से 11 दिसंबर के बीच हो रहा पेरिस जलवायु सम्मेलन का मक़सद पिछले 20 से भी अधिक साल में पहली बार जलवायु पर एक क़ानूनी बाध्यकारी और सर्वसम्मत समझौता करना है. साथ ही इसका लक्ष्य ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है.

बीबीसी के पर्यावरण संवाददाता नवीन सिंह खड़का का कहना है कि पिछले 20 साल से ये सम्मेलन होते आ रहे हैं, लेकिन आयोजकों का कहना है कि अब जलवायु परिवर्तन पर एक अंतरराष्ट्रीय संधि की ज़रूरत है.

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एक ओर अमरीका, ब्रिटेन, जापान जैसे विकसित देश हैं, तो दूसरी तरफ़ उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं चीन, ब्राज़ील, भारत, दक्षिण अफ़्रीका जैसे देश. इनके बीच लंबे समय से खींचातानी चल रही है.

खींचातानी इस बात को लेकर है कि विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती करें. वहीँ विकासशील देशों का तर्क है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने की ज़िम्मेदारी विकसित देशों की है. उनका कहना है कि अब विकास करने की बारी उनकी है, लिहाजा उन पर बहुत सारी शर्तें न थोपी जाएं.

मोदी और ओबामा

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अभी तक 170 से अधिक देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर राज़ी हुए हैं. असल झगड़े की वजह है कि धरती का औसत तापमान दो डिग्री और नहीं बढ़ने दिया जाए, इसके लिए कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती.

विकसित देशों का तर्क है कि ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बुरा असर ग़रीब मुल्कों पर पड़ रहा है.

ग्लोबल वार्मिंग से जूझने के लिए 100 बिलियन डॉलर का सालना फ़ंड बनाने की भी बात है, लेकिन अब विकसित देशों ने इसमें शर्त जोड़ दी है कि फ़ंड में भारत जैसे विकासशील देशों को भी योगदान करना होगा, जिससे चीन और भारत जैसे देश नाख़ुश हैं.

प्रकाश जावडेकर

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सम्मेलन में सबसे ज़्यादा निगाहें भारत पर ही लगी रहेंगी. इसकी वजह ये है कि पिछले दिनों चीन कार्बन उत्सर्जन पर साल 2030 तक कटौती करने का वचन दे चुका है. जबकि भारत ने अभी तक इस पर कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है.

भारत सबसे ज़्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर है. भारत का तर्क है कि उससे कार्बन उत्सर्जन में बहुत कटौती की उम्मीद न की जाए, क्योंकि इसकी बड़ी आबादी को बिजली जैसी मूलभूत सुविधा भी नहीं मिल पाई है.

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जहाँ तक भारत पर दबाव डालने की बात है, वो तो नहीं हो सकता. क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांत के अनुसार सर्वसम्मति से ही संधि हो सकती है, बहुमत वहाँ कोई मायने नहीं रखता.

हालाँकि भारत को मनाने की कोशिशें होंगी, लेकिन कौन किसको मनाएगा. ये देखने वाली बात होगी.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)

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