वो गांव जहां बेटियां ही पहचान हैं!

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- Author, नीरज सिन्हा
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
झारखंड के एक आदिवासी गांव में जब आप किसी व्यक्ति का पता पूछते हैं तो लोग उस परिवार की बेटी का नाम बताते हुए घर दिखा देते हैं.
झारखंड में लौहनगरी जमशेदपुर से 26 किलोमीटर दूर तिरिंग गांव की पहचान अचानक से बदल गई है.
वहां घरों में मिट्टी की दीवारों पर टंगे नेम प्लेट पर पूजा, चांदनी, सुजला, फूलमनी, पायल, टुसू के नाम देखकर चौंकने की ज़रूरत नहीं है.
दरअसल, महिला सशक्तीकरण को लेकर देश के कई हिस्सों में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान चल रहा है, लेकिन तिरिंग गांव में 'मेरी बेटी, मेरी पहचान' अभियान चलाया जा रहा है.
नेम प्लेट पर लड़कियों के नाम के साथ उनकी मां के नाम भी लिखे गए हैं.
इस सरकारी अभियान को जमशेदपुर के डिप्टी कलेक्टर संजय कुमार चला रहे है जो ज़िला जनसंपर्क अधिकारी का काम भी देख रहे हैं.
आदिवासी बहुल 90 घरों वाला तिरिंग राज्य का पहला गांव है जहां घरों की पहचान बेटियों के नाम से होने लगी है. यहां के लोग खेती-मजदूरी करते हैं.
आदिवासी परंपरा के तहत अधिकतर घरों की दीवारें की पुताई विभिन्न रंगों से की गई हैं. नेम प्लेट में पीले रंग की पट्टी पर नीले रंग से लड़कियों के नाम लिखे हैं.
संजय कुमार बताते हैं कि रंगों के चयन के पीछे ख्याल यह था कि पीला रंग प्रकाश, ऊर्जा और आशावाद का प्रतीक है, तो नीला रंग बेटियों को उड़ान भरने और आसमान छूने का हौसला देता है.

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इस अभियान को शुरू करने से पहले उन्होंने ग्राम सभा, स्थानीय स्कूल के शिक्षकों, पत्रकारों, आंगनवाड़ी सेविका, बाल विकास परियोजना अधिकारी के साथ रायशुमारी कर सहमति बनाई. अभियान को शुरू करने से पहले गांव में रैली निकाली गई. महिलाओं ने शंख फूंके, पारंपरिक वाद्यंत्र बजाए गए.
ग्राम प्रधान उमेश सरदार कहते हैं, "यह अभियान पूरे क्षेत्र में चलना चाहिए."
प्राथमिक विद्यालय तिरिंग के शिक्षक सुनील कुमार यादव कहते हैं- 'तीन साल पहले झारखंड में लड़कियों के सरकारी स्कूलों में 'पहले पढ़ाई फिर विदाई' का स्लोगन दिया गया था, जो बाद में देश भर में सुर्खियों में आया.'
पूजा सरदार की मां बताती हैं कि जब घर की दीवार पर नेम प्लेट लगाए जा रहे थे, उस वक्त तेज़ बुखार के बावजूद बेटी ने इस काम में सहयोग किया. पूजा कहती हैं, 'अब हमारी भी पहचान बनी है.'
2011 की जनगणना के मुताबिक तिरिंग गांव का शिशु लिंगानुपात एक हज़ार लड़कों पर 768 बच्चियां था और महिलाओं में साक्षरता दर महज़ पचास फ़ीसदी थी. पूरे जिले में महिलओं की साक्षरता 67 फ़ीसदी तक थी.
डिप्टी कलेक्टर संजय कुमार के मुताबिक उन्होंने गांवों की आबादी से लेकर अन्य पहलुओं पर आंकड़े इकट्ठा किए जिससे ये लगा कि शुरूआत तिरिंग गांव से होनी चाहिए.

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संजय कुमार कहते हैं कि उन्होंने कहीं पढ़ा था कि छत्तीसगढ़ के किसी गांव में एक बेटी के नाम पर किसी आला अफसर ने घर में नेम प्लेट लगवाई क्योंकि उसने शानदार नंबर लिए थे. वो कहते हैं उनके दिमाग में आया कि इसी सोच को थोड़ा और आगे बढ़ना चाहिए.
पंचायत समिति सदस्य उर्मिला सामाद कहती हैं कि आदिवासी समुदाय में महिलाएं खेती और घर का काम दोनों संभालती हैं, पर समाज पुरुष प्रधान होता है.
गांव की आंगनवाड़ी सेविका बताती हैं कि अब आसपास के स्कूलों में लड़कियों के बीच चर्चा होने लगी है और दूसरे गांवों के लोग भी तिरिंग को एक बार देखना चाहते हैं.
वार्ड सदस्य अहिल्या सरदार के मुताबिक़ यह सशक्तीकरण का संदेश है.
हालांकि ये अभियान कुछ मर्दों को कभी-कभार खटकता है, लेकिन ग्राम प्रधान उमेश सरदार और मुखिया सावित्री देवी लोगों से पुराने ख्यालों से निकलने की सलाह देते हैं.
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